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उद्धव ठाकरे अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं. अपने हिस्से की बची हुई शिवसेना को बचाए रखने के लिए, यथाशक्ति लगातार प्रयासरत हैं. सियासी सफलता के चार सूत्र सुझाए गए हैं. साम, दाम, दंड और भेद. सारे तौर तरीके आजमा पाना तो संभव नहीं है, फिर भी हर मुमकिन कोशिश जरूर कर रहे हैं.
शिवसेना (यूबीटी) का अध्यक्ष पद छोड़ने का ऑफर तो दे ही चुके हैं, एकनाथ शिंदे की तरह बगावत को आतुर सांसदों को गद्दार भी बता रहे हैं. और, संवाद के लिए सांसदों के पास संदेशवाहक भी भेज रहे हैं. आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, उद्धव ठाकरे ने विधायक कैलास पाटिल और वरुण सरदेसाई के जरिए बागी सांसद ओमप्रकाश राजे निंबालकर को अपना संदेश भी पहुंचा दिया था. आगे की बातचीत के लिए सभी विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को बुलाया भी है.
लेकिन, उद्धव ठाकरे के संदेश का ओमप्रकाश राजे निंबालकर पर कोई असर नहीं हुआ. उनके पिता पवनराजे निंबालकर की हत्या के मामले में सभी आरोपियों के बरी होने के बाद, माना जा रहा था कि ओमप्रकाश राजे निंबालकर मन बदल सकते हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. ओमप्रकाश राजे निंबालकर ने एकनाथ शिंदे के साथ जाने का ऐलान कर दिया है. महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की जोरदार चर्चा के बीच डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने कहा है, हम कोई ऑपरेशन अधूरा नहीं छोड़ते. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की भी प्रतिक्रिया आई है. कहा है, ऑपरेशन सफल रहा है… रिपोर्ट आ जाएगी.
उद्धव ठाकरे की हालत दोबारा ममता बनर्जी जैसी हो गई है. ममता बनर्जी को एक ही समय जोरदार झटका लगा है, उद्धव ठाकरे तो चार साल बाद पहले से भी ज्यादा बड़ा दर्द झेल रहे हैं. पहले झटके में सत्ता और संगठन गंवा देने के बाद भी कुछ राहत की बात जरूर थी. मुंबई में न सही, कम से कम दिल्ली में एकनाथ शिंदे से ज्यादा सांसद तो हैं. लेकिन, अब तो बर्बादी का नया काउंटडाउन शुरू हो गया है.
हाल फिलहाल उद्धव ठाकरे के भाषणों में जो कुछ भी सुनने को मिल रहा है, क्या ममता बनर्जी के मन में भी वही सब बातें चल रही होंगी?
एक इमोशनल अपील
शिवसेना की स्थापना के 60 साल पूरे होने के मौके पर मुंबई में हुए कार्यक्रम में उद्धव ठाकरे पार्टी के चार साल बाद फिर से उसी मोड़ पर पहुंच जाने को लेकर काफी भावुक दिखे. नेताओं और कार्यकर्ताओं के अलावा वहां सिर्फ तीन सांसद मौजूद थे. उद्धव ठाकरे ने मौका देखकर वो दांव भी चल दिया, जो नेता ऐसे नाजुक मौकों पर चल दिया करते हैं. बिहार चुनाव की हार के बाद तेजस्वी यादव ने भी ऐसी ही बात की थी, जिसके बाद लालू यादव ने स्थिति संभाल ली थी – लेकिन, उद्धव ठाकरे के पास तो ऐसा कोई था भी नहीं. संजय राउत तो कुछ ज्यादा ही ट्रोल हो रहे हैं.
उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘पिछले 12-13 साल से मैं एक नेता के तौर पर आप लोगों की सुन रहा हूं… अगर आपको लगता है कि जो आरोप मुझ पर लगाए जा रहे हैं, वे सच है तो मैं पार्टी प्रमुख से इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं…’
जब कोई संभालने वाला नहीं होता, तो इंसान स्वयं अलर्ट हो जाता है. उद्धव ठाकरे आगाह करते हुए कहते हैं, ‘…लेकिन मेरी नजर में एक चीज साफ है… सोने की शिवसेना चोरों के हाथों नहीं सौंपा जाना चाहिए… मेरे अंदर नेता बनने की लालसा नहीं है… मैं इस पद से इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं.’
लगा कि उद्धव ठाकरे भावनाओं में बहे चले जा रहे थे, लेकिन ऐन उसी वक्त वो सतर्क भी नजर आए, ‘पार्टी बदलने वाले आरोप लगा रहे हैं कि मैं उपलब्ध नहीं रहता, और सांसदों को समय नहीं देता. सारे आरोप मुझ पर लगाए जा रहे हैं… आप बताइए, क्या आप इन पर विश्वास करते हैं? अगर हां, तो मैं इसी वक्त अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार हूं… आप में से कोई एक आगे आए, मैं अभी उसे पार्टी सौंपने को तैयार हूं. आरोप लगाने वालों को आप जवाब दीजिए, मैं भागने वालों में से नहीं हूं… मैं मजबूती से खड़ा रहूंगा, लेकिन मुझे आपका साथ चाहिए.’
