TMC में फूट, डीएमके गई रूठ… परिसीमन बिल को पास कराने का जुगाड़ जुटा रही BJP – AajTak

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देश की सियासत एक बार फिर ऐसे मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है. एक तरफ जहां विपक्षी एकजुटता ताश के पत्तों की तरह बिखर रहा तो दूसरी तरफ केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी अपने सबसे महत्वाकांक्षी मिशन-परिसीमन विधेयक, 2026 को पास कराने के चक्रव्यूह को भेदने के बेहद करीब पहुंचती नजर आ रही है. 
बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अंदरूनी कलह और बगावत की चिंगारी सुलग रही है. वहीं, दक्षिण भारत में विपक्ष का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाने वाली ‘द्रमुक’ (DMK) ने कांग्रेस से ‘धोखे’ का आरोप लगाते हुए इंडिया गठबंधन से किनारा कर लिया है. आम आदमी पार्टी में पहले ही बगावत हो चुकी है. 
विपक्ष के बिखरते कुनबे के बीच बीजेपी अलग की रणनीति पर काम कर रही है. बीजेपी की नजर संसद में ‘दो-तिहाई बहुमत’ जुटाने की है ताकि एक बार फिर से परिसीमन विधेयक को अमलीजामा पहना सके. अब देखना है कि बीजेपी क्या अपने सियासी मंसूबे में कामयाब हो पाएगी? 
ममता बनर्जी की टीएमसी गई टूट
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजे आने के बाद से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) भी इस समय दोहरे मोर्चे पर जूझ रही है. एक तरफ पार्टी के भीतर सीनियर बनाम जूनियर नेताओं की अंदरूनी रार और ‘विद्रोह’ गहरा गया है. टीएमसी के 80 में से 60 विधायक बागी तेवर अपनाते हुए पार्टी से निष्कासित  ऋतब्रत बनर्जी को नेता मान लिया है. इस तरह ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं. 
विधायकों के बाद टीएमसी के सांसदों पर ही टूट का खतरा मंडराने लगा है. सांसद काकोली घोष बागी तेवर अपना रखा है तो सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के सुर बदलने लगे हैं. विधायक की तरह टीएमसी के भी तो तिहाई सांसद सियासी पाला पदल सकते हैं. टीएमसी के भीतर जारी इस अंतर्विरोध का सीधा फायदा बीजेपी को संसद में मिलने की उम्मीद है.
लोकसभा में टीएमसी के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. इस तरह टीएमसी के कुल 41 सांसद है. ममता बनर्जी की पार्टी संसद में 41 सांसदों के साथ विपक्षी खेमे की एक बेहद मजबूत ताकत थी, जिसके दम पर विपक्ष ने परिसीमन बिल को पास नहीं होने दिया था. अब दो महीने में ही सियासी तस्वीर पूरी तरह बदलने लगी है. कहा जा रहा है कि टीएमसी के 23 सांसद सियासी पाला बदल सकते हैं, जिसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है. 
INDIA ब्लॉक से डीएमके गई रूठ
तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के बाद दक्षिण की राजनीति में आए भूचाल ने ‘इंडिया’ ब्लॉक की चूलें हिला दी हैं. राज्य की सत्ता से डीएमके बाहर होते ही और थलपति विजय के सियासी उदय से केंद्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई है. कांग्रेस ने तमिलनाडु में डीएमके का साथ छोड़कर अभिनेता विजय की पार्टी ‘तमिझगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के साथ गठबंधन सरकार में शामिल हो गई, जिसने डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन को पसंद नहीं आया. 
डीएमके ने साफ-साफ शब्दों में इसे कांग्रेस का ‘विश्वासघात’ करार दिया है और दिल्ली में होने वाली ‘इंडिया’ गठबंधन की हाई-लेवल बैठक का पूरी तरह से बहिष्कार करने का एलान कर दिया है. हालांकि, डीएमके ने राष्ट्रीय मुद्दों पर साथ रहने की बात जरूर कह रही है, लेकिन इस तल्खी ने विपक्षी मोर्चे को संसद के भीतर बेहद कमजोर कर दिया है.
डीएमके के कुल 32 सांसद हैं, जिसमें 22 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसद हैं. संसद में एमके स्टालिन की डीएमके महत्वपूर्ण ताकत रखती है, जिसने मोदी सरकार के द्वारा लाए गए परिसीमन बिल का पुरजोर तरीके से विरोध किया था. इसके चलते ही सरकार परिसीमन बिल को पास नहीं करा सकी, पर अब तमिलनाडु की सत्ता से बाहर होते ही सारा गेम बदल गया है. बीजेपी की नजर डीएमके को मुद्दे के आधार पर समर्थन जुटाने का है. बीजेपी ने डीएमके
को अपने साथ मिला लेती है तो उसकी राह काफी आसान हो जाएगी.  
