आतंकवाद पर बदला भारत का रुख – Hindustan

नई दिल्ली। आतंकवाद के खिलाफ भारत की रणनीति पिछले एक दशक में धीरे-धीरे बदली है। लंबे समय तक आतंकी हमलों के बाद कूटनीतिक विरोध और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बनाने तक सीमित रहने वाला जवाब अब सैन्य कार्रवाई तक पहुंच गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2026 को ‘मन की बात’ के 138वें एपिसोड में 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र करते हुए इसे आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति में अहम मोड़ बताया। उरी हमले के बाद एलओसी पार कर आतंकी ठिकानों पर की गई कार्रवाई ने यह संकेत दिया कि भारत आतंकी हमलों के जवाब में केवल अपनी सीमा के भीतर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा。
इससे करीब एक साल पहले जून 2015 में मणिपुर के चंदेल में सेना के जवानों पर घात लगाकर हमला किया गया था। इसमें 18 सैनिक मारे गए थे। इसके बाद भारतीय विशेष बलों ने म्यांमार में आतंकी ठिकानों के खिलाफ कार्रवाई की। सरकार ने इस ऑपरेशन की जानकारी सार्वजनिक की थी। हालांकि 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सीमा पार जाकर आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाने की नीति राष्ट्रीय सुरक्षा और राजनीतिक विमर्श का बड़ा हिस्सा बन गई।
फरवरी 2019 में पुलवामा आतंकी हमले के 12 दिन बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण परिसर को निशाना बनाया। इस कार्रवाई ने भारत के जवाब के दायरे को एक और स्तर तक बढ़ाया। अब आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में जमीनी विशेष बलों के साथ वायुसेना का इस्तेमाल भी सामने आया।
सैन्य कार्रवाइयों के समानांतर केंद्र सरकार आतंकवादी हिंसा में कमी के आंकड़े भी पेश करती रही है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2004 से 2014 के बीच देश में 7,217 आतंकवादी घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि 2014 से 2024 के बीच इनकी संख्या 2,242 रही। सरकार के अनुसार इसी अवधि में आतंकवादी हिंसा से होने वाली कुल मौतों में 70 प्रतिशत, नागरिकों की मौत में 81 प्रतिशत और सुरक्षा बलों की मौत में 50 प्रतिशत की कमी आई।
सरकार ने जम्मू-कश्मीर में भी गिरावट का दावा किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2004-14 के दौरान आतंकवाद से जुड़ी हिंसा में 1,769 नागरिकों की मौत हुई थी, जबकि 2014-24 में यह संख्या 344 रही। हिंसा की घटनाएं भी 16,463 से घटकर 7,744 बताई गई हैं।
पहलगाम में आतंकी हमले के बाद भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। सरकार के अनुसार पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया।
शुरुआती कार्रवाई में बहावलपुर स्थित जैश-ए-मोहम्मद की सुविधा और मुरीदके स्थित लश्कर-ए-तैयबा के परिसर समेत नौ ठिकानों को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया। शुरुआती चरण में पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को लक्ष्य नहीं बनाया गया था। इसके बाद पाकिस्तान की सैन्य प्रतिक्रिया के बीच भारत की कार्रवाई का दायरा बढ़ा। पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों और एयर डिफेंस से जुड़े ठिकानों को भी निशाना बनाए जाने की जानकारी सामने आई। इस तरह ऑपरेशन सिंदूर आतंकवादी ढाँचे पर शुरुआती हमलों से आगे बढ़कर सैन्य प्रतिक्रिया में बदल गया।
India की ओर से लगातार आतंकवाद का जवाब देने का दायरा बढ़ता रहा। 2015 में विशेष बलों की कार्रवाई हुई, 2016 में एलओसी पार जमीनी कार्रवाई की गई, 2019 में एयर पावर का इस्तेमाल हुआ और 2025 में आतंकवादी ठिकानों के साथ सैन्य प्रतिष्ठानों तक कार्रवाई पहुंची। यही क्रम आतंकवाद के खिलाफ भारत की बदली हुई रणनीति को समझने का प्रमुख आधार है।
भारत का जवाब केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा। पहलगाम हमले के बाद सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला किया गया। ऑपरेशन सिंदूर के बाद सरकार ने भारत का पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रखने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भी विभिन्न देशों में भेजे।
12 मई 2025 को प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की आगे की नीति के तीन प्रमुख संकेत दिए। उन्होंने कहा कि भारत जवाब देने का समय और तरीका खुद तय करेगा, परमाणु धमकी को आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई रोकने का आधार नहीं बनने दिया जाएगा और आतंकवादियों तथा उन्हें समर्थन देने वालों को अलग-अलग करके नहीं देखा जाएगा।
बदली हुई रणनीति में सैन्य क्षमता के साथ का इस्तेमाल बढ़ा है। इसमें सटीक निशाना लगाने वाली प्रणालियां, एयर डिफेंस, बेहतर खुफिया जानकारी और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को आधुनिक सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बनी है।
पिछले दस वर्षों का घटनाक्रम बताता है कि भारत की आतंकवाद विरोधी नीति अब केवल हमले के बाद कूटनीतिक विरोध तक सीमित नहीं है। सैन्य क्षमता, कूटनीतिक दबाव, अंतरराष्ट्रीय समर्थन और आतंकवादी ढांचे के खिलाफ लक्षित कार्रवाई को एक व्यापक रणनीति के हिस्से के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
2015 से 2025 के बीच भारत ने जवाब देने के लिए सैन्य और कूटनीतिक विकल्पों का दायरा बढ़ाया है। आने वाले समय में इस रणनीति की अहम चुनौती आतंकवाद पर दबाव बनाए रखते हुए सैन्य प्रतिक्रिया, कूटनीतिक प्रयास और क्षेत्रीय स्थिरता के बीच संतुलन कायम करना होगी।
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