कोविड-19 का दौर शायद ही कोई भूल सकता है. एक अनजान से वायरस ने आकर ना केवल भारत को बल्कि पूरी दुनिया को थमने पर मजबूर कर दिया था. इस महामारी ने लोगों को घरों में कैद कर दिया था. अगर उन्हें अपनी जान बचानी थी तो घर के बाहर कदम नहीं रखना था, लेकिन सर्वाइवल के लिए लोगों के लिए काम करना भी मजबूरी थी. ऐसे में कंपनियां कुछ ऐसा तरीका ढूंढ रही थीं जिससे उनका बिजनेस ठप ना हो और लोगों की नौकरी भी बची रहें. उस समय कंपनीज वर्क फ्रॉम होम की सुविधा लाई थीं, जिसमें लोगों को घर बैठे नौकरी करने का मौका मिला. महामारी के दिनों में लोगों की जिंदगी में आया वर्क फ्रॉम होम उसके बाद से लाखों लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन गया है. ऑफिस आने-जाने की झंझट खत्म हुई, समय बचा और काम में फ्लेक्सिबिलिटी भी मिली. यही वजह है कि आज भी बहुत से लोग घर से काम करने का ऑप्शन छोड़ना नहीं चाहते हैं. यहां तक कि लोग इस सुविधा के लिए अपनी सैलरी में भी थोड़ा बहुत कंप्रोमाइज करने के लिए तैयार हैं.
लेकिन वर्क फ्रॉम होम पसंद करने वाले लोगों के लिए एक बुरी खबर है. दरअसल, एक नई रिसर्च ने वर्क फ्रॉम होम की सुविधा के दूसरे पहलू की ओर ध्यान खींचा है. रिसर्च के मुताबिक, घर से काम करने वाले लोगों में अकेलापन, चिंता (एंग्जायटी) और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं. उनकी सामाजिक गतिविधियां भी कम हो रही हैं और वे पहले की तुलना में ज्यादा अलग-थलग महसूस कर रहे हैं.
लोग वर्क फ्रॉम होम के लिए सैलरी तक छोड़ने को तैयार
न्यूयॉर्क फेडरल रिजर्व बैंक की इकोनॉमिस्ट नतालिया इमैनुएल और उनकी टीम द्वारा की गई इस रिसर्च को जर्नल साइंस में पब्लिश किया गया है. नतालिया कहती हैं कि कई पुरानी रिसर्च में पाया गया है कि लोग घर से काम करने की फैसिलिटी पाने के लिए अपनी कमाई का 4% से 10% तक हिस्सा छोड़ने को भी तैयार रहते हैं. इससे साफ है कि वर्क फ्रॉम होम की मांग लोगों के बीच बहुत ज्यादा है.
हालांकि, उनकी रिसर्च में ये भी सामने आया कि घर से काम करने वाले लोग काम करने के दौरान ज्यादा समय अकेले बिताते हैं, साइकेट्रिस्ट के पास ज्यादा जाते हैं और अपनी मानसिक स्थिति को भी नकारात्मक तरीके से आंकते हैं.
वर्क फ्रॉम होम लोगों को कैसे बदल रहा है?
‘यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो’ के ‘बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस’ में बिहेवियरल साइंस के प्रोफेसर निकोलस एप्ली का कहना है कि लोग वर्क फ्रॉम होम चुनकर शायद अपने ही हित के खिलाफ फैसला ले रहे हैं. उनके मुताबिक, लोगों को रोज का ट्रैफिक, लंबा सफर और ऑफिस पहुंचने की परेशानी तो साफ दिखाई देती है, लेकिन वो ये नहीं समझ पाते कि रोजाना ऑफिस जाना, लोगों से मिलना-जुलना भविष्य में उनके मानसिक स्वास्थ्य को कितना प्रभावित कर सकता है. एप्ली का कहना है कि इंसान अक्सर दूसरों से जुड़ने और बातचीत करने के फायदे को कम आंकता है.
वैज्ञानिकों ने अमेरिका के पांच बड़े राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आंकड़ों को देखा और उन्होंने दो तरह की नौकरियों की तुलना की, जिनमें रिमोटेबल जॉब्स और नॉन रिमोटेबल जॉब्स शामिल हैं.
1. रिमोटेबल जॉब्स: ये ऐसी नौकरियां होती हैं जिन्हें घर से किया जा सकता है. इनमें सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, मार्केटिंग, आईटी और डिजिटल क्षेत्र की कई नौकरियां आती हैं.
2. नॉन-रिमोटेबल जॉब्स: ऐसी नौकरियां जिन्हें घर से करना मुमकिन नहीं होता है. इनमें सर्जरी, मैकेनिकल इंजीनियरिंग और कई फील्ड-बेस्ड काम शामिल होते हैं.
