हिंदी दिवस विशेष- झारखंड का आदिवासी साहित्य हिंदी में – Hindustan

हिंदी दिवस विशेष फोटो है-
स्नेहा शर्मा,
हिंदी दिवस के इस अवसर पर, जब पूरा देश अपनी भाषा को नमन कर रहा है, हमारी निगाहें झारखंड की उस मिट्टी की ओर जाती हैं। जहां अनेक भाषाओं और बोलियों के बीच हिंदी ने भी अपना एक खास और सम्मानजनक स्थान बनाया है। भाषा मां होती है, वह हमें अपनों से जोड़े रखती है और हमारे मन के भावों को शब्द देती है। इसी भावना के साथ आज हम झारखंड की उस समृद्ध आदिवासी चेतना पर प्रकाश डाल रहे हैं, जिसने हिंदी भाषा के माध्यम से भी अपनी पहचान और अपनी कहानी देश-दुनिया तक पहुंचाई है。
पद्मश्री डॉक्टर रामदयाल मुंडा ने आदिवासी साहित्य को हिंदी में वह सम्मान दिलाया, जिससे साहित्य जगत में आदिवासी दर्शन मुख्यधारा का हिस्सा बना। उन्हीं की राह पर चलते हुए आज झारखंड में आदिवासी साहित्य हिंदी भाषा के माध्यम से रोज नई कविताओं, नाटकों, उपन्यासों, गीतों और कहानियों में ढल रहा है।
इस साहित्य में झारखंड की प्राकृतिक सुंदरता, हरे-भरे जंगल, बहती नदियां और पहाड़ों की शांति बड़ी सहजता से उतर आती है। साथ ही आदिवासी संस्कृति के पर्व-त्योहार, रीति-रिवाज और सामूहिक जीवन का सजीव चित्रण भी इन रचनाओं में मिलता है। आदिवासी अधिकारों की लड़ाई, जल जंगल जमीन को बचाने की जद्दोजहद, और आदिवासी क्रांति का संघर्ष भी हिंदी कविताओं व कहानियों में मुखर स्वर पाता है। यही हिंदी साहित्य की ताकत है कि उसने आदिवासी जीवन के हर रंग को अपने भीतर समेट लिया है।
भाषा कार्यशालाएं और प्रशिक्षण रचनाकारों की क्षमता, कार्यकुशलता और जागरूकता बढ़ाने के साथ नए लेखक पाठकों के तैयार करने में दूरगामी भूमिका निभाते हैं। अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा की 1991-92 तक से की गई कई कार्यशालाओं ने अनेक लेखकों को आगे आने का अवसर दिया। ऑनलाइन हो या ऑफलाइन, प्रशिक्षण लेखन का बेहतर वातावरण और नए विचार देता है। वे नई पीढ़ी से हिंदी साहित्य के लिए बड़ी उम्मीदें रखते हैं। आज के युवा तकनीक के माध्यम से कला, संस्कृति, इतिहास और जल-जंगल-जमीन के सवालों से जुड़कर संवाद कर रहे हैं। उन्होंने कहा की हंस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के आदिवासी विशेषांक और सोशल मीडिया पर युवाओं की ओर से अपनी भाषा शैली में वीडियो और रील्स बनाना भी उनकी प्रयास यह सिद्ध करती हैं, कि नई पीढ़ी अपनी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने के लिए पूरी तरह से तत्पर है।
महादेव टोप्पो, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता
हिंदी भाषा के लिए साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2025 से सम्मानित डॉ पार्वती तिर्की का कहना है कि भाषा केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि संवाद, मनुष्यता और समाज को सुंदर बनाने का माध्यम है। आदिवासी जीवन से आते हुए हिंदी माध्यम की शिक्षा ने उन्हें संवाद की कला सिखाई। उनके अनुसार हिंदी ने आदिवासी जीवन के सहज प्रेम, मूल्यों और जीवनदर्शन को सम्मानपूर्वक सुना और सराहा है। उन्होंने युवाओं से प्रकृति के साथ सहजीवन, आदिवासी लोकज्ञान, विविध भाषाओं के संवाद और मानवीय मूल्यों को समझने का आग्रह की हैं। साथ ही मनुष्य व्यवस्था की बेहतरी और संवाद के लिए शब्दों को सुनें।
– डॉ पार्वती तिर्की , सहायक प्राध्यापिका, हिंदी राम लखन सिंह यादव महाविद्यालय
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