Bharat24
Date: 16-10-26 13:07
1.वर्चुअल फीता और जमीनी जमावड़ा!
डिजिटल सुशासन का कीर्तिमान !
सियासत के गलियारों में तकनीक का ऐसा संगम कम ही देखने को मिलता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 15 अक्टूबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए लद्दाख में 3,350 करोड़ रुपये की विभिन्न विकास योजनाओं का लोकार्पण किया और लगे हाथ एशियाई खेल 2026 के भारतीय दल से गर्मजोशी भरा संवाद भी कर डाला. उधर सत्ता पक्ष के सिपहसालार इसे ‘डिजिटल सुशासन’ का कीर्तिमान बता रहे हैं. अलबत्ता विरोधियों को लग रहा है कि लद्दाख की कड़कड़ाती ठंड में दिल्ली से गर्माहट पहुंचाने का यह अंदाज आगामी चुनावी मौसम की जमीन तैयार करने का हिस्सा है. राजनीतिक प्रेक्षक मान रहे हैं कि खेल और सरहदी विकास का यह कॉम्बिनेशन सचमुच चुनावी चौसर पर डबल स्ट्राइक जैसा है. अब यक्ष प्रश्न यह बना हुआ है कि विरोधी दल इस वर्चुअल रणनीति की काट जमीन पर ढूंढेंगे या टीवी स्टूडियो के डिबेट में?
2.बड़बोले बोल, खुला पोल और जयराम का झटपट ‘कंट्रोल’!
आइसा नेता के ‘बांग्लादेश मॉडल’ बयान पर मचे बवाल के बाद कांग्रेस बैकफुट पर, खरगे-जयराम का डैमेज कंट्रोल !
मंच पर जोश में होश खोने की पुरानी बीमारी ने विपक्षी खेमे को एक बार फिर असहज कर दिया है. AISA नेता नेहा बोरा ने ‘बांग्लादेश के छात्र आंदोलन से प्रेरणा मिलने और रास्ता दिखने’ की बात कह दी, सत्ता पक्ष ने इसे देश में अराजकता भड़काने की साजिश बताकर चौतरफा घेर लिया. चौतरफा घिरते देख कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के निर्देश पर मीडिया प्रभारी जयराम रमेश को तत्काल मैदान में उतरना पड़ा और इसे नेता का ‘व्यक्तिगत विचार’ बताते हुए गठबंधन का पल्ला झाड़ लिया गया. अलबत्ता डैमेज कंट्रोल की इस जल्दबाजी ने साफ कर दिया कि विरोध की सियासत में ‘सेल्फ गोल’ का खतरा कितना बड़ा होता है. सचमुच बयानों की आड़ में जब नैरेटिव बिगड़ने लगता है तो सफाई देने में पसीने छूट ही जाते हैं. राजनीतिक प्रेक्षक कह रहे हैं कि साझा मंचों पर माइक संभालने से पहले सहयोगियों को ‘क्या नहीं बोलना है’ की क्लास दिलाना अब जरूरी हो गया है. अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इस फौरी सफाई से विपक्ष पर लगे ‘अराजक सोच’ के ठप्पे का असर जनता के बीच धुल पाएगा?
3.’कदाचार’ का सबूत कहां है जनाब? सिर्फ नारों से केस नहीं बनता!
कानूनी कसौटी पर कमजोर विपक्षी आरोप !
अदालत और कानून की दुनिया गॉसिप या प्रेस कॉन्फ्रेंस के आरोपों पर नहीं, बल्कि अकाट्य साक्ष्यों पर चलती है. संविधान के तहत सीईसी को केवल दो ही आधारों पर हटाया जा सकता है ‘Proved Misbehaviour या ‘शारीरिक/मानसिक असमर्थता’, विपक्ष के आरोप चुनावी प्रणालियों, वोटर लिस्ट या निष्पक्षता पर राजनीतिक असंतोष हो सकते हैं, लेकिन इन्हें जांच समिति के सामने ‘सिद्ध अपराध’ बनाना लोहे के चने चबाना है. अलबत्ता विपक्षी रणनीतिकारों का दावा है कि उनके पास सवालों की लंबी फेहरिस्त है. सचमुच राजनीतिक आरोपों और न्यायिक सबूतों के बीच मीलों का फासला होता है. राजनीतिक प्रेक्षक कह रहे हैं कि बिना ठोस सुबूत के अदालत का रुख करना खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारना है. अब यक्ष प्रश्न यह है कि जब आधार ही अमूर्त हैं, तो कानूनी फैसला किसके पक्ष में झुकेगा?
4.75 साल का बेदाग रिकॉर्ड !
इतिहास गवाह है, कोई ऐसे नहीं हटा..ऐतिहासिक नजीर बनी सबसे बड़ी ढाल !
भारतीय लोकतंत्र का इतिहास उठाकर देख लीजिए, आजादी से लेकर 2026 तक कई कड़े चुनाव आयुक्त आए और गए,टी.एन. शेषन से लेकर नवीन चावला तक के दौर में विवादों का बवंडर उठा, लेकिन किसी भी सीईसी को महाभियोग या राजनीतिक धरनों के चलते पद छोड़ना नहीं पड़ा. अलबत्ता उस दौर में भी सरकार और विपक्ष के बीच तलवारें खूब खिंची थीं. सचमुच जब साढ़े सात दशकों का इतिहास यह गवाही दे रहा हो कि यह कुर्सी सियासी दबावों के आगे कभी नहीं डोली, तो आज ऐसा होना नामुमकिन के करीब नजर आता है. राजनीतिक प्रेक्षक इस ऐतिहासिक निरंतरता को भारतीय संवैधानिक ढांचे की सबसे बड़ी मजबूती मानते हैं. यक्ष प्रश्न यही बना हुआ है कि जो इतिहास पिछले 75 सालों में नहीं बदला, क्या वह आज के सियासी ड्रामे से बदल पाएगा?
5.प्रेस कॉन्फ्रेंस’ का नैरेटिव बनाम जमीनी सच,बस माहौल बनाना ही मकसद!
आयोग पर सवाल उठाना विपक्ष की राजनीतिक रणनीति, जमीनी बदलाव की क्षमता नगण्य !
सियासी अखाड़े के अनुभवी खिलाड़ी अच्छी तरह जानते हैं कि कई बार लड़ाई जीतने के लिए नहीं, बल्कि मैदान में टिके दिखने और माहौल (नैरेटिव) बनाने के लिए लड़ी जाती है. चुनाव आयोग पर तीखे हमले और इस्तीफे की मांग दरअसल कैडर को लामबंद रखने और चुनावी हार के संभावित झटकों से पहले ढाल तैयार करने की एक जानी-पहचानी रणनीति है. अलबत्ता इस हंगामे के पीछे कोई वास्तविक कानूनी या संवैधानिक ताकत नहीं होती जो सीईसी को हटाने की क्षमता रखती हो. सचमुच टीवी कैमरों के सामने की गर्जना और कानूनी पटल की सच्चाई में जमीन-आसमान का अंतर है. राजनीतिक प्रेक्षक इसे विशुद्ध रूप से ‘सियासी परसेप्शन वार’ करार दे रहे हैं. अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या यह नैरेटिव आम मतदाता के गले उतरेगा या फिर इसे महज एक चुनावी बहानेबाजी मानकर भुला दिया जाएगा?
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