नई दिल्ली में संपन्न हुआ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन केवल कूटनीतिक बैठकों का एक और सिलसिला नहीं था, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत के बढ़ते कद, राजनीतिक परिपक्वता और कूटनीतिक कौशल का एक स्वर्णिम अध्याय साबित हुआ है. आज जब दुनिया भर के देश भू-राजनीतिक तनावों, महाशक्तियों के बीच खिंचती लकीरों और दो सक्रिय महायुद्धों की वजह से गहरे ध्रुवीकरण के दौर से गुजर रहे हैं, तब भारत ने एक बेहद बिखरते और जटिल होते बहुपक्षीय मंच पर असाधारण संतुलन का परिचय दिया है.
शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आए ये प्रमुख बिंदु इस बात के प्रमाण हैं कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने हर मोर्चे पर अपनी कूटनीति का लोहा मनवाया और राष्ट्रीय हितों को साधते हुए वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाई
शिखर सम्मेलन से पहले सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या 11 सदस्यों वाले इस विस्तारित समूह में जहां रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य एशिया के संकट जैसे गंभीर मुद्दों पर गहरे मतभेद हैं, कोई आम सहमति बन पाएगी या नहीं. पिछले सम्मेलनों में कई बार मतभेदों के चलते साझा बयान जारी करना मुश्किल हो गया था. ऐसे में, भारत ने कूटनीतिक कौशल का परिचय देते हुए सभी सदस्य देशों को एक मंच पर ला खड़ा किया और ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर सर्वसम्मति से मुहर लगवाई. यह इस बात का सबूत है कि वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भी भारत अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को टूटने से बचाने और आम सहमति बनाने की अद्वितीय क्षमता रखता है.
पश्चिम एशिया का संकट मौजूदा वैश्विक राजनीति के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है. अमरीका-इजराइल-ईरान संघर्ष के बाद से ईरान और यूएई के बीच तल्खियां चरम पर थीं, और दोनों देशों के बीच गंभीर भू-राजनीतिक खाई पैदा हो गई थी. ब्रिक्स मंच पर दोनों देशों का आना अपने आप में एक चुनौती था. लेकिन भारत की कुशल मध्यस्थता का ही कमाल था कि न केवल दोनों देशों ने मध्य पूर्व में संयम बरतने वाले ब्रिक्स बयान पर हस्ताक्षर किए, बल्कि शिखर सम्मेलन के इतर ईरान के राष्ट्रपति और अबूधाबी के क्राउन प्रिंस के बीच उच्च स्तरीय बैठक भी संभव हुई. नई दिल्ली का इस ऐतिहासिक संवाद का केंद्र बनना भारत की शांति-स्थापना और कूटनीतिक प्रभाव का सबसे बड़ा उदाहरण है.
भविष्य की तकनीक यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर दुनिया की बड़ी ताकतें नियंत्रण स्थापित करने की होड़ में हैं. ऐसे में भारत ने एक दूरदर्शी कदम उठाते हुए ब्रिक्स देशों के बीच एक ‘ओपन-सोर्स AI इकोसिस्टम’ बनाने का प्रस्ताव रखा और उसका ऐलान कराया. यह पहल विकासशील देशों को पश्चिमी तकनीकी दिग्गजों की डिजिटल गुलामी या एकाधिकार से मुक्त कराने में मददगार साबित होगी. इसके जरिए भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि डिजिटल और तकनीकी युग में ग्लोबल साउथ के हितों की अनदेखी न हो और तकनीक का लोकतंत्रीकरण हो सके.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा दशकों से अटका हुआ है. नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की मौजूदगी के साथ-साथ, रूस और चीन जैसे देशों ने भी वैश्विक शासन सुधारों और UNSC के विस्तार का पुरजोर समर्थन किया. विशेष रूप से चीन और रूस द्वारा भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की आकांक्षाओं का समर्थन किया जाना, भारत की कूटनीतिक और वैश्विक स्वीकार्यता की बहुत बड़ी जीत है. यह इस बात को रेखांकित करता है कि भारत अब वैश्विक नियमों का पालन करने वाला मात्र देश नहीं, बल्कि उन्हें आकार देने वाला प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी बन चुका है.
भारत के लिए इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी रणनीतिक और घरेलू जीत आतंकवाद के मुद्दे पर हासिल हुई. ब्रिक्स घोषणापत्र में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए भीषण आतंकवादी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की गई. सबसे खास बात यह रही कि इसमें आतंकवाद के प्रति “शून्य सहनशीलता” की मांग की गई और आतंकवादियों और उनके समर्थकों को न्याय के कटघरे में खड़ा करने की बात कही गई. वह भी तब, जब इस समूह में पाकिस्तान का करीबी सहयोगी चीन भी शामिल है. भारत ने कूटनीतिक दबाव और संवाद के जरिए चीन की उपस्थिति वाले इस मंच से आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश दिलवाकर पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है.
भारत ने केवल कूटनीति और राजनीति तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने शासन मॉडल को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया. भारत के डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, गांधीनगर के गिफ्ट सिटी के वित्तीय ढांचे और मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्थान NIMHANS के सफल मॉडलों को ब्रिक्स के संस्थागत ढांचे और सहयोग का हिस्सा बनाया गया. यह इस बात का प्रमाण है कि भारत अब केवल अपनी नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके विकास मॉडल और तकनीकी समाधान आज पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय मार्गदर्शक बन चुके हैं.
पीएम मोदी की ब्रिक्स में चेतावनी
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों के ‘हथियारीकरण’ के खिलाफ तीखा संदेश दिया. उन्होंने आगाह किया कि आपूर्ति श्रृंखलाओं को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है. पीएम मोदी ने जोर दिया कि दुनिया को चुनिंदा देशों के एकाधिकार से बाहर निकलना चाहिए और वैश्विक समृद्धि के लिए समावेशी, पारदर्शी और लोकतांत्रिक तकनीक को अपनाना होगा. इसके साथ ही, उन्होंने ग्लोबल साउथ के अधिकारों की रक्षा और तकनीकी सहयोग को मजबूत करने की पुरजोर वकालत की.
नई दिल्ली में आयोजित यह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि भारत ने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के बल पर दुनिया की महाशक्तियों के बीच बेहतरीन संतुलन बनाया है. एक तरफ जहां दुनिया युद्ध और आर्थिक संकटों से जूझ रही है, वहीं भारत ने शांति, सहयोग, तकनीक और आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट संदेश देकर यह साबित कर दिया है कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में नई दिल्ली की भूमिका अब केंद्रीय हो चुकी है.
संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.
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