महाराष्ट्र में मिड-डे मील योजना गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है, पिछले चार महीनों से फंड रुका हुआ है। …और पढ़ें
महाराष्ट्र में मिड-डे मील का फंड रुका (AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)
महाराष्ट्र में मिड-डे मील योजना वित्तीय संकट में।
चार महीने से फंड रुका, शिक्षक कर रहे खर्च।
सूखे के कारण बच्चों को पोषण की कमी।
डिजिटल डेस्क, मुंबई। महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों में चल रही मिड-डे मील योजना इस समय एक गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक संकट से गुजर रही है। राज्य के करीब 70% हिस्से में फैले भीषण सूखे के बीच पिछले चार महीनों से इस योजना का फंड रुका हुआ है।
हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि स्कूलों के शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों को बच्चों की भूख मिटाने और योजना को चालू रखने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, केंद्रीय योजनाओं में डायरेक्ट कैश ट्रांसफर के लिए लाई गई नई व्यवस्था सिंगल नोडल एजेंसी (SNA) ‘स्पर्श’ को अपनाने में देरी हुई। इसके अलावा केंद्र और राज्य के फंड को इस नए सॉफ्टवेयर में मिलाने में तकनीकी दिक्कतें आईं, जिसकी वजह से पिछले चार महीनों से बजट अटक गया है।
एक तरफ सूखा होने के कारण ग्रामीण परिवारों की आय बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे गरीब घरों में बच्चों को पौष्टिक भोजन नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में स्कूलों में मिलने वाला मिड-डे मील ही इन बच्चों के लिए पोषण का एकमात्र सहारा बचा है और ऐसे में फंड का रुक जाना बच्चों के लिए भारी संकट के तौर पर देखा जा रहा है।
अच्छा, इन सभी चिजों के बीच एक बड़ी बात यह है कि मिड-डे मील के फंड रुकने के बाद स्कूल के शिक्षक, हेडमास्टर से लेकर रसोइए तक सभी लोग अपनी-अपनी जेब से पैसे देकर बच्चों के खाना का प्रबंध कर रहे हैं।
पूरी बात को ऐसे समझिए कि बीड, वर्धा और अन्य जिलों के हेडमास्टरों का कहना है कि दाल और चावल जैसे खाद्यान्न तो मिल रहे हैं, लेकिन गैस, जलावन की लकड़ी और हरी सब्जियों जैसे अदरक, लहसुन, मिर्च आदि के लिए उन्हें अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं।
बता दें कि स्थिति अब ऐसी हो गई है कि प्राथमिक कक्षाओं 1 से 5 के लिए प्रति छात्र मात्र 2.59 रुपये और उच्च प्राथमिक 6 से 8 के लिए 3.71 रुपये प्रति छात्र प्रतिदिन दिए जाते हैं।
ऐसे में शिक्षकों का सवाल है कि इस महंगाई में इतने कम पैसों से सब्जियां और ईंधन कैसे खरीदा जा सकता है? कई स्कूलों में महीनेभर के लिए मिलने वाला एकमात्र एलपीजी सिलेंडर जल्दी खत्म हो जाता है, जिसके बाद शिक्षकों को चूल्हे के लिए लकड़ी का इंतजाम करना पड़ता है।
दूसरी ओर योजना के तहत काम करने वाले करीब 1.58 लाख रसोइया पिछले चार महीनों से बिना वेतन के काम करने को मजबूर हैं। हाशिए के समुदायों से आने वाले इन कामगारों के पास आजीविका का कोई अन्य साधन न होने के कारण वे डरे-सहमे काम करने आ रहे हैं।