ग्राउंड रिपोर्ट: 'जैन मुनियों की लाइन बनी तो हम देंगे बकरे की बलि!' मुंबई की सोसाइटी में 'सफेद लकीर' पर छिड़ा महा-संग्राम – AajTak

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महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की एक सोसाइटी में जैन मुनियों के लिए खींची गई सफेद लाइन ने पड़ोसियों के बीच 20 साल पुराना अमन तोड़ दिया. घाटकोपर के कैलाश एवेन्यू सोसाइटी में एक महिला ने सोसाइटी की साझा जमीन पर सफेद रंग से एक लाइन बनवाई. ये लाइन जैन मुनियों के लिए थी ताकि वो आसानी से भिक्षा लेने आ सकें. लेकिन इस एक लाइन ने सोसाइटी में ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो अब सोशल मीडिया पर भी फैल गया है.
मुंबई के घाटकोपर इलाके में कैलाश एवेन्यू नाम की एक हाउसिंग सोसाइटी है. इसमें कुल 33 फ्लैट हैं. यहां अलग-अलग समुदायों के लोग रहते हैं. जैन, मराठी, गुजराती, क्रिस्चियन, और नॉर्थ इंडियन, सब मिलकर 20 से ज्यादा साल से शांति से रह रहे थे. कुछ दिन पहले सोसाइटी के अंदर, पेवर ब्लॉक्स यानी जो टाइल्स जमीन पर बिछी होती हैं, उन पर एक सफेद रंग की लाइन खींच दी गई. ये लाइन सड़क से सीधे एक बिल्डिंग के दरवाजे तक जाती है.
लाइन किसने खिंचवाई और क्यों?
सोसाइटी में पांच फ्लैट जैन परिवारों के हैं. उनमें से भूमि संघवी ने ये लाइन खिंचवाई. उन्होंने पहले सोसाइटी कमेटी से इजाजत ली और फिर लाइन बनवाई.
भूमि ने बताया कि जैन मुनि घर-घर जाकर भिक्षा यानी खाना मांगते हैं. लेकिन बारिश के मौसम में सोसाइटी की टाइल्स पर काई जम जाती है. उस काई में छोटे-छोटे जीव होते हैं. जैन धर्म में किसी भी जीव को नुकसान पहुंचाना मना है, इसलिए मुनि बारिश में सोसाइटी के अंदर नहीं आते. उनका कहना था कि घाटकोपर में ये सफेद लाइन कई जगह खींची जा रही है, फुटपाथ पर भी, दूसरी सोसाइटीज में भी. तो उनके सोसाइटी में भी पहली बार ऐसा किया गया.
किसने ऐतराज किया और क्यों?
सोसाइटी में वेदपाठक परिवार के 7 फ्लैट हैं. वो इस जमीन के असली मालिक भी हैं. उनके बेटे प्रसाद वेदपाठक एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं. जब सोसाइटी कमेटी ने उनकी बात नहीं सुनी, तब उन्होंने इस लाइन का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिया. वो वीडियो 4000 से ज्यादा बार शेयर हुआ और 17,000 से ज्यादा लोगों ने लाइक किया.
प्रसाद का कहना है कि साझा जगह पर किसी एक धर्म की निशानी नहीं होनी चाहिए. उन्होंने एक सवाल उठाया. वो बोले, ‘हम मराठी हैं, हमारी एक पूजा होती है जिसे गोंधल कहते हैं, जिसमें बकरे और मुर्गे की बलि दी जाती है. अगर हम उसे सोसाइटी में करने लगें तो? या फिर यहां जो गुजराती, क्रिस्चियन, नॉर्थ इंडियन रहते हैं, वो भी अपनी धार्मिक प्रथाएं यहां करने लगें तो?’ उनका कहना है कि साझा जगह पर किसी एक धर्म की चीज थोपी नहीं जा सकती.
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प्रसाद ने 5 जून को सोसाइटी कमेटी को एक औपचारिक चिट्ठी भी भेजी. उसमें उन्होंने मांग की कि सोसाइटी की साझा जमीन पर खींची गई ये धार्मिक लाइन हटाई जाए. उन्होंने कहा कि ये एक स्थायी बदलाव है जो साझा जगह को धार्मिक रंग देता है, लोगों के बीच बंटवारा बनाता है, और सबके साथ बराबरी का व्यवहार नहीं होने देता. उन्होंने 7 दिन का वक्त दिया था जवाब के लिए, लेकिन कमेटी ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया.
जैन परिवारों का क्या जवाब है?
जैन परिवारों का कहना है कि बस एक सफेद लाइन है, इससे किसी को क्या तकलीफ. भूमि संघवी ने कहा कि उनका इरादा सोसाइटी में झगड़ा करवाने का बिल्कुल नहीं था. अगर किसी को सच में तकलीफ है तो वो ऐसा दोबारा नहीं करेंगी. और लाइन का रंग वैसे भी बारिश में अपने आप हल्का पड़ता जाएगा और मिट जाएगा.
सोसाइटी के एक और जैन निवासी राजेश संघवी ने कहा कि अगर कमेटी इजाजत दे, तो हर कोई अपनी धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से काम कर सकता है. लेकिन वो भूमि की तरफ से बलि वाली बात पर कुछ नहीं बोले.
अभी मामला कहां है?
सोसाइटी कमेटी ने अभी तक न लाइन हटाई है और न ही प्रसाद की चिट्ठी का कोई जवाब दिया है. प्रसाद चाहते हैं कि लाइन तुरंत हटाई जाए. भूमि कह रही हैं कि बारिश खुद मिटा देगी. और सोसाइटी कमेटी चुप है.
सोशल मीडिया पर दोनों तरफ के लोग हैं. कुछ कह रहे हैं कि एक लाइन में इतना क्या है. कुछ कह रहे हैं कि साझा जगह साझी रहनी चाहिए, वहां किसी एक धर्म की निशानी नहीं होनी चाहिए.
फिलहाल वो सफेद लाइन वहीं है, और सोसाइटी के लोगों के बीच खिंची एक और लाइन भी.
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