साथ छोड़ने वाले सभी ‘गद्दार’
पश्चिम बंगाल में ऋतब्रत बनर्जी की तुलना एकनाथ शिंदे से ही की गई थी. जैसे ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी विधायकों ने हाल में बगावत की है, एकनाथ शिंदे ने 40 विधायकों के साथ यह खेल 2022 में ही कर दिया था. ऋतब्रत बनर्जी की ही तरह काकोली घोष दस्तीदार ने दिल्ली में मोर्चा संभाला, और 20 सांसदों के साथ पार्टी छोड़ दी. उद्धव ठाकरे को एक बार फिर झटका एकनाथ शिंदे ही दे रहे हैं. 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन गए थे, जबकि ऋतब्रत बनर्जी को स्पीकर ने विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी है.
उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी के खिलाफ हुई बगावतों में कुछ फर्क भी है, और कुछ कॉमन बातें भी. उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी दोनों को दो-दो झटके लगे हैं. ममता बनर्जी को डबल झटका एक साथ लगा है, जबकि उद्धव ठाकरे को चार साल के अंतर पर. बर्बादी के हिसाब से देखें तो दोनों नेता एक ही मोड़ पर पहुंच चुके हैं.
एकनाथ शिंदे को बगावत के बाद से ही उद्धव ठाकरे अक्सर गद्दार बोलकर संबोधित करते रहे हैं, और अब साथ छोड़ने वाले सांसदों को भी गद्दार कहने लगे हैं. बागी हो चुके सांसद संजय दिना पाटिल के गढ़ मुंबई के भांडुप में एक रैली में बीजेपी नेतृत्व और बागी सांसद उद्धव ठाकरे के निशाने पर थे. उनका कहना था, ‘मेरे सामने सिर्फ शिवसैनिक नहीं, बल्कि जलती हुई मशालें खड़ी हैं.’
उद्धव ठाकरे ने कहा, मैं गद्दारों और उनके आकाओं का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने इन मशालों को फिर से जला दिया. मैंने स्थापना दिवस पर जो वादा किया था, अब उस पर अमल शुरू कर दिया है. जहां-जहां विश्वासघात हुआ है, वहां-वहां मैं खुद जाकर लोगों से माफी मांग रहा हूं.
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा, उन्हें उम्मीदवार बनाना हमारी गलती थी… और उसके लिए मैं आप सबसे माफी मांगता हूं. उद्धव ठाकरे ने कहा कि जनता ने पाला बदलने वाले सांसदों को शिवसेना और मशाल चुनाव निशान देखकर चुना था.
बागी सांसदों को जीभर कोसते हुए बोले, मैं इन गद्दारों से पूछता हूं कि उनकी दाढ़ी भी खुद की है या वह भी किराए पर ली गई है? आप दाढ़ी किराए पर ले सकते हैं, गाड़ी किराए पर ले सकते हैं, कुर्सी किराए पर ले सकते हैं, लेकिन ऐसे वफादार लोग कभी नहीं खरीद सकते जो आपके लिए जान देने को तैयार हों… अगर उन्हें सीट नहीं मिली होती, तो क्या वे सांसद बन पाते? और अगर सांसद नहीं बनते?
कांग्रेस में विलय के मुद्दे पर उद्धव का तर्क
उद्धव ठाकरे पर कांग्रेस के साथ जाने को लेकर हमेशा ही हमले होते रहे हैं, और ताजा बगावत में भी कांग्रेस का नाम लिया गया है. बागी सांसदों का कहना था कि शिवसेना (यूबीटी) के कांग्रेस में विलय की बात चल रही थी, जो उनको स्वीकार नहीं है. उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस के साथ विलय के मुद्दे पर तो अपना रुख साफ किया ही, कांग्रेस को बीजेपी से बेहतर भी बताया है. बोले, बीजेपी ने हमेशा शिवसेना को खत्म करने की साजिश रची, जबकि कांग्रेस ने कभी ऐसा प्रयास नहीं किया.
कुछ दिन पहले ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को लेकर भी कांग्रेस में विलय की काफी चर्चा थी. हालांकि, बाद में टीएमसी और कांग्रेस दोनों पक्षों ने ऐसी चर्चाओं को पूरी तरह खारिज कर दिया था. अब उद्धव ठाकरे की तरफ से भी शिवसेना-यूबीटी के कांग्रेस में विलय के दावों को खारिज कर दिया गया है.
बागी सांसदों के आरोपों का जवाब देते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा है, 30 साल तक बीजेपी के साथ गठबंधन में रहने के बावजूद उसमें विलय नहीं किया… जो लोग पार्टी छोड़ रहे हैं, वे कहते हैं कि उन्हें डर था कि हम कांग्रेस में विलय कर लेंगे.
बीजेपी और कांग्रेस की तुलना करते हुए उद्धव ठाकरे का कहना है, ‘हमने 30 साल तक कांग्रेस से लड़ाई लड़ी, लेकिन उसने कभी हमारे नेताओं को चुराने या शिवसेना को उस तरह खत्म करने की कोशिश नहीं की, जैसा बीजेपी ने किया… जब बीजेपी को सड़क पर कोई पूछता तक नहीं था, तब हमने उसका हाथ पकड़कर उसे बड़ा किया. उस वक्त उनके पास पूरे देश में सिर्फ दो सांसद थे… बीजेपी के पास अपना कुछ नहीं है. यह दूसरों के बच्चों को चुराकर बड़ी हुई पार्टी है.’
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