60,000 करोड़ का महा-प्रोजेक्ट: चीन से पाकिस्तान की सीमाओं तक… दुश्मन का काल बनेगा भारतीय सेना का नया कॉम्बैट व्हीकल – ficv indian army 60000 cr rs plan for nextgen combat vehicles – Jagran

कृपया धैर्य रखें।
भारतीय सेना अपनी मैकेनाइज्ड वॉरफेयर क्षमता को आधुनिक बनाने के लिए 60,000 करोड़ रुपये की FICV परियोजना पर काम कर रही है। ये अत्याधुनिक, स्वदेशी वाहन पु …और पढ़ें
भारतीय सेना का 60,000 करोड़ का FICV प्रोजेक्ट (यह तस्वीर AI द्वारा जनरेट की गई है।)
60,000 करोड़ की FICV परियोजना, सेना का आधुनिकीकरण
पुराने BMP-2 वाहनों की जगह लेंगे अत्याधुनिक FICV
चीन-पाकिस्तान सीमा पर दुश्मन को धूल चटाने में सक्षम
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय सेना की मैकेनाइज्ड वॉरफेयर क्षमता अब अपने सबसे बड़े बदलाव के दौर में प्रवेश कर रही है। भारतीय सेना अपनी मैकेनाइज्ड वॉरफेयर क्षमता को आधुनिक बनाने के लिए 60,000 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी FICV (Future Infantry Combat Vehicle) परियोजना पर तेजी से काम कर रही है।
यह अत्याधुनिक, स्वदेशी, नेटवर्क-सेंट्रिक और भारी हथियारों से लैस बख्तरबंद वाहन पुराने BMP-2 बेड़े की जगह लेंगे।
चीन की दुर्गम सीमाओं (लद्दाख) से लेकर पाकिस्तान के तपते रेगिस्तान (राजस्थान) तक, हर मोर्चे पर दुश्मन को धूल चटाने के लिए तैयार यह घातक कॉम्बैट व्हीकल ड्रोन तकनीक, एंटी-टैंक मिसाइलों और एम्फीबियस (जल-थल दोनों में सक्षम) ताकतों से लैस है। यह भविष्य के डिजिटल युद्धक्षेत्र में भारत की सैन्य रणनीति को पूरी तरह बदल कर रख देगा।
FICV यानी फ्यूचर इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल, भारतीय सेना का अगली पीढ़ी का एक ऐसा ट्रैक्ड बख्तरबंद युद्ध वाहन होगा। यह आधुनिक युद्धक्षेत्र में दोहरे काम एक साथ करेगा। FICV एक ऐसा ट्रैक्ड बख्तरबंद युद्ध वाहन होगा जो युद्ध के दौरान सैनिकों को सुरक्षित रूप से मोर्चे तक पहुंचाने के साथ-साथ दुश्मन पर भारी फायरपावर भी बरसा सकेगा।
यह वाहन लगभग 20 टन वजन का होगा और इसमें 600 हॉर्सपावर (HP) का इंजन लगाया जाएगा। खास बात यह है कि भारी सुरक्षा कवच होने के बावजूद इसमें एम्फीबियस क्षमता होगी, यानी यह बिना किसी बाहरी सहायता के नदियों और जल बाधाओं को पार कर सकेगा।
इस वाहन में वाहन में तीन सदस्यीय क्रू – कमांडर, गनर और ड्राइवर होंगे, जबकि यह आठ पूरी तरह हथियारबंद सैनिकों को ले जाने में सक्षम होगा।
भारतीय सेना ने 1970 के दशक के अंत में BMP-1 और बाद में BMP-2 व्हीकल्स शामिल किए थे। ये वाहन शीत युद्ध के दौर की सोवियत सैन्य रणनीति के हिसाब से बनाए गए थे। हालांकि, दशकों तक अपग्रेड होने के बावजूद अब ये आधुनिक खतरों के सामने कमजोर माने जा रहे हैं। आज के युद्ध में एंटी-टैंक मिसाइल, ड्रोन, प्रिसिजन आर्टिलरी और टॉप-अटैक हथियार बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
