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संयुक्त राष्ट्र वैश्विक आतंकवाद विरोधी रणनीति (जीसीटीएस) की नौवीं समीक्षा के दौरान भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वथनेनी ने आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में दोहरे मानदंडों की कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ ढुलमुल रवैया और राजनीतिक हित मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वथनेनी ने बुधवार एक जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र महासभा में वैश्विक आतंकवाद विरोधी रणनीति (जीसीटीएस) की नौवीं समीक्षा के अंगीकार होने के अवसर पर भारत का कड़ा रुख स्पष्ट किया है.
3 दशकों की देरी पर बरसे राजदूत
उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में इस बेहद जटिल बातचीत को संचालित करने के लिए फिनलैंड और मोरक्को के प्रयासों की सराहना की. उन्होंने याद दिलाया कि साल 2006 में जीसीटीएस को अपनाने से पूरे एक दशक पहले ही भारत ने साल 1996 के आसपास व्यापक कन्वेंशन (CCIT) को अपनाने की पुरजोर मांग की थी.
उन्होंने कहा कि लगभग तीन दशकों की लंबी देरी ने आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक प्रयासों को गंभीर रूप से बाधित किया है. एक सार्वभौमिक कानूनी ढांचे की कमी के कारण आतंकियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और प्रत्यर्पण की प्रक्रिया बेहद कमजोर बनी हुई है, जिसे दूर करने के लिए अब वैश्विक राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाने का समय आ चुका है.
सीमा पार आतंकवाद का दर्द झेल रहा भारत
भारतीय प्रतिनिधि ने वैश्विक मंच पर भारत का अनुभव साझा करते हुए कहा कि हमारा देश दशकों से सीमा पार से होने वाले आतंकवाद का सबसे बड़ा शिकार रहा है. देश के अनगिनत नागरिकों ने अपनी जान गंवाकर इसकी भारी कीमत चुकाई है, जिससे कई परिवार हमेशा के लिए बिखर गए. इसी कड़वे अनुभव ने आतंकवाद के प्रति भारत के दृष्टिकोण को ‘जीरो टॉलरेंस’ के रूप में आकार दिया है.
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी तरह की राजनीतिक या भू-राजनीतिक हित के आधार पर आतंकवादी कृत्यों को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता है और इसके हर रूप की बिना किसी शर्त के निंदा होनी चाहिए.
Delivered India’s statement at Adoption of the Ninth Review of the United Nations Global Counter-Terrorism Strategy in the @UN today. As Prime Minister @NarendraModi has said, “Terror anywhere threatens peace everywhere”
Made the following points:
➡️ Called for adoption of the… pic.twitter.com/WvXNFrMQ8a
आतंकवाद के खिलाफ भारत की 6 मुख्य प्राथमिकताएं
भारत ने वैश्विक समुदाय के सामने रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए छह प्रमुख प्राथमिकताओं को रेखांकित किया. पहली प्राथमिकता के तहत आतंकवाद के संरक्षकों, वित्तपोषकों और आयोजकों की जवाबदेही तय करने तथा दोहरे रवैये को पूरी तरह खत्म करने की मांग की गई.
दूसरी प्राथमिकता में टेरर फाइनेंसिंग को रोकने के लिए वित्तीय खुफिया जानकारी साझा करने और एफएटीएफ (फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स) के मानकों को कड़ाई से लागू करने पर जोर दिया गया, ताकि कोई भी क्षेत्र आतंकियों के लिए वित्तीय जरिया न बन सके.
तीसरी प्राथमिकता के तौर पर आतंकियों द्वारा एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन, ड्रोन, सोशल मीडिया, मैपिंग ऐप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), डीपफेक, डार्क वेब और वर्चुअल एसेट जैसी उभरती हुई नई तकनीकों के दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त की गई. भारतीय राजदूत ने इस बात पर गहरा दुख जताया कि वर्तमान समीक्षा में इस महत्वपूर्ण तकनीकी खतरे पर कोई स्वीकार्य सहमति नहीं बन सकी.
चौथी प्राथमिकता में उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अक्सर आतंकवाद पर केवल संस्थागत या प्रक्रियात्मक भाषा में बात करती है, जबकि इसके असली पीड़ितों की आवाज को बाद में याद किया जाता है, पीड़ितों को उचित सम्मान और पुनर्वास मिलना ही चाहिए.
