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आज सुबह जब आपने अपनी आंखें खोली होंगी, तो वॉट्सऐप के स्टेटस से लेकर ट्विटर और इंस्टाग्राम के इनबॉक्स तक, एक मुहावरा दिखा होगा ‘2 जून की रोटी’. स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उंगलियां सरकाते हुए हम और आप इन मीम्स को देखते चले गए होंगे, शायद किसी दोस्त को फॉरवर्ड भी कर दिया होगा कि ‘भाई, आज तो दो जून है, संभलकर रहना, आज रोटी मिलनी मुश्किल है.’
लेकिन, कभी उस स्क्रीन से नजरें हटाकर, इस शोर के पीछे छिपे उस सन्नाटे को सुनने की कोशिश की है, जो इस मुहावरे की असल रूह है? सुबह जब आपकी आंख खुली होगी, तो एक पल के लिए मन में आया होगा कि यार, थोड़ी देर और सो लेते हैं. लेकिन अगले ही पल आप चादर फेंककर बिस्तर से उठ खड़े हुए होंगे. नहा-धोकर, टिफिन पैक करके या तो ऑफिस के लिए निकल गए होंगे, या फिर लैपटॉप खोलकर बैठ गए होंगे.
कभी रुककर खुद से पूछा है कि आखिर हम सब रोज सुबह इस कदर भाग क्यों रहे हैं? इस अंतहीन दौड़ की असली वजह क्या है?
इस भागदौड़ का सबसे सटीक, सबसे ठेठ और सबसे कड़क जवाब छुपा है भोजपुरी एवं अवधी लोक-संस्कृति में. हमारे ग्रामीण अंचलों की चौपालों पर पूर्वजों के जमाने से चली आ रही एक बेहद मशहूर कहावत अक्सर सुनने को मिलती है ‘पेट न होई त भेंट न होई’.
कितनी गहरी और कितनी मुकम्मल बात है न. अगर इस शरीर में यह साढ़े तीन बित्ते का पेट न होता, तो दुनिया का कोई भी रिश्ता, कोई भी नाता वजूद में ही नहीं आता. न हम किसी से मिलने जाते, न कोई हमसे मिलने आता. अब शायद आपके मन में सवाल आए कि ये बित्ता क्या चीज है? तो आसान भाषा में कहें तो बित्ता लंबाई नापने का एक पुराना और देसी तरीका है, जो हमारे हाथ के अंगूठे से लेकर छोटी उंगली को पूरी तरह फैलाने के बीच की दूरी होती है.
खैर, इस पेट की आग ही है जो हमें अपनों से दूर करती है, पराए शहरों में लाकर बसा देती है और रोज सुबह एक नई जद्दोजहद के सामने खड़ा कर देती है. अगर आज ‘2 जून की रोटी’ की बात न होती, तो न मैं यह कहानी लिख रहा होता, न आप अपने दफ्तर में बैठकर अपनी जिंदगी खपा रहे होते. हम-आप कमाने निकलते ही क्यों?
हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहां समय के साथ हमारी बोलचाल की भाषा और तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है. हमारी अपनी बोलियों के कई गहरे शब्द तथा उनके अर्थ धीरे-धीरे रोजमर्रा की बातचीत से दूर होते जा रहे हैं. यही वजह है कि हर साल जब जून महीने की दूसरी तारीख आती है, तो सहज रूप से इस मुहावरे का कनेक्शन कैलेंडर की तारीख से जोड़कर देखा जाने लगता है. ऐसे में मन में यह उलझन होना स्वाभाविक है कि आखिर साल के छठे महीने की इस तपती हुई दो तारीख से खाने का क्या लेना-देना? क्या इस दिन कोई खास त्योहार होता है या इसके पीछे कोई और वजह है?
इसका जवाब है बिल्कुल नहीं. इस मुहावरे का आपकी दीवार पर टंगे उस अंग्रेजी कैलेंडर से कोई वास्ता ही नहीं है.
इस कन्फ्यूजन को समझने के लिए हमें अपनी मिट्टी, अपनी जड़ों और अपनी लोक भाषाओं की तरफ लौटने की जरूरत है. अवध के गांवों में चले जाइए, बिहार के मैथिली भाषी इलाकों में बैठिए या पूर्वांचल की चौपालों पर वक्त बिताइए. वहां आज भी बुज़ुर्ग कहते हैं कि ‘बड़ा नीक जुन रहा’ (बड़ा अच्छा समय था) या ‘एहि जुआन हम ई काम कइली'(इसी वक्त हमने यह काम किया था).
