पंद्रह साल तक चली खोज… पहचान छिपाकर रिक्शा खींचा, बोरे ढोए और आखिरकार 'बदनाम गली' से बहन को बचा लाया भाई – Aaj Tak News

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बरसात का मौसम हमेशा गांव को एक अलग ही रंग में रंग देता है. मिट्टी की सोंधी खुशबू, कच्ची गलियों में जमा पानी, छप्परों से टपकती बूंदें और दूर खेतों में उठती हल्की धुंध… सब मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं मानो धरती ने खुद को धोकर नया पहनावा पहन लिया हो. उस दिन भी कुछ ऐसा ही था. सुबह से बादल आते-जाते रहे थे, पर दोपहर होते-होते आसमान खुल गया. बरसाती मौसम के बीच निकली धूप गांव वालों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं होती. और बच्चों के लिए तो मानो खुली आजादी. कुछ दिन पहले ही तो गर्मी की छुट्टियां खत्म हुई थीं, इसलिए अभी मासूमों की मस्ती वाला खुमार उतरा नहीं था. 
गांव की तंग कच्ची गलियों में चहल-पहल लौट आई थी. कहीं बच्चे गीली मिट्टी से छोटे-छोटे घर बना रहे थे, कहीं लड़कियां गुड्डे-गुड़िया का ब्याह रचा रही थीं. कुछ लड़के नंगे पांव पानी के छोटे-छोटे गड्ढों को छलांग लगाकर पार कर रहे थे. हवा में हंसी थी, शोर था, बचपन की वह बेफिक्र धड़कन थी जो सिर्फ गांवों में सुनाई देती है.
रामभजन (बदला हुआ नाम) की झोपड़ी भी उसी गली के किनारे थी. फूस की छत, मिट्टी की दीवारें, सामने छोटा-सा आंगन. भीतर गरीबी थी, लेकिन बच्चों की किलकारियों से घर फिर भी भरा रहता था.
दिल्ली के नजदीक एक जिले में मौजूद छोटे से गांव में रहने वाले रामभजन की सबसे छोटी बेटी रजनी (बदला हुआ नाम) उस दिन खूब रोजाना की तरह मस्ती में डूबी हुई थी. सांवला मासूम चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें, दो चोटियां और पैरों में टूटी-सी चप्पल. 8 साल की बच्ची मोहल्ले के बच्चों के साथ पकड़म-पकड़ाई खेल रही थी. कभी भागती, कभी हंसते-हंसते गिर पड़ती, फिर उठकर दोबारा दौड़ने लगती.
तभी हवा में एक अजीब-सी धुन तैरती हुई आई.
धीमी… लंबी… खिंची हुई…
बीन की आवाज….
पहले एक बच्चे ने सुना, फिर दूसरे ने. अगले ही पल किसी ने चिल्लाकर कहा-
”अरे… सपेरा आया है!”
और जैसे पूरा खेल वहीं थम गया.
बच्चे जिस हालत में थे, उसी हालत में दौड़ पड़े. किसी के हाथ में मिट्टी लगी थी, किसी के घुटने पर कीचड़, कोई आधा बना खिलौना छोड़ आया.
गली के मोड़ पर एक सपेरा खड़ा था.
मैली धोती, ढीला-सा कुर्ता, सिर पर फीकी पगड़ी, कंधे पर बांस की बनी डलिया. उसके साथ एक और आदमी था, जो थका हुआ-सा लग रहा था. सपेरे ने बिना कुछ कहे धीरे से डलिया जमीन पर रखी. बच्चों की सांसें थम गईं.
उसने ढक्कन उठाया.
और अगले ही क्षण भीतर से फन फैलाए दो सांप तनकर खड़े हो गए.
”हssss…”
उनकी फुफकार जैसे बच्चों के दिल तक उतर गई.
कुछ बच्चे डरकर पीछे हटे, कुछ एक-दूसरे से चिपक गए, तो कुछ रोमांच में उछल पड़े. सपेरा बीन बजाने लगा. सांप लहराने लगे. उनके चमकते फन धूप में अजीब-सी चमक दे रहे थे.
धीरे-धीरे गांव के बड़े लड़के भी आ गए. कुछ जवान भी तमाशा देखने लगे. कोई हंस रहा था, कोई बच्चों को डराने के लिए कह रहा था, ”पास मत जाना, डंस लेगा….”
लेकिन बच्चों की आंखें हट नहीं रही थीं.
रजनी भी सबसे आगे खड़ी थी. उसकी आंखों में डर कम, कौतूहल ज्यादा था.
काफी देर तक तमाशा चलता रहा. फिर सपेरों ने सांप वापस डलिया में डाले, ढक्कन बंद किया और दूसरे मोहल्ले की ओर चल पड़े.
