अहमदाबाद विमान हादसा: ‘हमने अपने जीवन में कभी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं देखी’, डॉक्टरों ने बताया कैसा था खौफनाक मंजर? – ahmedabad air india crash civil hospital yearon response news in hindi – Jagran

अहमदाबाद सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. राकेश जोशी और फॉरेंसिक प्रमुख डॉ. धर्मेश पटेल ने भीषण विमान हादसे की पहली बरसी से पहले उस दिन की चुनौति …और पढ़ें
अहमदाबाद विमान हादसा।
डॉ. जोशी ने 12 जून के भीषण हादसे को याद किया।
अस्पताल ने सामूहिक हताहत प्रबंधन टीमें तुरंत बनाईं।
डीएनए पहचान से 254 पीड़ितों की सफलतापूर्वक पहचान हुई।
रितिका गोंधलेकर, अहमदाबाद। अहमदाबाद सिविल अस्पताल को देश के सबसे बड़े आपातकालीन रिस्पांस सेंटर में बदल देने वाले एअर इंडिया भीषण विमान हादसे को एक साल पूरा होने अब कुछ घंटो का ही समय शेष बचा हुआ है।
इस विमान आपदा की पहली बरसी से ठीक पहले, अहमदाबाद सिविल अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट (चिकित्सा अधीक्षक) डॉ. राकेश जोशी और फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. धर्मेश पटेल के साथ फोन पर विशेष बातचीत की गई, जिसमें उन्होंने उस दिन सामने आई चुनौतियों और उससे सीखे गए सबक को साझा किया।
मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने कैसे याद किया उस दिन को?
12 जून के उस काले दिन को याद करने मात्र के सवाल पर अहमदाबाद सिविल अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट (चिकित्सा अधीक्षक) डॉ. राकेश जोशी ने बताया कि उस दिन की शुरुआत भी बाकी दिनों की तरह बिल्कुल सामान्य थी।
जोशी ने बताया कि मैं एक लंबी सर्जरी (ऑपरेशन) कर रहा था, तभी दोपहर करीब 1:40 बजे मेरे सुरक्षा अधिकारी का फोन आया। पहले उसने कहा कि स्टाफ क्वार्टर के पास आग लग गई है। लेकिन कुछ ही सेकेंड बाद उसका दोबारा फोन आया और कहा गया कि सर, एक हवाई जहाज क्रैश हो गया है। मैंने अपने पूरे प्रोफेशनल करियर में इससे पहले कभी ये शब्द नहीं सुने थे।
डॉ जोशी ने इस सवाल के जवाब में बताया कि मेरा पहला विचार यही था कि बच्चों समेत बड़ी संख्या में घायल लोग किसी भी पल अस्पताल पहुंचने लगेंगे और हमें हर हाल में तैयार रहना होगा। मैंने तुरंत हमारे प्रोफेसरों और ट्रॉमा टीमों से संपर्क किया। मैंने उन सभी से कहा कि जो कोई भी उपलब्ध है और अस्पताल पहुंच सकता है, वह तुरंत ट्रॉमा सेंटर में रिपोर्ट करे। कुछ ही मिनटों में हमने सामूहिक हताहत प्रबंधन की तैयारियां शुरू कर दीं।
जोशी ने बताया कि हमने तुरंत ‘ट्राइएज’ टीमें बनाईं। मरीजों की गंभीर स्थिति के आधार पर उनका आकलन किया गया, जैसे किसे आईसीयू (ICU) की जरूरत है, किसे तुरंत ऑपरेशन की जरूरत है और कौन थोड़ी देर इंतजार कर सकता है। हमें यह भी अंदेशा था कि क्रैश साइट के आसपास रहने वाले स्थानीय लोग और बच्चे भी घायलों में शामिल हो सकते हैं, इसलिए पीडियाट्रिक और इमरजेंसी टीमों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया था।
जोशी ने बताया कि जो पहला मरीज आया, वह बहुत बुरी तरह झुलसा हुआ था और उसे तुरंत ऑपरेशन थिएटर में ले जाना पड़ा। उसके बाद करीब एक घंटे तक घायल मरीज लगातार आते रहे। हालांकि स्थिति बहुत तनावपूर्ण थी, लेकिन एक तरह से हमें इस बात की तसल्ली थी कि जितने ज्यादा घायल लोग लाए जा रहे थे, उसका मतलब था कि उतने ही लोग जिंदा बचे हैं। लेकिन ठीक एक घंटे बाद पूरा नजारा बिल्कुल उलट गया। अब हमारे पास जो आ रहे थे, वे बुरी तरह जल चुके शव थे, जिनकी पहचान करना नामुमकिन था। वही वो खौफनाक मंजर है जो आज भी हमारी आंखों के सामने घूम जाता है।
जोशी ने बताया कि मेरे करियर में देखी गई यह अब तक की सबसे बड़ी आपदा थी। हमने काम को तीन मुख्य हिस्सों में बांट दिया था: घायलों का इलाज, पोस्टमॉर्टम सेक्शन में शवों का प्रबंधन, और पीड़ितों के रिश्तेदारों को संभालना। हर काम के लिए अलग-अलग टीमें बनाई गई थीं। कुछ ही घंटों में स्वास्थ्य मंत्री, गृह मंत्री, मुख्यमंत्री और बाद में खुद प्रधानमंत्री ने अस्पताल का दौरा कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उनका निर्देश बिल्कुल साफ था: पीड़ित परिवारों के लिए इस पूरी प्रक्रिया को जितना हो सके व्यवस्थित और मानवीय बनाएं और हमने बस उसी का पालन किया।
आपके लिए व्यक्तिगत रूप से सबसे कठिन चुनौती क्या थी?
