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नेपाल में पिछले साल 8 और 9 सितंबर को हुए ‘जेन जी प्रोटेस्ट’ को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने बुधवार को अपनी बहुप्रतीक्षित जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी है. इस रिपोर्ट के सामने आते ही नेपाल की राजनीति में जबरदस्त भूचाल आ गया है. रिपोर्ट में देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों और सुरक्षा बलों के आला अधिकारियों पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की सिफारिश की गई है.
मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में सबसे बड़ा झटका पूर्व प्रधानमंत्री के.पी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को लगा है. आयोग ने इन दोनों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन और प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए अगले पांच साल तक उनके चुनाव लड़ने और विदेश यात्रा करने पर पूरी तरह रोक लगाने की सिफारिश की है.
इसके अलावा, उस दौरान सोशल मीडिया पर बैन लगाने का फैसला करने वाले तत्कालीन संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग के खिलाफ भी कार्रवाई की बात कही गई है. आयोग का मानना है कि उनके इस फैसले से जनता की अभिव्यक्ति की आजादी छिनी और हालात और ज्यादा बिगड़ गए.
लामिछाने पर फौजदारी का केस चलाने की सिफारिश
आंदोलन की आड़ में हुई जेल ब्रेक की घटना को आयोग ने एक गंभीर आपराधिक मामला माना है. इस मामले में सत्तारूढ़ दल ‘राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी’ (RSP) के अध्यक्ष रवि लामिछाने को मुख्य रूप से दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ फौजदारी मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है. इतना ही नहीं, आरएसपी के दो सांसदों मनीष झा और हरि ढकाल पर भी इस साजिश में शामिल होने के गंभीर आरोप हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, ये दोनों नेता रवि लामिछाने को जेल से छुड़ाने वहां पहुंचे थे और उन्होंने ही बाकी कैदियों को भगाने के लिए भीड़ को उकसाया था. इस मामले में आरएसपी के करीब 15 अन्य सांसदों के खिलाफ भी हिंसक भीड़ को भड़काने और आगजनी के आरोप में जांच की सिफारिश की गई है.
सेना और पुलिस प्रमुखों पर भी उठे सवाल
आयोग ने रिपोर्ट में साफ कहा है कि विद्रोह के दूसरे दिन देशभर में जो हिंसा और आगजनी हुई, उसे रोकने में देश का सुरक्षा तंत्र पूरी तरह फेल रहा. इसके लिए नेपाल पुलिस के मौजूदा प्रमुख (IGP) दान बहादुर कार्की और सशस्त्र प्रहरी बल के मौजूदा प्रमुख (IGP) नारायण दत्त पौडेल को जिम्मेदार मानते हुए विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है. साथ ही, खुफिया विभाग और पुलिस के तत्कालीन प्रमुखों को भविष्य में किसी भी सरकारी पद के लिए अयोग्य घोषित करने को कहा गया है.
रिपोर्ट में नेपाली सेना की भूमिका को भी ‘शंकास्पद’ माना गया है और सेना को भविष्य में अपनी संवैधानिक सीमा के भीतर रहकर काम करने की सख्त हिदायत दी गई है. इसके अलावा, अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और पूर्व गृहमंत्री सुदन गुरुंग की भूमिका को भी संदिग्ध बताते हुए विस्तृत जांच के घेरे में लाया गया है.
रिपोर्ट में पीएम बालेन शाह की भूमिका का जिक्र नहीं
जांच में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के अनुसार, ‘तिब्बत ओरिजिन ब्लड’ (TOB) नाम के एक ग्रुप के कुछ संदिग्ध युवा, जो खास टी-शर्ट और जैकेट पहने हुए थे, अचानक इस प्रदर्शन में घुस आए. इन्होंने ही पुलिस के खिलाफ भीड़ को हिंसक होने के लिए उकसाया, जिसके बाद पुलिस को मजबूरन गोलियां चलानी पड़ीं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आंदोलन के दौरान कई नेताओं के भाषण हिंसा भड़काने वाले थे. आरएसपी के 15 सांसदों के खिलाफ आगजनी, तोड़फोड़ और भड़काऊ बयान देने के आरोप में जांच की सिफारिश की गई है. हालांकि, रिपोर्ट में प्रधानमंत्री बालेन शाह की भूमिका का कोई जिक्र नहीं होने से नेपाल की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है.
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