बच्चों का मन अभी भरा नहीं था.
एक-एक करके कई बच्चे उनके पीछे चल दिए.
रजनी भी चली गई.
दोपहर ढलने लगी.
धूप पीली हुई.
फिर शाम उतर आई.
गांव की औरतें घरों के बाहर खड़ी बच्चों को पुकारने लगीं. कहीं चूल्हे जल उठे, कहीं गायें लौट आईं, कहीं मंदिर की घंटी बजने लगी.
एक-एक कर सारे बच्चे घर आ गए.
लेकिन रजनी नहीं लौटी.
पहले रामभजन की पत्नी मीना (बदला हुआ नाम) ने सोचा- ”बेटी कहीं पड़ोस में होगी.”
थोड़ी देर बाद उसने टेर लगाई-
”रजनी ओ रजनी…!”
कोई जवाब नहीं.
रामभजन भी बाहर निकले. दोनों ने गली देखी, पड़ोस देखा, दूसरे मोहल्ले तक गए.
रजनी कहीं नहीं थी.
अब आवाजों में घबराहट उतर आई थी.
”किसी ने रजनी को देखा?”
”अभी तो सपेरे के पीछे गई थी…”
”शायद तालाब की तरफ गई हो…”
रामभजन नंगे पांव भागते रहे. मीना रोते-रोते लोगों से पूछती रही.
रात गहराने लगी.
आसमान में फिर बादल उमड़ आए.
रजनी का बड़ा भाई अर्जुन (बदला हुआ नाम) भी उसे खोजने निकला. वह खेतों की मेड़ों तक गया, मंदिर के पीछे देखा, बस अड्डे तक भटका. देर रात लौटा तो आंखें लाल थीं.
”नहीं मिली…”
उस एक वाक्य ने जैसे घर की आखिरी उम्मीद भी तोड़ दी.
अगले दिन थाने में गुमशुदगी लिखी गई. पुलिस आई, पूछताछ हुई, सपेरों का पता लगाने की बात हुई. गांव वालों ने भी दो-चार दिन तक खोजबीन की.
फिर दिन बीतते गए.
बारिश खत्म हो गई.
खेतों में फसल लहलहाने लगी.
दीपावली आई, फिर ठंड आई, फिर नया साल.
लेकिन रजनी नहीं मिली.
धीरे-धीरे लोग कम पूछने लगे.
पुलिस की फाइल पुरानी पड़ गई.
पर रामभजन और मीना की आंखें हर शाम गली की ओर लगी रहतीं. कोई लड़की दूर से आती दिखती तो दोनों एक पल को ठिठक जाते.
फिर निराशा लौट आती.
इंतजार इंसान को भीतर से खोखला कर देता है.
रामभजन मजदूरी करते-करते एक दिन बीमार पड़े और फिर उठ न सके.
मीना ने कुछ महीने और काटे. वह अक्सर रजनी की पुरानी फ्रॉक सीने से लगाकर बैठी रहती. एक सुबह वह भी चुप हो गई.
घर में अब अर्जुन रह गया था.
समय आगे बढ़ा. उसकी शादी हुई. बच्चे हुए. जिम्मेदारियां बढ़ती गईं.
लेकिन एक चीज कभी नहीं बदली- उसकी बहन की तलाश. पंद्रह साल बीत गए.
रजनी अब बच्ची नहीं रही होगी. यह बात वह जानता था. शायद वह जिंदा भी न हो, यह डर भी उसके भीतर था. फिर भी जब भी किसी मेले में भीड़ देखता, किसी बस से उतरती लड़की को देखता, किसी अनजान चेहरे में उसे अपनी बहन नजर आ जाती.
एक दिन उसने पत्नी से कहा, ”शहर जाऊंगा. कुछ कमाऊंगा… बच्चों का भला होगा.”
पत्नी ने हामी भर दी. पर उसके भीतर की असली बात कोई नहीं जानता था.
वह शहर पहुंचा. पहचान छिपाकर उसने रिक्शा चलाया. मंडी में बोरे ढोए. ट्रकों से सामान उतारा. बाजारों में मजदूरी की और वहां लंबे समय से काम कर रहे कामगारों से दोस्ती गांठी.
उधर, अर्जुन का दिन भर शरीर टूटता, रात को वह फुटपाथ पर लेटकर एक ही चेहरा याद करता- रजनी.
चूंकि उसे अंदेशा था कि रजनी को बेच दिया गया है. और गांव से शहर ज्यादा दूर नहीं था तो उसे कुछ हद तक खबर थी कि रजनी कहीं दूर नहीं, यहीं आसपास है. इन्हीं में तमाम लोग कोठों पर आने जाने वालों पर पैनी नजर रखने के लिए जाने जाते थे. रखें भी क्यों न, आखिरी उनका घर से ज्यादा वक्त तो इसी बाजार में बीतता था. 
