संयुक्त राष्ट्र महासभा में 4 सितंबर को ‘मानचित्र को सही करें’ (Correct the map) नाम का एक प्रस्ताव पारित किया था। इसका मकसद 16वीं सदी के पुराने मर्केंटर प्रोजेक्शन मैप की खामियों को दूर करना और अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे भूमध्यरेखीय क्षेत्रों के वास्तविक आकार को अधिक सटीक रूप से दिखाने वाले समान-क्षेत्र नक्शों को बढ़ावा देना है। भारत ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया था लेकिन जब संयुक्त राष्ट्र की तरफ से दुनिया का नया नक्शा जारी किया गया तो भारत भौचक्का रह गया क्योंकि इस नक्शे में भारत के अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को अलग-अलग इलाकों के तौर पर दिखाया गया है, जबकि ये भारत का अविभाज्य हिस्सा रहा है। हालांकि, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से है।
यह नक्शा पहली बार 1 जुलाई को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान प्रकाशित किया गया था। इसमें अरुणाचल प्रदेश की नागालैंड के साथ सीमा को हटा दिया गया है और इस क्षेत्र को असम और चीन की सीमाओं से लगे एक स्वतंत्र राज्य के रूप में दिखाया गया है। इसी तरह, नक्शे में अक्साई चिन को एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है, जिसकी पश्चिमी सीमा भारत से और पूर्वी सीमा चीन से लगती है। संयुक्त राष्ट्र ने इन बदलावों के पीछे का कोई कारण नहीं बताया।
नक्शे में एक डॉटेड लाइन (बिंदु वाली रेखा) भी दिखाई गई है जो भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर को बांटने वाली नियंत्रण रेखा (LoC) को दर्शाती है। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र ने नक्शे के फुटनोट में कहा है कि “डॉटेड लाइन जम्मू-कश्मीर में LoC को लगभग दर्शाती है, जिस पर भारत और पाकिस्तान सहमत हुए थे।” इसमें कहा गया है, “जम्मू-कश्मीर की अंतिम स्थिति पर संबंधित पक्षों के बीच अभी तक कोई सहमति नहीं बनी है।”
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पिछले सप्ताह अफ्रीकी संघ समर्थित “नक्शे को सही करें” (Correct the Map) प्रस्ताव को अपनाया। इस प्रस्ताव में दुनिया के क्षेत्रों, विशेषकर अफ्रीका के अधिक सटीक और निष्पक्ष मानचित्रण की मांग की गई थी। यह नक्शा बाध्यकारी नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि दुनिया भर के बहुपक्षीय संस्थान इसे दुनिया के मानक चित्रण के रूप में अपनाएंगे।
अफ्रीकी समूह की ओर से टोगो द्वारा पेश किए गए इस प्रस्ताव का भारत ने समर्थन किया था। विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली के रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह वोट “समान-क्षेत्र मानचित्रण को बढ़ावा देने के मूल सिद्धांत” पर था। मंत्रालय ने कहा था, “हमने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव किसी विशिष्ट नक्शे, प्रोजेक्शन या राष्ट्रीय सीमाओं के चित्रण का समर्थन नहीं करता है।” मंत्रालय ने आगे कहा, “भारत के संप्रभु क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं, को भारत के आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए। कोई भी गलत या भ्रामक चित्रण स्वीकार्य नहीं है। भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर हमारा रुख स्पष्ट, सुसंगत और गैर-परक्राम्य (जिस पर कोई समझौता नहीं हो सकता) है।”
नई दिल्ली ने अभी तक उस नक्शे पर कोई टिप्पणी नहीं की है जिसमें अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन को भारत और चीन के विवादित दावों वाली सीमाओं के साथ दिखाया गया है। भारत का हमेशा से यह कहना रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा केंद्र-शासित प्रदेश, जिसमें अक्साई चिन भी शामिल है, “भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा रहा है, है और हमेशा रहेगा।” नई दिल्ली का यह भी कहना है कि अरुणाचल प्रदेश भारतीय क्षेत्र का एक अभिन्न हिस्सा है।
प्रमोद कुमार प्रवीण देश-विदेश की समसामयिक घटनाओं और राजनीतिक हलचलों पर चिंतन-मंथन करने वाले और पैनी पकड़ रखने वाले हैं। ईटीवी से पत्रकारिता में करियर की शुरुआत की। कुल करीब दो दशक का इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम करने का अनुभव रखते हैं। संप्रति लाइव हिन्दुस्तान में विगत तीन से ज्यादा वर्षों से समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत हैं और अमूमन सांध्यकालीन पारी में बहुआयामी पत्रकारीय भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप से पहले NDTV, जनसत्ता, ईटीवी, इंडिया न्यूज, फोकस न्यूज, साधना न्यूज और ईटीवी में कार्य करने का अनुभव है। कई संस्थानों में सियासी किस्सों का स्तंभकार और लेखक रहे हैं। विश्वविद्यालय स्तर से लेकर कई अकादमिक, शैक्षणिक और सामाजिक संगठनों द्वारा विभिन्न मंचों पर अकादमिक और पत्रकारिता में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी हुए हैं। रुचियों में फिल्में देखना और पढ़ना-पढ़ाना पसंद, सामाजिक और जनसरोकार के कार्यों में भी रुचि है।
अकादमिक योग्यता: भूगोल में जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर और संवेदनशील विषय पर पीएचडी उपाधिधारक हैं। इसके साथ ही पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नातकोत्तर भी हैं। पीएचडी शोध का विषय- ‘मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन-एक भौगोलिक अध्ययन’ रहा है। शोध के दौरान करीब दर्जन भर राष्ट्रीय और अंततराष्ट्रीय सम्मेलनों में शोध पत्र पढ़ने और प्रस्तुत करने का अनुभव है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी शोध पोस्टर प्रदर्शनी का चयन हो चुका है। शोध पर आधारित एक पुस्तक के लेखक हैं। पुस्तक का नाम ‘मध्य गंगा घाटी में जलवायु परिवर्तन’ है। पत्रकारिता में आने से पहले महाविद्यालय स्तर पर शिक्षण कार्य भी कर चुके हैं।
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