दरअसल, हमारी इन लोक भाषाओं में ‘जुआन’ या ‘जून’ का सीधा मतलब वक्त अथवा समय होता है. और जब हम कहते हैं ‘2 जून की रोटी’, तो उसका सीधा सा मतलब होता है ‘दो वक्त की रोटी’ यानी सुबह-शाम का भोजन. जब हमारे घर के सयाने कहते हैं कि ‘दुनो जून के जुगाड़ होइ गवा’, तो उनका मतलब अंग्रेजी का महीना नहीं होता.
सोचिए कितना बड़ा विरोधाभास है. जिस मुहावरे का जन्म सबसे गरीब और मजबूर इंसान के पेट की आग से हुआ था, आज समय बदलने के साथ वो बातें सिर्फ एक चर्चा का विषय बनकर रह गई हैं. मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हलकू या कफन का घीसू और माधव जिस दो वक्त की रोटी के लिए पूरी जिंदगी हाड़-मांस गलाते रहे, उसे आज के दौर में सिर्फ एक तारीख से जोड़कर देख लिया जाता है.
किसी आलीशान होटल में बैठकर पिज्जा-बर्गर ऑर्डर करने वाली नई पीढ़ी शायद इस दर्द को न समझ पाए, लेकिन रोड पर रात के ग्यारह बजे सन्नाटे में रिक्शा की सीट पर सो जाने वाले उस रिक्शेवाले से पूछिए, उसके लिए ‘2 जून की रोटी’ क्या है. उसके लिए वो कोई सोशल मीडिया का हैशटैग नहीं है, उसके लिए वो आज के दिन का मुकद्दर है. आगर आज दोनों वक्त की रोटी का इंतजाम हो गया, तो उसकी दुनिया पूरी है, नहीं तो कल सुबह फिर वही पेट की आग, वही सड़कों का संघर्ष.
यह मुहावरा कोई चुटकुला नहीं, बल्कि एक बेहद भावुक, सिसकता हुआ सच है. यह उस पिता की फटी हुई एड़ियों की कहानी है जो चिलचिलाती धूप में रिक्शा खींचता है, ताकि रात को उसके बच्चों को दूसरे वक्त का दाना नसीब हो सके. यह उस मां के आंसुओं की कहानी है जो दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर थकी-हारी घर लौटती है, फिर चूल्हा जलाकर तसल्ली की सांस लेती है कि चलो, आज भी ‘दोनों जून’ की लाज रह गई. इसी पेट को भरने के लिए लोग दफ्तरों में रात-रात भर जागकर शिफ्टों में काम करते हैं. इसी रोटी के लिए कोई सरहद पर खड़ा है, तो कोई चिलचिलाती धूप में गिट्टियां तोड़ रहा है.
तारीखें बदलेंगी. आज 2 जून है, कल 3 जून आ जाएगी और लोगों के बीच इस बात की चर्चा भी खत्म हो जाएगी. लोग किसी नए विषय पर बात करने लगेंगे. लेकिन इस देश के लाखों-करोड़ों चेहरों के लिए ‘दो जून की रोटी’ की जंग, इस कहावत का मर्म कभी खत्म नहीं होता. उनके लिए हर सुबह एक नया संघर्ष है, हर शाम एक नया इम्तिहान.
तो अगली बार जब आप इस मुहावरे को सुनें, तो सिर्फ इसे एक आम बात समझकर आगे मत बढ़ जाइएगा. अपनी भाषा के इस खूबसूरत शब्द ‘जून’ की गहराई को याद कीजिएगा, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है. अगर मुमकिन हो, तो अपने हिस्से की रोटियों में से एक निवाला किसी ऐसे शख्स के नाम भी कर दीजिएगा, जिसके नसीब में आज भी ‘दोनों जून’ का खाना एक सपने जैसा है. पेट की भूख कैलेंडर की तारीखें देखकर नहीं लगती, वह बस अपनों का प्यार, भरपेट रोटी मांगती है.
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