एक फिल्म से आया था जोकर का आइडिया, वो विलेन जो हीरो से ज्यादा पॉपुलर हुआ – AajTak

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पॉप-कल्चर के इतिहास में कई खलनायक आए और गए, लेकिन सफेद चेहरा, हरे बाल और चेहरे पर भयावह मुस्कान लिए जोकर का असर सबसे अलग रहा. 1940 में कॉमिक बुक के पन्नों से शुरू हुआ यह किरदार सिनेमा के बड़े पर्दे तक पहुंचा और सिर्फ सुपरविलेन भर नहीं रहा, बल्कि अराजकता और दार्शनिक विरोधाभास का बड़ा प्रतीक बन गया.
जोकर की कहानी सिर्फ उसके डरावने चेहरे की नहीं है. ये उसके जन्म, उसके रहस्यमयी अतीत, कॉमिक्स से टीवी और फिल्मों तक के सफर, और उन वजहों की भी कहानी है जिनकी वजह से यह किरदार समय के साथ और बड़ा होता गया.
इस फिल्म से आया था जोकर का आइडिया
जोकर की शुरुआत 1940 में छपी बैटमैन #1 कॉमिक्स से हुई थी. इसे बिल फिंगर, बॉब केन और जेरी रोबिंसन ने मिलकर गढ़ा था. कमाल ये है कि जोकर का इन्सपीरेशन एक फिल्म से आया था, जो थी 1928 की साइलेंट फिल्म ‘द मैन हू लाफ्स’ थी. इस फिल्म में कॉनराड वेड ने ‘ग्विनप्लेन’ नाम का किरदार निभाया था, जिसके चेहरे पर बचपन की एक त्रासदी के कारण स्थायी डरावनी मुस्कान छपी हुई थी. 
इसी चेहरे और प्लेइंग कार्ड्स के जोकर को मिलाकर बैटमैन के इस बड़े विरोधी का खाका तैयार किया गया. अपनी पहली ही उपस्थिति में जोकर कोई मसखरा नहीं था, बल्कि बेहद चालाक, ठंडा और क्रूर सीरियल किलर था. वह अपने शिकार को मारने के लिए ‘जोकर वेनम’ का इस्तेमाल करता था, जिससे मरने वाले के चेहरे पर भी भयावह मुस्कान जम जाती थी.
बैटमैन का अतीत सबको पता है, लेकिन जोकर कौन था, इसका एक आधिकारिक जवाब कभी नहीं दिया गया. 1951 में DC की कॉमिक्स नंबर #168 में पहली बार उसके बैकग्राउंड की झलक मिली. कहानी के मुताबिक वह पहले ‘रेड हुड’ नाम का नकाबपोश अपराधी था. बैटमैन से बचकर भागते समय वह केमिकल्स से भरे टैंक में गिर गया. 
केमिकल्स के असर से उसकी त्वचा सफेद, बाल हरे और होंठ लाल हो गए, और वह दिमागी संतुलन खोकर जोकर बन गया. फिर 1988 में एलन मूर की ग्राफिक नॉवेल ‘द किलिंग जोक’ ने उसकी साइकोलॉजी को नया आयाम दिया. इसमें उसे एक असफल स्टैंड-अप कॉमेडियन के रूप में दिखाया गया, जो अपनी गर्भवती पत्नी का पेट पालने के लिए लाचार होकर अपराध की राह चुनता है. 
फिल्मों ने जोकर को हीरो बना दिया
फिल्मों में टिम बर्टन की ‘बैटमैन’ 1989 में एक बड़ा मोड़ साबित हुई. जैक निकलसन ने जोकर को गैंगस्टर ‘जैक नेपियर’ के रूप में पर्दे पर जीवंत किया. इस फिल्म ने पहली बार साफ किया कि एक विलेन को भी मुख्य हीरो जितनी तवज्जो और स्टारडम मिल सकता है.
इसके बाद 2008 में क्रिस्टोफर नोलन की ‘द डार्क नाइट’ में हीथ लेजर ने जोकर के किरदार की परिभाषा बदल दी. उनका जोकर पैसों या सत्ता के लिए नहीं लड़ता था. उसका मानना था कि ‘कुछ लोग सिर्फ दुनिया को जलते हुए देखना चाहते हैं’. उसने बैटमैन के नो-किल रूल को चुनौती दी और यह साबित करने की कोशिश की कि समाज का कानून और व्यवस्था सिर्फ एक दिखावा है. हीथ लेजर को इस एक कैरेक्टर ने लीजेंड बना दिया और उन्हें इस किरदार के लिए ऑस्कर भी मिला.
2019 में टॉड फिलिप्स के निर्देशन और वाकीन फिनिक्स के अभिनय वाली ‘जोकर’ ने कॉमिक बुक फिल्मों का दायरा और बढ़ा दिया. इस फिल्म में जोकर को बैटमैन के विरोधी के रूप में नहीं, बल्कि ‘आर्थर फ्लेक’ नाम के एक मानसिक रूप से पीड़ित और समाज द्वारा उपेक्षित व्यक्ति के रूप में दिखाया गया. 
कहानी यह दिखाती है कि समाज की बेरुखी और सिस्टम की नाकामी एक साधारण इंसान को टूटकर हिंसक विद्रोह का प्रतीक बना देती है. इस रोल के लिए फिनिक्स को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ऑस्कर मिला.
1940 में एक कॉमिक के पन्ने से शुरू हुआ जोकर का सफर आज कॉमिक्स, टीवी और सिनेमा तक फैल चुका है. वह सिर्फ एक सुपरविलेन नहीं रहा, बल्कि डर, आक्रोश, अराजकता और विरोधाभास से जुड़ा ऐसा किरदार बन गया है, जिसकी अलग-अलग शक्लें हर दौर में सामने आती रही हैं.
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