सालों बाद 1857 के वीरों को मिला सम्मान, 65 गांवों में चला जनआंदोलन – India.Com

इटावा और आसपास के इलाकों में पिछले एक महीने से एक ऐसी मुहिम चल रही थी, जिसने लोगों को अपने इतिहास के उन पन्नों की याद दिलाई जिन्हें वक्त के साथ लगभग भुला दिया गया था. 1857 की क्रांति में अहम भूमिका निभाने वाले जीता चमार, जंगली-मंगली भंगी और मारून सिंह लोधी जैसे वीर सेनानियों को सम्मान दिलाने के लिए शुरू किए गए जनजागरण अभियान को लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला. एक मई से शुरू होकर 31 मई 2026 तक चले इस अभियान में चंबल फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं ने 65 गांवों का दौरा किया. गांवों की चौपालों, गलियों और जनसभाओं में लोगों को बताया गया कि आजादी की लड़ाई सिर्फ कुछ बड़े नामों तक सीमित नहीं थी, बल्कि गांवों और छोटे समाजों से निकले कई वीरों ने भी अपने प्राणों की आहुति दी थी.

इस अभियान के दौरान, करीब 60 हजार लोगों तक पहुंच बनाई गई. गांवों में नुक्कड़ बैठकों और जनसंवाद कार्यक्रमों के जरिए लोगों को इन क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान के बारे में बताया गया. कई जगहों पर बुजुर्गों ने अपने पुरखों से सुनी कहानियां भी साझा कीं. लोगों का कहना था कि इतिहास की किताबों में जिन नायकों को जगह नहीं मिली, उन्हें अब नई पीढ़ी के सामने लाना बेहद जरूरी है. अभियान में शामिल युवाओं ने भी खुलकर भाग लिया और कहा कि उन्हें पहली बार अपने क्षेत्र के ऐसे वीरों के बारे में विस्तार से जानने का मौका मिला है. गांवों में यह मुहिम सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि भावनाओं से जुड़ा आंदोलन बनती नजर आई.

इस पूरे अभियान का सबसे खास हिस्सा रहा हस्ताक्षर अभियान. चंबल फाउंडेशन की ओर से चलाए गए इस अभियान में साढ़े तीन हजार से ज्यादा लोगों ने समर्थन दिया. लोगों ने कागजों के साथ-साथ 18 मीटर लंबे कपड़े पर भी हस्ताक्षर कर यह मांग उठाई कि जीता चमार, जंगली-मंगली भंगी और मारून सिंह लोधी को इतिहास में उनका सम्मानजनक स्थान दिया जाए. अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यह सिर्फ हस्ताक्षर नहीं बल्कि उन वीरों के लिए न्याय की मांग है, जिनका योगदान वर्षों तक अनदेखा किया गया. लोगों ने मांग की कि इन क्रांतिकारियों को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रमों और सरकारी स्मृतियों में भी जगह मिलनी चाहिए.

अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने इन वीर सेनानियों के परिजनों से भी मुलाकात की. परिवारों से जुड़ी पुरानी यादें, किस्से और लोक परंपराएं इकट्ठा की गईं ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन्हें सुरक्षित रखा जा सके. कई परिवारों ने भावुक होकर बताया कि उनके पूर्वजों ने देश के लिए कुर्बानी दी, लेकिन उन्हें कभी वह पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थे. कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन कहानियों को दस्तावेज के रूप में तैयार किया जाएगा ताकि इतिहास का यह हिस्सा हमेशा के लिए सुरक्षित रह सके. लोगों का मानना है कि जब तक स्थानीय नायकों को पहचान नहीं मिलेगी, तब तक इतिहास अधूरा ही रहेगा.
अभियान से जुड़े प्रतिनिधियों ने बताया कि वे जल्द ही यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात का समय मांगेंगे. इस दौरान साढ़े तीन हजार लोगों के हस्ताक्षरों वाला 18 मीटर लंबा कपड़ा और समर्थन पत्र मुख्यमंत्री को सौंपा जाएगा. साथ ही मांग की जाएगी कि 1857 की क्रांति में योगदान देने वाले इन वीरों को सरकारी स्तर पर सम्मान दिया जाए. अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यह मुहिम यहीं खत्म नहीं होगी. आने वाले समय में और गांवों तक पहुंचकर लोगों को जागरूक किया जाएगा ताकि इतिहास के इन अनसुने नायकों को वह पहचान मिल सके जिसके वे असली हकदार हैं.

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