1991 के गल्फ वॉर में इराकी BMP वाहनों को अमेरिकी गठबंधन की आधुनिक टैंकों और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम के सामने भारी नुकसान उठाना पड़ा। इससे दुनिया को पता चला कि पुराने सोवियत प्लेटफॉर्म आधुनिक युद्ध में कितने कमजोर हो सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती और बढ़ गई क्योंकि अब उसे एक साथ चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर तैयारी रखनी पड़ती है।
इन सभी परिस्थितियों ने सेना को नई पीढ़ी के कॉम्बैट व्हीकल की जरूरत महसूस कराई।
FICV परियोजना से बहुत पहले, DRDO ने 1990 के दशक में ‘अभय’ नाम से भारत का पहला स्वदेशी इन्फैंट्री कॉम्बैट व्हीकल विकसित करने का प्रयास शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य केवल पुराने सोवियत BMP को बदलना नहीं, बल्कि देश में ही अत्याधुनिक सैन्य तकनीक का आधार तैयार करना था।
साल 2007-08 में सफलतापूर्वक पूरी हुई इस परियोजना ने भारत को कम्पोजिट आर्मर, थर्मल इमेजिंग, हाइड्रो-न्यूमैटिक सस्पेंशन और फायर कंट्रोल सिस्टम जैसी कई महत्वपूर्ण तकनीकें दीं। आधुनिक युद्ध के लिहाज से ‘अभय’ के प्रोटोटाइप में भारी हथियारों (जैसे 40mm बोफोर्स ऑटो कैनन, मिलान व कोंकुर-एम एंटी-टैंक मिसाइल और ऑटोमैटिक ग्रेनेड लॉन्चर) पर विशेष जोर दिया गया था, जिसकी यही सफल तकनीकें आज भारत के अगली पीढ़ी के फाइटिंग व्हीकल्स (FICV) का मुख्य आधार बन रही हैं।
हाल ही में अप्रैल 2026 में, DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) ने निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों Tata Advanced Systems और Bharat Forge के साथ मिलकर नए “एडवांस्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म्स” पेश किए हैं। इन अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म्स को भविष्य में सेना के पुराने हो चुके BMP-2 कॉम्बैट व्हीकल्स के मुख्य विकल्प (रिप्लेसमेंट) के रूप में देखा जा रहा है।
चीन और पाकिस्तान के अलग-अलग भौगोलिक मोर्चों से निपटने के लिए भारतीय सेना अब केवल एक तरह के वाहनों पर निर्भर नहीं रहना चाहती। सेना राजस्थान-गुजरात के रेगिस्तान (नरम रेत) के लिए ट्रैक्ड व्हीकल्स और मैदानी-पर्वतीय क्षेत्रों में तेज गति के लिए व्हील्ड व्हीकल्स के बेहतरीन मिश्रण (मिक्स) का इस्तेमाल करेगी। 60,000 करोड़ रुपये की इस विशाल FICV परियोजना के तहत सेना को भविष्य में लगभग 3,500 वाहनों की जरूरत हो सकती है, जिसे बनाने के लिए DRDO, AVNL, लार्सन एंड टुब्रो (L&T), टाटा मोटर्स और महिंद्रा डिफेंस जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियों के बीच बड़ी होड़ चल रही है।
हालांकि, इस रेस में अमेरिकी बख्तरबंद वाहन ‘स्ट्राइकर’ (Stryker) की भी चर्चा हुई थी, लेकिन एम्फीबियस (पानी में तैरने की) क्षमता की कमी और लद्दाख जैसे हाई-एल्टीट्यूड (अत्यधिक ऊंचाई वाले) इलाकों में सीमित प्रदर्शन के कारण वह भारतीय परिस्थितियों के सामने पीछे छूट गया और सेना अब पूरी तरह स्वदेशी प्लेटफॉर्म को प्राथमिकता दे रही है।

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News