कहानी एक 'अंधेरे द्वीप' की, जहां कभी आधुनिकता का सूरज भी चमकता था! – Aaj Tak News

Feedback
आज जब हम उत्तर कोरिया का नाम सुनते हैं, तो जेहन में एक ऐसे रहस्यमयी देश की तस्वीर उभरती है, जो दुनिया से पूरी तरह कटा हुआ है. परमाणु मिसाइलें, भूख से जूझते लोग, इंटरनेट पर पूर्ण पाबंदी और किम जोंग उन की सैन्य परेड इस देश की पहचान बन चुके हैं. लेकिन इतिहास की टाइम मशीन में बैठकर अगर हम सिर्फ 80-90 साल पीछे जाएं, तो नजारा इसके बिल्कुल उलट था.
आज जिसे हम उत्तर कोरिया कहते हैं, वह कभी पूरे कोरियाई प्रायद्वीप का सबसे आधुनिक, अमीर और औद्योगिक रूप से जीवंत हिस्सा हुआ करता था. इतिहास के पन्नों, संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक रिपोर्टों और दस्तावेजों से जब हम किम वंश का शासन आने से पहले के दौर को खंगालते हैं, तो एक ऐसी कहानी सामने आती है जो हैरान भी करती है और उदास भी.
यह भी पढ़ें: धरती के ‘पाताल’ में बसी अनोखी दुनिया… जहां की हवा फेफड़ों को एक्स्ट्रा आराम देती है!
साल 1948 में कोरिया के दो हिस्सों में बंटने और किम इल सुंग द्वारा उत्तर कोरिया की स्थापना से पहले, यह इलाका एक अखंड और अविभाजित कोरिया का हिस्सा था. द कोरियन जर्नल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज और ब्रिटिश लाइब्रेरी के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 20वीं सदी की शुरुआत में आज की राजधानी प्योंगयांग ईसाई धर्म, आधुनिक शिक्षा और पश्चिमी संस्कृति का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करती थी. उस दौर में प्योंगयांग को पूरे एशिया में ‘पूर्व का यरुशलम’ कहा जाता था.
वहां सैकड़ों चर्च थे, मिशनरी स्कूल थे और लोग आधुनिक पश्चिमी विचारों को अपना रहे थे. कला, संगीत और सिनेमा फल-फूल रहे थे. लोगों को अपनी आस्था चुनने और खुलकर जीने की पूरी आजादी थी. एक ऐसी आजादी, जिसकी कल्पना आज के उत्तर कोरिया में करना भी मौत को दावत देने जैसा है.
आज एक आम धारणा यह है कि उत्तर कोरिया हमेशा से एक पिछड़ा इलाका रहा है, लेकिन आर्थिक आंकड़े कुछ और ही बयां करते हैं. 1910 से 1945 के बीच, जब कोरिया पर जापान का क्रूर औपनिवेशिक शासन था, तब जापानी साम्राज्य ने अपनी सैन्य और औद्योगिक जरूरतों के लिए इस प्रायद्वीप का एक खास नक्शा तैयार किया. चूंकि उत्तर का इलाका खनिज पदार्थों, कोयले और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध था, इसलिए जापान ने इसे अपना इंडस्ट्रियल हब बनाया. यहां बड़े-बड़े हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्लांट, विशाल स्टील फैक्ट्रियां, रासायनिक संयंत्र और रेलवे का एक नेटवर्क तैयार किया गया.
एशिया सोसाइटी के ऐतिहासिक डेटा बताते हैं कि उस दौर में आज का दक्षिण कोरिया मुख्य रूप से सिर्फ खेती-बाड़ी पर निर्भर एक बेहद गरीब इलाका था, जबकि उत्तर का इलाका तकनीकी और आर्थिक रूप से कहीं आगे था.
लेकिन तभी आता है इतिहास का वो मोड़ जिसने पूरे हालात को 360 डिग्री टर्न दे दिया. द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद, 1945 में दोनों महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ ने कोरिया को 38वीं समानांतर रेखा से दो हिस्सों में बांट दिया. उत्तर का हिस्सा कम्युनिस्ट सोवियत संघ के प्रभाव में चला गया और 1948 में किम इल सुंग को सत्ता सौंपी गई, जिससे किम राजवंश की नींव पड़ी. इसके बाद 1950 से 1953 तक चला भयावह कोरियाई युद्ध.