महीनों बाद एक शाम उसे एक करीबी शख्स से पता चलता है कि ”कांच बाजार में एक कोठे पर 22-23 साल की एक लड़की है और काफी पहले आसपास से ही लाई गई थी… शायद वह तुम्हारी बहन है.”
अर्जुन का कलेजा कांप उठा.
दरअसल, कांच बाजार शहर का बदनाम इलाका था. वहां की तंग गलियां, लाल बल्बों की रोशनी, खामोश सीढ़ियां और उन सीढ़ियों पर कैद औरतों की कहानियां दूर-दूर तक सुनाई जाती थीं. 
कहते थे-
”वहां जाने का रास्ता है, लौटने का नहीं.”
अर्जुन कई दिन तक हिम्मत नहीं जुटा पाया. फिर एक रात किसी बहाने उस कोठे तक पहुंचा.
वह ऊपर गया.
और उसने उसे देखा.
वह सचमुच रजनी थी.
सालों ने उसका चेहरा बदल दिया था. बचपन की गोलाई खो गई थी. आंखों में अजीब-सी थकान थी.
रजनी ने उसे तब नहीं पहचाना या उसकी नजर नहीं पड़ी.
अर्जुन नीचे उतरा और फूट-फूटकर रो पड़ा.
उसे लगा जैसे पंद्रह साल की तलाश सामने खड़ी है, लेकिन उसके हाथ अब भी खाली हैं.
उसे मदद चाहिए थी.
तभी उसे ‘जीजी’ का पता मिला, वह औरत जो कई लड़कियों को इस नरक से निकाल चुकी थी.
करीब 35 साल से इस दलदल से बच्चियों और महिलाओं का निकालने में जुटीं साहसी जीजी ने बेबस अर्जुन की पूरी बात सुनी. उसके आंसू देखे. और बोली-
”चलो…”
संकरी गलियां, बजबजाती नालियां, बदबू और घूरती निगाहों से गुजरते ही जीजी अपनी टीम और अर्जुन के साथ एक कोठे पर पहुंचती है. थोड़ी बहुत रोक-टोक हुई, आवाजें ऊंची हुईं. लेकिन जीजी पीछे नहीं हटीं. कोठे से ऊपर के कोठे पर चढ़ते हुए जीजी ने रजनी नाम से आवाज लगाई, लेकिन मौके की नजाकत समझ नीचे के कोठे की मालकिन रमाबाई तपाक से बोलती हैं- ”ये…ये रही रजनी तो…” तभी जीजी अपने कदम वापस नीचे की ओर खींचती हैं और एक इकसरा, दुबली पतली और सहमी से लड़की से पूछती हैं- बेटी, तू ही रजनी है? 
वह बिना कुछ बोले आंखों के इशारों से हामी भर देती है,
इस दौरान वह अपने भाई अर्जुन को पहचान लेती है. और अगले ही पल रजनी की आंखें फैल गईं.
”भइया…” वह उससे लिपटकर ऐसे रोई जैसे पंद्रह साल से बंधा बांध टूट गया हो.  वहां खड़े लोग भी आंखें पोंछने लगे. छुड़ाने आई जीजी खुद यह दृश्य से भाव विहल हो उठीं.  
रजनी को बाहर लाया गया.
अर्जुन अब बार-बार जीजी के पैर छूता, धन्यवाद कहना चाहता, लेकिन शब्द उसके गले में अटक जाते.
जब वह बहन को लेकर गांव पहुंचा, तो उसकी छोटी-सी झोपड़ी उस रात महल जैसी लग रही थी.
पत्नी ने खाना बनाया. बच्चों ने बुआ के पास बैठकर बातें कीं. अर्जुन देर रात तक बहन को देखता रहा.
बस एक टीस भीतर उठती रही-
काश… मां-बाप उसे लौटते देख पाते. क्योंकि रजनी कहीं दूर नहीं थी.
वह घर से कुछ ही किलोमीटर दूर, उसी शहर में पंद्रह साल तक कैद रही.
दिन बीते.
महीने गुजरे.
घर में जिंदगी फिर से लौटती हुई लगने लगी.
लेकिन किस्मत ने शायद अभी पूरी कहानी लिखी ही नहीं थी.
एक सुबह अर्जुन की आंख खुली.
झोपड़ी का दरवाजा आधा खुला था.
रजनी अंदर नहीं थी.
वह फिर गायब हो चुकी थी….
और यहीं से कहानी का दूसरा, और अधिक दर्दनाक अध्याय शुरू होता है… 
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