बुक रिव्यू: 'भरखमा': राजस्थानी माटी की सोंधी खुशबू और जीवन के संघर्षों की दास्तान, अतीत से सीखने और वर्तमान… – Dainik Bhaskar

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी के राजस्थानी कहानी संग्रह ‘भरखमा’ की सोमदत्त स्वामी (आरपीएस) ने समीक्षा की है। यह पुस्तक राजस्थानी माटी की सोंधी खुशबू, मानवीय धैर्य और जीवन के गहन संघर्षों को बड़ी आत्मीयता से पेश करती है।
राजस्थानी साहित्य में जब भी आधुनिक काल के सशक्त हस्ताक्षरों की बात आती है, तो डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी का नाम प्रमुखता से उभरता है। उनकी कृति *’भरखमा’* केवल तीन कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह राजस्थानी समाज, उसकी संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का एक जीवंत दस्तावेज़ है। ‘भरखमा’ शब्द अपने आप में एक गहरा अर्थ समेटे हुए है, जिसका तात्पर्य है—”धरती के समान धैर्यवान अथवा सहनशील”। लेखक ने 11वीं सदी के लोक काव्य ‘ढोला मारू रा दूहा’ से इस शब्द की प्रासंगिकता को जोड़ते हुए इसे आज के संदर्भ में परिभाषित किया है।
कथानक और पात्रों का ताना-बना
इस संग्रह की कहानियां मॉडर्न लाइफ स्टाइल को राजस्थानी साहित्य की मुख्यधारा से जोड़ती हैं। पुस्तक के प्रमुख पात्र—महिमा, गंगा दादी, नीलोफर और माइक—अपने-अपने स्तर पर जीवन के कठिन संघर्षों से जूझते हैं। लेखक ने इन पात्रों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि प्रेम केवल एक भावना नहीं, बल्कि ‘जीवन बचाने का एक संघर्ष’ है।
विशेष रूप से, गंगा दादी का चरित्र इतना जीवंत बन पड़ा है कि पाठक को लगता है जैसे वह उसके अपने पड़ोस की या घर की ही कोई बुजुर्ग महिला हो। कहानियों में रिश्तों की गहराई, त्याग और संघर्ष के सूक्ष्म तत्वों को बहुत ही रचनात्मक ढंग से पिरोया गया है।
भाषा शैली: डिंगल से जनभाषा तक का सफर
‘भरखमा’ की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भाषा है। अक्सर राजस्थानी साहित्य को क्लिष्ट ‘डिंगल’ शैली के कारण कठिन मान लिया जाता है, लेकिन डॉ. सोनी ने यहां ‘नाली’ क्षेत्र (हनुमानगढ़-गंगानगर बेल्ट) की आम बोलचाल की राजस्थानी का प्रयोग किया है। लेखक ने साहित्यिक बोझ को दरकिनार कर मुहावरों और कहावतों के जरिए भाषा में जो रवानगी पैदा की है, वह प्रशंसनीय है। उदाहरण के लिए, “बगत बड़ो बलवान हुवै” जैसी लोकोक्तियां कहानी के मर्म को सीधे पाठक के दिल तक पहुंचाती हैं। यह प्रयोग न केवल पुस्तक की पठनीयता बढ़ाता है, बल्कि राजस्थानी भाषा को आधुनिक युग में नई पहचान भी दिलाता है。
सामाजिक सरोकार और ‘सोशल मीडिया यूनिवर्सिटी’ पर प्रहार
यह पुस्तक आज की युवा पीढ़ी के लिए एक आईने की तरह है। लेखक ने हकीकत के महत्व पर जोर देते हुए उस ‘काल्पनिक स्वप्निल भविष्य’ की आलोचना की है, जो आज की पीढ़ी सोशल मीडिया के प्रभाव में बुन रही है। वे स्पष्ट करते हैं कि लक्ष्य केवल उसे ही प्राप्त होगा जो ‘भरखमा’ यानी धैर्यवान होगा।
संग्रह की कहानियां सांप्रदायिक सौहार्द का भी संदेश देती हैं। नीलोफर और माइक के प्रेम-प्रसंग के माध्यम से लेखक लिखते हैं—”ओ हिन्दू-मुस्लिम जोड़ो मुहब्बत री पींगां झूल रैयो है”। यह पंक्ति दर्शाती है कि मानवीय भावनाएँ किसी भी धर्म या बंधन से ऊपर हैं। साथ ही, विफलता के बाद एक माँ का संघर्ष और उसका अपने बच्चे के लिए पुन: प्रयास करना, पाठकों को गहरे तक प्रभावित करता है। लेखक ने एक माँ की ताकत की तुलना ‘भाखर’ (पहाड़) से की है।
समीक्षक की दृष्टि में: एक जरूरी पाठ
‘भरखमा’ को साल 2015 के *राजस्थानी भाषा श्रेणी के साहित्य अकादमी पुरस्कार* से नवाजा जा चुका है, जो इसकी साहित्यिक गुणवत्ता का प्रमाण है। एक समीक्षक के रूप में यह कहना गलत नहीं होगा कि यह पुस्तक केवल राजस्थान के लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। कहानी के पात्र और उनकी परिस्थितियां यूनिवर्सल हैं। समाज में व्याप्त मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक बिखराव के दौर में यह किताब ‘समझ’ और ‘धैर्य’ की वापसी का मार्ग प्रशस्त करती है।
लेखक ने इस बात पर भी ध्यान आकर्षित किया है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी भाषा की अनुपस्थिति एक कमी की तरह है, जिसे इस तरह का उत्कृष्ट साहित्य ही पूरा कर सकता है।
अतीत से सीखने और वर्तमान को सुधारने का मंत्र देती है पुस्तक
अंत में ‘भरखमा’ अतीत से सीखने और वर्तमान को सुधारने का मंत्र देती है, लेकिन अतीत की बुराइयों में उलझने से मना करती है। डॉ. जितेन्द्र कुमार सोनी ने एक प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ-साथ एक संवेदनशील साहित्यकार की दृष्टि से समाज की उन रगों को छुआ है, जो अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। यह पुस्तक उन सभी के लिए पढ़ी जानी चाहिए जो साहित्य में रुचि रखते हैं, सामाजिक न्याय को समझते हैं और राजस्थानी माटी की वास्तविक संस्कृति से रूबरू होना चाहते हैं। यह कृति हमें सिखाती है कि जीवन के हर रंग—चाहे वे खुशी के हों या उदासी के—हमारी अपनी सोच का परिणाम हैं।
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