यह भी पढ़ें: अरबपतियों के शहर में ‘मिडिल क्लास’ जिंदगी! कितना मुश्किल है यहां ‘आम’ होना
कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस की रिसर्च के अनुसार, इस युद्ध में अमेरिकी बमबारी ने उत्तर कोरिया के तमाम समृद्ध शहरों, फैक्ट्रियों और बांधों को पूरी तरह मलबे में तब्दील कर दिया. युद्ध के बाद, सोवियत संघ और चीन की भारी आर्थिक मदद से उत्तर कोरिया ने बहुत तेजी से वापसी की और 1970 के दशक तक उसकी प्रति व्यक्ति आय दक्षिण कोरिया के बराबर या कई मामलों में बेहतर थी.
लेकिन फिर असली तबाही तब शुरू हुई जब किम इल सुंग ने ‘जुचे’ यानी आत्मनिर्भरता के एक सख्त और कड़े कम्युनिस्ट सिद्धांत को देश पर थोप दिया. इसका नतीजा यह हुआ कि उत्तर कोरिया ने बाकी दुनिया के लिए अपने दरवाजे बंद कर लिए. 1990 के दशक में जब सोवियत संघ का पतन हुआ, तो उत्तर कोरिया को मिलने वाली मुफ्त विदेशी मदद और रियायती तेल मिलना बंद हो गया. देश एक भयानक अकाल की चपेट में आ गया. ह्यूमन राइट्स वॉच और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान कुपोषण और भूख से लाखों मासूम लोगों की मौत हो गई. इसी मोड़ ने दोनों कोरियाई देशों की किस्मत हमेशा के लिए बदल दी.
दक्षिण कोरिया ने लोकतंत्र और खुली अर्थव्यवस्था को अपनाकर दुनिया की शीर्ष आर्थिक ताकतों में जगह बना ली, जबकि उत्तर कोरिया ने अपनी बची-कुची दौलत परमाणु हथियार बनाने में झोंक दी. फिर किम फैमिली के शासन में एक आम नागरिक की निजी पहचान को पूरी तरह मिटा दिया गया. आज उत्तर कोरिया में कोई भी बच्चा आजाद पैदा नहीं होता.
वहां सोंगबुन नाम की एक व्यवस्था काम करती है. बच्चे के दादा-परदादा ने किम परिवार के प्रति कितनी वफादारी दिखाई थी, उसके आधार पर पुलिस और खुफिया एजेंसियां बच्चे का सोशल स्टेटस तय करती हैं- लॉयल यानी वफादार, वेसिलेटिंग यानी डगमगाने वाले या होस्टाइल यानी शत्रु. यह सोंगबुन ही तय करता है कि वह बच्चा बड़ा होकर प्योंगयांग जैसे वीआईपी शहर में रह सकता है या नहीं, उसे अच्छी नौकरी मिलेगी या नहीं, या उसे किसी कोयला खदान में मजदूरी करनी होगी.
यह भी पढ़ें: सूरज के सबसे करीब बसी है ये बस्ती… जानिए कैसी है यहां लोगों की जिंदगी
उत्तर कोरिया के स्कूलों का माहौल किसी सैन्य कैंप जैसा होता है. वहां बच्चों को सामान्य विज्ञान या गणित से ज्यादा किम परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानियों को रटना पड़ता है. बच्चों को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि उनके सबसे बड़े दुश्मन अमेरिकी साम्राज्यवादी और दक्षिण कोरियाई ‘गद्दार’ हैं. स्कूलों में खिलौनों के रूप में भी प्लास्टिक की बंदूकें और मिसाइलें दी जाती हैं. सोवियत शैली में छोटे बच्चों को लाल स्कार्फ पहनना अनिवार्य होता है और वे हर सुबह देश के सर्वोच्च नेता के प्रति वफादारी की कसमें खाते हैं.
लोगों के बिना सरकारी परमिट के एक जिले से दूसरे जिले में जाने पर भी जेल की सजा हो सकती है. बाहरी दुनिया से ये देश आज पूरी तरह कट-ऑफ वाला जीवन जी रहा. इंटरनेट के नाम पर सिर्फ चंद सरकारी वेबसाइट्स मौजूद हैं. नासा की सैटेलाइट तस्वीरें दिखाती हैं कि रात होते ही जहां दक्षिण कोरिया रोशनी के समंदर में नहा जाता है, वहीं उत्तर कोरिया के नक्शे पर सिर्फ एक छोटा सा बिंदु यानी राजधानी प्योंगयांग चमकता है और बाकी पूरा देश घने, स्याह अंधेरे में डूब जाता है.
किम राजवंश के आने से पहले जो इलाका रोशनी, आधुनिकता और तरक्की का प्रतीक था, वह आज सनक, खौफ और बंद दरवाजों का एक ऐसा बंधक द्वीप बन चुका है, जहां का इतिहास तो सुनहरा था, लेकिन वर्तमान और भविष्य बेहद धुंधला है.
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News