अकेले बिताया जाने वाला समय 58% तक बढ़ा
स्टडी में पाया गया कि रिमोट जॉब करने वाले लोग वर्क फ्रॉम होम करने के दौरान अकेले समय ज्यादा बिताने लगे. उनके अकेले बिताए जाने वाले घंटों में 58% की बढ़ोतरी देखी गई. इतना ही नहीं, उनके पूरे दिन बिना किसी के भी संपर्क में आने की संभावना 72% तक बढ़ गई.
नतालिया इमैनुएल के मुताबिक, इसका मतलब सिर्फ ऑफिस में बातचीत न होना नहीं है. कई लोगों का पूरा दिन ऐसा गुजर जाता है जब वे किसी से आमने-सामने बात तक नहीं करते हैं. यहां तक कि कॉफी लेने, बाजार जाने या रास्ते में किसी को देखकर हैंडशेक करने तक के लिए भी किसी से बातचीत नहीं होती है. कई लोग पूरे दिन एक भी इंसान से आमने-सामने बात किए बिना गुजार रहे हैं.
काम के बाद भी नहीं बढ़ रहा मेलजोल
स्टडी का एक और दिलचस्प आउटकम ये रहा कि घर से काम करने वाले लोग काम खत्म होने के बाद भी दोस्तों के साथ ज्यादा समय नहीं बिता रहे हैं. यानी जो पब्लिक कनेक्शन ऑफिस में कम हुआ, उसकी भरपाई वे शाम या छुट्टी के समय भी नहीं कर पा रहे हैं.
मानसिक तनाव, डॉक्टर विजिट और दवाइयों का बढ़ा इस्तेमाल
स्टडी में ये भी पाया गया कि वर्क फ्रॉम होम करने वाले लोगों में चिंता और डिप्रेशन के लक्षण ज्यादा दिखाई दिए. इसके साथ ही साइकेट्रिस्ट के पास जाने वाले लोगों की संख्या काफी बढ़ गई थी. मनोरोग संबंधी दवाओं का इस्तेमाल भी बहुत बढ़ गया था. ऐसे में ज्यादातर लोग इमोशनल रूप से बहुत स्ट्रेस में रहने लगे हैं.
अकेले रहने वालों पर सबसे ज्यादा असर देखने को मिला है. स्टडी के अनुसार, जो लोग अकेले रहते हैं उन पर वर्क फ्रॉम होम का असर और भी ज्यादा गंभीर है. ऐसे लोगों में पूरे दिन किसी और इंसान से संपर्क न होने की संभावना 83% तक बढ़ गई. इनमें मानसिक तनाव में बढ़ोतरी परिवार के साथ रहने वालों की तुलना में लगभग दोगुनी देखी गई.
निकोलस एप्ली कहते हैं कि ये नतीजा चौंकाने वाला नहीं है क्योंकि पहले भी कई स्टडी साबित कर चुकी हैं कि अकेलापन और लोगों से कम मिलने-जुलने के कारण मानसिक और शारीरिक हेल्थ दोनों को नुकसान पहुंचता है.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, लंबे समय तक अकेले रहने से ना केवल लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर, बल्कि शारीरिक हेल्थ पर भी बुरा असर डालता है. अकेले रहने की वजह से इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है, दिल और नर्वस सिस्टम के काम करने की क्षमता पर भी असर होता है, तनाव और उदासी भी बढ़ सकती है. स्टडी में ये भी पाया गया है कि खुशहाल और संतुष्ट जीवन का सबसे बड़ा आधार अच्छे सामाजिक रिश्ते होते हैं.
छोटी-छोटी बातचीत भी होती है फायदेमंद
ससेक्स यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक गिलियन सैंडस्ट्रॉम का कहना है कि इंसानों के लिए मिलना-जुलना और अपनापन महसूस करना बहुत जरूरी है. उनके अनुसार, अगर ये जरूरत पूरी न हो तो लोग मानसिक रूप से परेशान होने लगते हैं. गिलियन खुद भी अक्सर व्रर्क फ्रॉम होम करती हैं. वो बताती हैं कि लोगों से कनेक्शन बनाए रखने के लिए वो रोज घर से बाहर निकलती हैं, टहलती हैं, पड़ोसियों से मिलती हैं, लोगों से बातचीत करती हैं, टेनिस खेलती हैं और ऐसे शौक अपनाती हैं जिनसे दूसरे लोगों से मुलाकात होती रहे.
क्या अब सभी को ऑफिस लौट जाना चाहिए?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस स्टडी का मतलब ये नहीं है कि सभी कंपनियां अपने यहां काम करने वाले लोगों को जबरन ऑफिस बुलाना शुरू कर दें. लेकिन कंपनियों को ये समझना होगा कि वर्क फ्रॉम होम का मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है. इसलिए ऑफिस का माहौल ऐसा बनाया जाना चाहिए कि लोग वहां आना पसंद करें.
निकोलस एप्ली के अनुसार, अगर कर्मचारियों को ऑफिस बुलाया जाए तो ये भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि वहां उनके को-वर्कर्स मौजूद हों, ताकि उन्हें लोगों से मिलने-जुलने और बातचीत करने का मौका मिले.