पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आते ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) और शिवसेना (UBT) में टूट हो गई। इस सियासी घटना के बाद विपक्ष का खेमा कमजोर होता दिख रहा है। वहीं, सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) मजबूत हुआ है। विपक्षी दलों में बिखराव और बागी गुटों का भाजपा को मिल रहा समर्थन एक सोची-समझी रणनीति है। भाजपा किसी भी तरह संसद में दो-तिहाई बहुमत का जादुई आंकड़ा छूना चाहती है ताकि वह संविधान में बड़े बदलाव कर सके।
नए सांसदों के समर्थन से केंद्र सरकार आगामी मॉनसून सत्र में परिसीमन को लेकर संविधान संशोधन विधेयक लाने और महिला आरक्षण कानून को अमलीजामा पहनाने की एक और कोशिश कर सकती है। इसके अलावा 17 जुलाई को सरकार संसद में 130वां संविधान संशोधन विधेयक भी पेश कर सकती है। इस बिल का उद्देश्य गंभीर अपराधों में लगातार 30 दिनों तक जेल या हिरासत में रहने वाले मंत्रियों को पद से हटाना है। विपक्ष इन दोनों ही मुद्दों पर सरकार के खिलाफ लामबंद रहा है और इससे पहले अप्रैल में उसने लोकसभा और विधानसभाओं की सीटें बढ़ाने के सरकार के प्रयास को नाकाम कर दिया था।
संविधान के अनुच्छेद 368 के मुताबिक, संविधान में संशोधन की प्रक्रिया संसद के किसी भी सदन में विधेयक पेश करके ही शुरू की जा सकती है। इस बिल को पास कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। अगर मौजूदा लोकसभा के सभी 540 सिटिंग सांसद सदन में मौजूद रहकर मतदान करते हैं तो दो-तिहाई की शर्त को पूरा करने के लिए सरकार को कम से कम 360 वोटों की जरूरत होगी।
इसी साल अप्रैल में 131वें संविधान संशोधन विधेयक, 2026 पर हुई वोटिंग के दौरान कुल 540 सांसदों में से 528 ने हिस्सा लिया था। इनमें से 298 ने बिल के पक्ष में और 230 ने इसके खिलाफ वोट किया, जबकि 11 सांसद अनुपस्थित रहे। अनुपस्थित रहने वालों में तृणमूल कांग्रेस के 7, कांग्रेस के 2 और जेल में बंद 2 निर्दलीय सांसद शामिल थे। हालांकि एनडीए ने 273 वोटों की पहली शर्त तो आसानी से पार कर ली, लेकिन वह दो-तिहाई के आंकड़े से चूक गया। उस समय एनडीए के पास 293 वोट थे बाकी 5 वोट अन्य दलों से मिले थे, जिसमें भाजपा के 240, टीडीपी के 16, जदयू के 12, एकनाथ शिंदे की शिवसेना के 7 और लोजपा के 5 सांसद शामिल थे।
पिछले कुछ दिनों में विपक्षी खेमे में बड़ी सेंधमारी हुई है। दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसद पार्टी से अलग हो गए और उन्होंने एक छोटे दल नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपना विलय कर लिया। इसके साथ ही उद्धव ठाकरे गुट के 9 सांसदों में से 6 सांसद पाला बदलकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए। इस उठापटक के बाद अब लोकसभा में एनडीए को लगभग 318 से 319 सांसदों का समर्थन हासिल होने का अनुमान है। हालांकि दो-तिहाई के लिए जरूरी 360 के आंकड़े से वे अब भी 41 से 42 सीटें दूर हैं।
इस दूरी को पाटने के लिए भाजपा की नजर अब डीएमके (DMK) पर है, जिसके पास 22 सांसद हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़कर अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके (TVK) से हाथ मिलाने के बाद से डीएमके नाराज चल रही है। सूत्रों की मानें तो डीएमके का एक धड़ा विशेष मुद्दों पर भाजपा के साथ बातचीत के लिए तैयार दिख रहा है।
इस दलबदल से विपक्षी गठबंधन को करारा झटका लगा है। पहले इस गुट के पास कुल 225 सांसद थे, लेकिन टीएमसी और शिवसेना (UBT) में टूट के बाद यह संख्या 26 कम हो गई है। ऊपर से डीएमके को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। मॉनसून सत्र में यदि सरकार इन विधेयकों को दोबारा लाती है तो वह जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआरसीपी का समर्थन जुटाने की कोशिश करेगी, जिसके पास चार सांसद हैं। इसके अलावा, रणनीति यह भी हो सकती है कि डीएमके और शरद पवार की एनसीपी (एसपी) जैसे दलों को वोटिंग से दूर रहने के लिए राजी कर लिया जाए। अगर ये दोनों दल वोटिंग का बहिष्कार करते हैं तो उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों की संख्या कम हो जाएगी, जिससे दो-तिहाई का जादुई आंकड़ा घटकर 330 पर आ जाएगा। ऐसी स्थिति में वाईएसआरसीपी और निर्दलीय सांसदों के दम पर सरकार महज 2 वोटों की दूरी पर रह जाएगी।
245 सीटों वाली राज्यसभा में फिलहाल 242 सीटें भरी हुई हैं। यहां पहली शर्त के लिए 123 और दो-तिहाई के लिए 161 वोटों की जरूरत है। भाजपा के पास आम आदमी पार्टी (AAP) से आए 7 सांसदों को मिलाकर खुद के 114 सांसद हैं और सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा करीब 140 तक पहुंचता है, जो बहुमत के करीब तो है लेकिन दो-तिहाई से दूर है।
बिहार के दरभंगा जिले से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु शेखर झा डिजिटल मीडिया जगत का एक जाना-माना नाम हैं। विज्ञान पृष्ठभूमि से होने के बावजूद (BCA और MCA), पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने IGNOU से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया और मीडिया को ही अपना कर्मक्षेत्र चुना।
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हिमांशु की पहचान विशेष रूप से राजनीति के विश्लेषक के तौर पर होती है। उन्हें बिहार की क्षेत्रीय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय राजनीति की गहरी और बारीक समझ है। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और कई विधानसभा चुनावों को बेहद करीब से कवर किया है, जो उनके वृहद अनुभव और राजनीतिक दृष्टि को दर्शाता है।
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