मध्यावधि चुनाव नतीजों से क्या ट्रंप की नीति बदलेगी – Hindustan

अमेरिका के लोग राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के ठीक बीचोबीच अमेरिकी कांग्रेस के निचले सदन, यानी ‘हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स’ की सभी 435 सीटों और 100 सदस्यों वाले उच्च सदन ‘सीनेट’ की लगभग एक तिहाई, यानी 35 सीटों के लिए आगामी 3 नवंबर को मतदान करेंगे। वहां सीनेट का चुनाव भी जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान के जरिये ही किया जाता है।

भारत में जैसे विधानसभा चुनावों को केंद्र सरकार के कामकाज पर एक जनमत संग्रह के रूप में देखा जाता है, वैसे ही अमेरिका में मध्यावधि चुनावों को राष्ट्रपति के ‘रिपोर्ट कार्ड’ के रूप में देखा जाता है। हमारी लोकसभा की तरह ही अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स, जिसे संक्षेप में हाउस कहा जाता है, के सदस्य साधारण बहुमत प्रणाली के जरिये चुने जाते हैं। इस प्रणाली के तहत मतदान में मामूली बढ़त भी सीटों की संख्या में बड़ी तब्दीली ला सकती है, जैसा भारत में साल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को मिला था। उस समय भाजपा को 31 प्रतिशत वोट मिले, जबकि सीटें 543 में से 282 मिल गई थीं। इसी तरह, 2019 के चुनाव में भी हुआ।

अमेरिकी मध्यावधि चुनाव की बात करें, तो प्रचार के आखिरी दो हफ्तों में ट्रंप की लोकप्रियता काफी गिरी है। ‘तक्षशिला यूएस मिडटर्म इलेक्शन ऑब्जर्वर’ के अनुसार, जब मतदाताओं से यह पूछा गया कि वे अमेरिकी कांग्रेस में किस पार्टी को देखना चाहते हैं, तो 49.3 प्रतिशत लोगों ने डेमोक्रेटिक पार्टी और 41.7 प्रतिशत लोगों ने रिपब्लिकन पार्टी का समर्थन किया, यानी डेमोक्रेटिक पार्टी को 7.6 फीसदी की बढ़त हासिल है।

अमेरिकी मीडिया ब्लू वेव, यानी नीले रंग की लहर की बात कर रहा है, नीला डेमोक्रेटिक पार्टी का रंग है। यदि रिपब्लिकन दोनों सदनों में मौजूदा स्थिति को बरकरार रखते हैं या हाउस में बहुत कम अंतर से हारते हैं, तब व्हाइट हाउस इसे विश्वास मत के रूप में देखेगा। अपने कट्टर मतदाताओं को उत्साहित करने वाले मुद्दों, जैसे टैरिफ, आव्रजन और वर्क वीजा पर ट्रंप प्रशासन द्वारा कड़ा रुख अपनाया जाएगा। इस महीने नियोक्ता-प्रायोजित ग्रीन कार्ड पर लगाए गए प्रतिबंध से भारतीय आईटी कंपनियों को पहले ही नुकसान हो चुका है और अगर ट्रंप की पार्टी जीत जाती है, तो उनके पास इसे बरकरार रखने का साहस प्राप्त हो जाएगा। उनका भारत पर रूस से तेल की खरीद कम करने के लिए दबाव भी जारी रहेगा। इस प्रतिबंध कानून को भी उनकी जीत से समर्थन प्राप्त हो जाएगा। असली प्रश्न है कि ट्रंप की पार्टी यदि इन चुनावों में हारती है, तब क्या होगा? क्या उनकी सरकार अपनी टैरिफ नीति पर फिर से विचार करेगी?

भारत के लिए यह दोधारी तलवार जैसा है। जल्दी नतीजे की चाह रखने वाले राष्ट्रपति ट्रंप नई दिल्ली के साथ व्यापार समझौता करने के लिए ज्यादा उत्सुक हो सकते हैं। साथ ही, वह टैरिफ (आयात शुल्क) व दूसरे प्रतिबंधों का इस्तेमाल मोल-भाव के हथियार के तौर पर करते हुए भारत पर और ज्यादा दबाव डाल सकते हैं, क्योंकि ये चीजें उनके अपने नियंत्रण में रहेंगी। अगर डेमोक्रेट्स सीनेट में भी जीत जाते हैं, तब उनके पास राजदूतों की नियुक्ति, वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियों और संधियों को मंजूरी देने का अधिकार भी आ जाएगा। वे चाहें, तो इन नियुक्तियों को महीनों तक लटका भी सकते हैं।

अमेरिकी चुनावों में इस बार चाहे जो परिणाम आए, भारत संबंधी उसकी नीतियों में बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। भारत को बस बातचीत के लहजे में बदलाव की उम्मीद रखनी चाहिए। अमेरिका की दोनों ही पार्टियां अब अपने उद्योगों को बचाने और आव्रजन को सख्त करने के पक्ष में हैं। अगर हाउस में डेमोक्रेटिक पार्टी का दबदबा रहता है, तो वह टैरिफ, वीजा और भारत के साथ प्रशासन के कामकाज को लेकर ज्यादा तीखे सवाल पूछ सकती है।

बहरहाल, 3 नवंबर के बाद राष्ट्रपति ट्रंप चाहे मजबूत स्थिति में हों या कमजोर, वे उन शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे, जो सीधे उनके हाथ में हैं, और यही वे शक्तियां हैं, जिनका भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है, जैसे टैरिफ, प्रतिबंध और वीजा। इसलिए, नई दिल्ली को इन चीजों के लिए पहले से तैयारी रखनी चाहिए।

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