डॉ. जोशी ने बताया कि सबसे कठिन समय शुरुआती दो-तीन घंटे का था, जब हमें यह नहीं पता था कि कितने घायल आने वाले हैं, स्थिति कितनी गंभीर है, या अपने अपनों को ढूंढते हुए आ रहे बेबस रिश्तेदारों को हम क्या जवाब दें। उन पलों में हम खुद को लाचार महसूस कर रहे थे। लेकिन एक बार जब सिस्टम व्यवस्थित हो गया, तो टीम वर्क के दम पर हम आगे बढ़ते चले गए।
जोशी ने बताया कि हां, अब नए प्रोटोकॉल तैयार किए जा रहे हैं ताकि मेडिकल टीमों, फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स, पुलिस और सपोर्ट स्टाफ को एक समन्वित सिस्टम के जरिए तुरंत सक्रिय (मोबिलाइज) किया जा सके। हम सामूहिक हताहत वाली स्थितियों के लिए पहले से ही प्रशिक्षित थे, लेकिन इस घटना ने हमें सिखाया कि त्रासदी का पैमाना कितना बड़ा हो सकता है और ऐसे समय में टीम वर्क और पहले से तैयारी रखना कितना जरूरी है।
जो कुछ भी आपने देखा, उसके बाद आज आपके जहन में सबसे ज्यादा क्या बात टिकी हुई है?
जोशी ने बताया कि मैंने अपनी जिंदगी में ऐसा मंजर कभी नहीं देखा था। लेकिन इस आपदा के बीच मैंने एक असाधारण टीम वर्क भी देखा- डॉक्टर, नर्स, पुलिस, नगर निगम के अधिकारी, एनजीओ और वालंटियर्स, सभी एक ही मकसद के लिए मिलकर काम कर रहे थे। हम जानते थे कि हम उन लोगों को वापस जिंदा नहीं ला सकते, लेकिन हमने यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश की कि पीड़ित परिवारों को और ज्यादा मानसिक तकलीफ न झेलनी पड़े। मैं बस यही प्रार्थना करता हूं कि ऐसा दिन कभी दोबारा न आए।
कई शव ऐसे थे जिनकी पहचान करना नामुमकिन था। ऐसे में डीएनए पहचान कितनी महत्वपूर्ण थी?
इस सवाव के जवाब में फॉरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. धर्मेश पटेल ने बताया कि यह बेहद जरूरी और निर्णायक था। कई मामलों में पीड़ितों की पहचान करने का इसके अलावा कोई दूसरा भरोसेमंद रास्ता नहीं था। शवों के सैंपल इकट्ठा किए गए, उन पर लेबल लगाए गए और फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए, जबकि मिलान के लिए रिश्तेदारों के खून के सैंपल लिए गए। हमारी प्रयोगशालाओं (लैब्स) ने 17-18 दिनों तक चौबीसों घंटे काम किया और पहला कन्फर्म डीएनए मैच 48 घंटे से भी कम समय में आ गया था।
कुल मिलाकर, 254 पीड़ितों की पहचान डीएनए मैचिंग के जरिए की गई, जबकि 6 अन्य की पहचान चेहरे से की गई। पीड़ित परिवारों की सहूलियत के लिए हमने हर परिवार के लिए एक सिंगल फाइल तैयार की, जिसमें पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, डीएनए रिपोर्ट, डेथ सर्टिफिकेट और मृतक का निजी सामान जैसी सभी कानूनी जरूरी चीजें एक साथ रखी गईं। इसके अलावा, हादसे के पहले घंटे में करीब 71 घायलों का इलाज किया गया था। उसके बाद, बहुत कम जीवित बचे लोग आए। उस दौरान निजी अस्पतालों सहित पूरे अहमदाबाद के अस्पतालों ने तुरंत बेड और मेडिकल सपोर्ट की पेशकश की थी।

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