अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब भारत के चावल निर्यात पर साफ दिखने लगा है। मिडिल ईस्ट, जो भारतीय बासमती चावल का बड़ा बाजार है, वहां जाने वाला व्यापार हॉर्मूज स्ट्रेट प्रभावित होने से ठप पड़ गया है। हालात यह हैं कि हजारों करोड़ रुपये का चावल य
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं बोर्ड ऑफ ट्रेड के गैर-सरकारी सदस्य सतीश गोयल ने बताया कि हॉर्मूज स्ट्रेट के बंद होने से करीब एक लाख टन बासमती चावल बंदरगाहों पर पिछले 25 दिनों से रुका हुआ है। यह माल आगे नहीं बढ़ पा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो यह माल खराब होने का खतरा भी पैदा हो जाएगा। इस मामले को लेकर हाल ही में केंद्र सरकार से बातचीत की गई है, जहां से निर्यात को सुचारु बनाने के लिए समाधान निकालने का आश्वासन मिला है।
हरियाणा का 1000 करोड़ से ज्यादा का माल फंसा सतीश गोयल के अनुसार, हरियाणा के निर्यातकों का करीब एक से डेढ़ लाख टन चावल बंदरगाहों पर अटका हुआ है, जिसकी कीमत 1000 करोड़ रुपये से अधिक है। कुछ माल कांडला पोर्ट पर पड़ा है, जबकि कुछ समुद्र में जहाजों के जरिए बीच रास्ते में रुका हुआ है। इस स्थिति को बने हुए लगभग 25 दिन हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि इसका सबसे बड़ा नुकसान व्यापारियों को हो रहा है, क्योंकि बैंक ब्याज लगातार बढ़ रहा है और परिवहन खर्च भी बढ़ गया है। बारिश के मौसम में बंदरगाहों पर पड़ा चावल खराब होने की आशंका भी बढ़ गई है। ऐसे में निर्यातकों ने सरकार से मांग की है कि उन्हें वित्तीय राहत या अनुदान दिया जाए, ताकि नुकसान की भरपाई हो सके। सरकार ने आश्वासन दिया है कि व्यापारियों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा और जल्द समाधान निकाला जाएगा।
नया सीजन नजदीक, पेमेंट अटकी तो खरीद पर असर निर्यातकों की चिंता इस बात को लेकर भी है कि दो से तीन महीने बाद नया धान सीजन शुरू होने वाला है। अगर मौजूदा माल समय पर विदेश नहीं पहुंचा और उसकी पेमेंट नहीं आई, तो व्यापारी नया धान खरीदने में सक्षम नहीं होंगे। इससे किसानों पर भी सीधा असर पड़ सकता है। सतीश गोयल ने बताया कि इस समय जो चावल सेलरों में तैयार हो रहा है, उस पर भी प्रति माह करीब 1 प्रतिशत की दर से ब्याज लग रहा है। यदि निर्यात में देरी होती है, तो यह लागत और बढ़ेगी, जिससे व्यापारियों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।
मिडिल ईस्ट बाजार पर सबसे ज्यादा असर भारत का बड़ा हिस्सा चावल निर्यात मिडिल ईस्ट देशों में जाता है। ईरान, इराक और सऊदी अरब जैसे देशों में हर साल करीब 30 लाख टन चावल भेजा जाता है, जिसमें प्रत्येक देश को लगभग 10-10 लाख टन निर्यात होता है। मौजूदा तनाव के चलते पूरा क्षेत्र अस्थिर हो गया है, जिससे व्यापार प्रभावित हो रहा है। निर्यातकों को फ्रेट और इंश्योरेंस की बढ़ती लागत का भी सामना करना पड़ रहा है। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से शिपिंग चार्ज बढ़ गए हैं, वहीं जोखिम बढ़ने के कारण बीमा प्रीमियम भी महंगा हो गया है।
सरकार के सामने रखी गई मांगें निर्यातकों ने केंद्र सरकार के सामने कई मांगें रखी हैं। इनमें ट्रांसपोर्टेशन की समस्याओं का समाधान, बढ़े हुए रेट और ब्याज पर राहत, बंदरगाहों पर लगने वाले डेमरेज चार्ज को माफ करना और रास्ते में फंसे माल पर ‘वार कवर’ (बीमा सुरक्षा) देना शामिल है। सतीश गोयल ने बताया कि सरकार इन मांगों पर गंभीरता से विचार कर रही है और अगले सप्ताह फिर बैठक कर स्थिति की समीक्षा की जाएगी।
रिकॉर्ड निर्यात के बाद इस साल बढ़ाने का लक्ष्य 1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2026 तक भारत ने 65 लाख टन चावल का निर्यात किया था, जो एक रिकॉर्ड रहा। इस बार निर्यातकों का लक्ष्य 70 लाख टन तक पहुंचने का है, लेकिन मौजूदा हालात इस लक्ष्य के सामने बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। सतीश गोयल ने कहा कि अगर अंतरराष्ट्रीय हालात जल्द सामान्य हो जाते हैं और हॉर्मूज का रास्ता खुल जाता है, तो निर्यात में फिर तेजी आ सकती है। लेकिन यदि तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो न केवल निर्यात प्रभावित होगा बल्कि विदेशी मुद्रा आय पर भी असर पड़ेगा।
आगे की राह पर टिकी नजरें फिलहाल चावल निर्यातक सरकार के फैसलों और अंतरराष्ट्रीय हालात में सुधार की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो इसका असर व्यापारियों के साथ-साथ किसानों तक पहुंच सकता है। ऐसे में आने वाले कुछ सप्ताह चावल उद्योग के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।
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