भारत समेत 3 देशों से बाढ़ का मुआवजा क्यों मांग रहा नेपाल? UN जाएंगे बालेन शाह – aajtak.in

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नेपाल ने चीन, भारत और अमेरिका को दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में शुमार करते हुए बागमती प्रदेश के कई जिलों में आई भीषण बाढ़ के लिए जलवायु मुआवजे (क्लाइमेट कंपनसेशन) की मांग की है. बताया जा रहा है कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में व्यक्तिगत रूप से उठाने के लिए न्यूयॉर्क जाने की तैयारी में हैं.
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कांतिपुर टीवी को दिए इंटरव्यू में स्पष्ट किया कि काठमांडू अपनी कूटनीतिक रणनीति को सहायता मांगने से बदलकर न्याय और मुआवजे (क्लाइमेट कंपनसेशन) की ओर ले जा रहा है.
‘दान नहीं, न्याय चाहिए’

उन्होंने कहा कि ये कोई दान या खैरात का मामला नहीं है, बल्कि कानूनी और नैतिक दायित्व का सवाल है. खनाल ने कहा कि इन तीन देशों- चीन, अमेरिका, भारत की जिम्मेदारी है कि वो उन कमजोर देशों को मुआवजा दें जो उत्सर्जन का नतीजा भुगत रहे हैं, जिनका वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में योगदान न के बराबर है. हालांकि, पश्चिमी देश कुल कार्बन उत्सर्जन के कारण भारत को दोषी ठहराना पसंद करते हैं. लेकिन विकसित देशों की तुलना में भारत का प्रति व्यक्ति और ऐतिहासिक योगदान बहुत कम है.

बताया जा रहा है कि काठमांडू ने तत्काल वित्तीय सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र समर्थित ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (नुकसान और क्षति के लिए फंड) से औपचारिक रूप से संपर्क किया है. खबरों के मुताबिक, वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस आपदा और जलवायु न्याय की अपनी मांग को उठाने की भी तैयारी कर रहा है.
UN जाएंगे बालेन शाह

द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री बालेन शाह 81वीं यूएन महासभा में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने पर विचार कर रहे हैं. इस प्रस्ताव पर चर्चा हो रही है, ताकि शाह व्यक्तिगत रूप से रसुवा बाढ़ का मुद्दा उठा सकें और जलवायु न्याय व मुआवजे की मांग कर सकें. पहले इस बैठक में विदेश मंत्री शिशिर खनाल के जाने की योजना थी. यूएन महासभा 8 सितंबर से शुरू हो रही है, जिसकी सामान्य बहस सितंबर के तीसरे और चौथे सप्ताह में होनी है.

यूरोपीय आयोग के 2024 के EDGAR अनुमानों के अनुसार, चीन, अमेरिका और भारत कुल मात्रा के हिसाब से ग्रीनहाउस गैसों के तीन सबसे बड़े उत्सर्जक देश थे. हालांकि, भारत प्रति व्यक्ति केवल 3 टन कार्बन डाइऑक्साइड-समतुल्य उत्सर्जित करता है जो चीन के करीब 11 टन और अमेरिका के 17 टन से बेहद कम है. भारत हमेशा से ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति भागीदारी के आधार पर जिम्मेदारी तय करने की वकालत करता रहा है.

भारत ने लगातार तर्क दिया है कि जलवायु संबंधी दायित्वों में ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन, विकास की जरूरतों और उन देशों की बड़ी जिम्मेदारी को ध्यान में रखा जाना चाहिए जो पहले औद्योगिक हुए और जिन्होंने इसके लाभ उठाए.
ग्लोबल फंड को भेजा औपचारिक अनुरोध

द काठमांडू पोस्ट की एक अलग रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल सरकार ने कहा है कि भारत, चीन और अमेरिका को अलग-अलग द्विपक्षीय मुआवजा दावे सौंपने के बजाय, ‘लॉस एंड डैमेज’ (नुकसान और क्षति) से निपटने वाले फंड को एक औपचारिक अनुरोध भेजा गया है.

इस फंड पर 2022 में COP27 जलवायु शिखर सम्मेलन में सहमति बनी थी और जलवायु परिवर्तन के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील विकासशील देशों की मदद के लिए COP28 में इसे चालू किया गया था. नेपाल के पत्र पर वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले और वन एवं कृषि मंत्री गीता चौधरी ने संयुक्त रूप से हस्ताक्षर किए थे.

अनुरोध में बाढ़ को एक ऐसी आपदा बताया गया है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर मौतें हुईं, लोग विस्थापित हुए, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा और आजीविका तथा आवश्यक सेवाएं बाधित हुईं. काठमांडू ने फंड बोर्ड की अगली तय बैठक का इंतजार किए बिना तुरंत प्रतिक्रिया की मांग की.
नेपाली दूतावासों को किया सक्रिय
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने नेपाली दूतावासों को भी सक्रिय किया है ताकि वह सरकारों और दानदाताओं को देश की जरूरतों के बारे में जानकारी दे सकें. तत्काल राहत के अलावा, नेपाल पुनर्वास और पुनर्निर्माण के लिए पैसे और विशेष मदद जैसे टनल-रेस्क्यू टीमें, फोरेंसिक विशेषज्ञ और बेली ब्रिज की मांग कर रहा है.

शुरुआत में नेपाल ने खोज और बचाव कार्यों के लिए विदेशी मदद लेने से इनकार कर दिया था और कहा था कि उसकी अपनी एजेंसियां ही ये काम संभाल सकती हैं. हालांकि, बाद में काठमांडू ने भारत, चीन और अन्य देशों से विशेष टीमों, उपकरणों और विशेषज्ञों की मदद मांगी.
नेपाल में भीषण तबाही

दरअसल, 26 अगस्त को भोटकोशी नदी बेसिन में आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग ज़िलों के कुछ हिस्सों में भारी तबाही मचाई है. बाढ़ में घर, सड़कें, पुल और पनबिजली परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है और हज़ारों लोग विस्थापित हो गए हैं.

नेपाल पुलिस के अनुसार, एक सितंबर तक इस आपदा में कम से कम 1,127 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 3,900 लोग लापता हैं. नेपाल ने इसे हिमालयी सुनामी करार दिया है.
‘नेपाल को 4-5 अरब डॉलर की जरूरत’

वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने रॉयटर्स को बताया कि पुनर्निर्माण के लिए नेपाल को 4 से 5 अरब डॉलर की आवश्यकता पड़ सकती है, जो उसकी कुल अर्थव्यवस्था का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा है.

उधर, वैज्ञानिकों और अधिकारियों का मानना है कि बाढ़ की शुरुआत नेपाल-चीन सीमा के पास उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्र से हुई थी, लेकिन जलवायु परिवर्तन से सीधे जुड़ाव की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है. उच्च भूकंपीय क्षेत्र में आई इस आपदा ने कमजोर हिमालयी क्षेत्र में चीनी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ा दिया है. विदेश मंत्री खनाल ने चेतावनी दी कि हिमालयी ग्लेशियर पूरे दक्षिण एशिया के अरबों लोगों की नदियों का आधार हैं.
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