कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में सौतेले पिता का नाम दर्ज करने की अनुमति दी है।
कलकत्ता हाईकोर्ट।
जन्म प्रमाणपत्र में सौतेले पिता का नाम दर्ज करने की अनुमति।
बदलती सामाजिक परिस्थितियों और बच्चे के हित को प्राथमिकता।
बच्चा बालिग होने पर पहचान बदलने का विकल्प।
राज्य ब्यूरो, कोलकाता। कलकत्ता हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में उसके सौतेले पिता का नाम दर्ज करने की अनुमति दी है। अदालत ने कहा कि बदलती सामाजिक परिस्थितियों में जन्म प्रमाणपत्र में जैविक पिता का नाम बनाए रखना हर स्थिति में जरूरी नहीं है।
मामला पूर्व बर्द्धमान नगरपालिका (नपा) क्षेत्र से जुड़ा है। एक महिला ने अपने नाबालिग बेटे के जन्म प्रमाणपत्र में जैविक पिता का नाम हटाकर अपने वर्तमान पति का नाम दर्ज करने और तदनुसार बच्चे का उपनाम बदलने को नपा में आवेदन किया था।
नपा ने नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि एक बार जन्म प्रमाणपत्र में पिता का नाम दर्ज हो जाने के बाद उसे बदला नहीं जा सकता। इसके विरुद्ध महिला ने हाई कोर्ट का रूख किया था। मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी ने कहा कि बच्चे के हित में जरूरत होने पर उसके जन्म प्रमाणपत्र में जैविक पिता की जगह सौतेले पिता का नाम दर्ज किया जा सकता है।
अदालत ने नपा को जन्म प्रमाणपत्र में सौतेले पिता का नाम शामिल करने और बच्चे के उपनाम में आवश्यक बदलाव करने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चा बालिग होने के बाद अपनी इच्छानुसार इस पहचान को बदल सकता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार याचिकाकर्ता महिला का विवाह अप्रैल, 2012 में शुभंकर कर्मकार नामक व्यक्ति से हुआ था। उन्हें एक पुत्र हुआ। वैवाहिक विवाद के बाद अक्टूबर, 2021 में दोनों का तलाक हो गया। मार्च, 2022 में महिला ने राजेश घोष नामक व्यक्ति से शादी कर ली। बच्चा अपनी मां और सौतेले पिता के साथ रहता है। राजेश घोष ने उसे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर लिया।
बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में जैविक पिता का नाम दर्ज था। इस कारण स्कूल में दाखिले में परेशानी हो रही थी। मां ने बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में जैविक पिता का नाम बदलकर सौतेले पिता का नाम दर्ज करने के लिए नपा में आवेदन किया था, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था।
इस मामले में अदालत ने आगे कहा कि निजी मामलों में अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत नहीं है। बच्चे की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप उसके जन्म संबंधी दस्तावेज में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। समाज आगे बढ़ चुका है और रजिस्टर में हर स्थिति में जैविक पिता का नाम बनाए रखना जरूरी नहीं है।