राज्यसभा में एनडीए को दो-तिहाई बहुमत
राज्यसभा में एनडीए लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की राह आसान होती दिख रही है. हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसदों के पाला बदलकर बीजेपी का का दामन थाम लिया है. आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों के भाजपा में विलय को राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा मंजूरी मिल गई है.  इसके बाद उच्च सदन में बीजेपी की व्यक्तिगत संख्या 106 से बढ़कर 113 हो गई है औ एनडीए की ताकत 145 तक पहुंच गई है. 
साधारण बहुमत 123 के लिहाज से मोदी सरकार पूरी तरह सुरक्षित है और अब वह दो-तिहाई बहुमत 164-165 के जादुई आंकड़े के बेहद करीब आ गई है. नवंबर 2026 तक होने वाले राज्यसभा चुनावों में विपक्ष के बिखराव का फायदा उठाकर एनडीए इस आंकड़े को 150 के पार ले जाने की उम्मीद कर रहा हैय
बीजेपी अब संसद में दो-तिहाई नंबर हासिल करने के लिए DMK को साधने में जुटी है. DMK के 22 लोकसभा और 8 राज्यसभा सांसदों के साथ मुद्दों के आधार पर बाहर से समर्थन लेने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. इसी तरह टीएमसी के राज्यसभा सांसद भी टूटकर बीजेपी के साथ आ जाते हैं तो फिर सियासी राह आसान हो हो जाएगी. एनडीए आसानी से 160 का आंकड़ा पहुंच जाएगा. 
परिसीमन बिल पास कराने का बीजेपी प्लान
केंद्र सरकार 2029 से पहले हरहाल में परिसीमन बिल पास कराना चाहती है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत न होने से सफल नहीं हो पा रही. परिसीमन बिल के देश के राजनीतिक भूगोल को बदलने वाला है. इसके तहत लोकसभा सीटों की संख्या को 543 से बढ़ाकर 850 (816 राज्यों के लिए) करने का प्रस्ताव है.
दरअसल, यह एक संविधान संशोधन बिल है, इसलिए इसे संसद के दोनों सदनों में ‘दो-तिहाई (2/3) विशेष बहुमत’ से पास कराना अनिवार्य है. सरकार के  पहले प्रयास में विपक्ष की एकजुटता के चलते पास नहीं हो सका, लेकिन बदले हुए सियासी हालात में बीजेपी ने नया गुणा-गणित तैयार कर लिया है. विपक्ष के बिखराव का फायदा उठाकर बीजेपी दो-तिहाई बहुमत का नंबर जुटाने में लग गई है. 
डीएमके और कांग्रेस के अलग होने के बाद विपक्षी खेमे में फ्लोर मैनेजमेंट (संसद के भीतर समन्वय) ध्वस्त हो चुका है. टीएमसी में विधायकों की तरह की सांसदों में टूट होती है और डीएमके ने जिस तरह से इंडिया गठबंधन से अलग हुई है, उससे ही सारा गेम बदल रहा है. डीएमके अगर साथ भी नहीं आती है तो वॉकआउट कर जाता है, तो सदन का कुल संख्या बल कम हो जाएगा और बीजेपी के लिए दो-तिहाई का आंकड़ा छूना बेहद आसान हो जाएगा.
राजनीति के जानकारों का मानना है कि बीजेपी के लिए यह ‘परफेक्ट टाइमिंग’ है.  विपक्ष इस वक्त आंतरिक अंतर्विरोधों के ‘आईसीयू’ में है. स्टालिन की नाराजगी और ममता बनर्जी की अपनी मजबूरियों के बीच, बीजेपी संसद में जरूरी आंकड़े (जुगाड़) जुटाने के बेहद करीब है।. अगर बीजेपी इस बिखराव का फायदा उठाने में सफल रही, तो मानसून सत्र के खत्म होते-होते देश की संसद का ढांचा और परिसीमन बिल 2026 हमेशा के लिए कानून की शक्ल ले लेगा.
सांसद में दो-तिहाई बहुमत क्यों जरूरी?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी बड़े संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई (विशेष) बहुमत की आवश्यकता होती है. हाल ही में (अप्रैल 2026 में), लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत न होने के कारण महिलाओं को 33% आरक्षण देने और सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था.
मोदी सरकार के आगामी बड़े एजेंडे जैसे ‘एक देश एक चुनाव’ और देशव्यापी परिसीमन बिल को बिना दो-तिहाई बहुमत के नंबर जुटाए, उसको पारित कराना असंभव है. यही कारण है कि बीजेपी विभिन्न क्षेत्रीय दलों और असंतुष्ट सांसदों को जोड़कर इस आंकड़े को सुरक्षित करने की कोशिशों में तेजी से जुटी है. अब देखना है कि बीजेपी कितनी सफल होती है? 
 
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