पांचवीं प्राथमिकता के रूप में भारत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग और क्षमता निर्माण के प्रयास व्यावहारिक तथा जरूरतमंद देश की मांगों के अनुरूप होने चाहिए. ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों पर उनकी प्राथमिकताओं के खिलाफ जाकर किसी भी प्रकार के बाहरी ढांचे को थोपने से बचा जाना चाहिए.
छठी और सबसे महत्वपूर्ण बात कहते हुए राजदूत ने साफ किया कि ‘एक आतंकवादी सिर्फ एक आतंकवादी होता है’. दुनिया को बिना किसी अच्छे या बुरे का भेद किए इस खूनी विचारधारा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए हाथ से हाथ मिलाकर काम करना होगा.
राजनीतिक जोड़-तोड़ का बंधक बना यूएन
भारत ने हमेशा वैश्विक आतंकवाद विरोधी प्रयासों में वित्तीय और रणनीतिक रूप से बड़ा योगदान दिया है, जिसमें ‘नो मनी फॉर टेरर’ सम्मेलन और नए तकनीकी दुरुपयोग के खिलाफ ‘दिल्ली डिक्लेरेशन’ प्रमुख उदाहरण हैं. राजदूत ने दुख जताया कि दिल्ली डिक्लेरेशन के दो स्तंभ अबू धाबी और अल्जीरिया के मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में वैश्विक स्तर पर लागू हैं, फिर भी साल 2023 की जीसीटीएस रिपोर्ट में इस ऐतिहासिक घोषणा का कोई जिक्र नहीं किया गया. उन्होंने इसे महासभा के अंदर छोटे राजनीतिक हितों और जोड़-तोड़ की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति करार दिया, जिसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय आज भी बर्दाश्त कर रहा है.
राजदूत पर्वथनेनी ने स्पष्ट किया कि काउंटर-टैररिज्म की इस पूरी रणनीति को झूठी समानताओं या राजनीतिक आख्यानों के जरिए खोखला नहीं किया जाना चाहिए. आतंकवाद के फैलने के कारणों पर बात करना ठीक है, लेकिन संदर्भ को कभी भी आतंकवाद के औचित्य के रूप में भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने मानवाधिकारों और कानून के शासन को बनाए रखने का समर्थन करते हुए कहा कि दुनिया को यह याद रखना होगा कि पहला मानवाधिकार ‘जीवन का अधिकार’ है, और आतंकवाद इसी बुनियादी मानवाधिकार पर सबसे सीधा और क्रूर हमला है.
पूर्वाग्रह पर लगे रोक
संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सल सदस्यता का हवाला देते हुए भारत ने कहा कि हमारा नजरिया भी पूरी तरह से यूनिवर्सल होना चाहिए. भारत किसी भी धर्म, जातीयता, राष्ट्रीयता या भूगोल के खिलाफ पूर्वाग्रह से प्रेरित सभी कृत्यों की कड़ी निंदा करता है. संयुक्त राष्ट्र को केवल इस्लामोफोबिया, क्रिश्चियनफोबिया और यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिज्म) हरकतों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस प्रतिष्ठित संस्था को ये भी स्वीकार करना होगा कि इस प्रकार के धार्मिक पूर्वाग्रह और डर अन्य धर्मों के प्रति भी तेजी से फैल रहे हैं.
भाषण के अंत में राजदूत ने संयुक्त राष्ट्र आतंकवाद निरोधक कार्यालय (UNOCT) के साथ भारत के करीबी सहयोग और क्षमता निर्माण परियोजनाओं में वित्तीय योगदान को रेखांकित किया. उन्होंने चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग की कमी और प्रतिबंध व्यवस्थाओं में पारदर्शिता न होने के गंभीर परिणाम होंगे. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसिद्ध संदेश को उद्धृत करते हुए कहा कि ‘आतंकवाद कहीं भी हो, वह हर जगह की शांति के लिए खतरा है’. दुनिया आतंकवाद पर किसी भी तरह की अस्पष्टता बर्दाश्त नहीं कर सकती और इस महासभा को अब एक मजबूत नेतृत्व दिखाना होगा.
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