India Space Debris: भारत 2030 तक अपने अंतरिक्ष मिशन को पूरी तरह से मलबे से मुक्त बनाने के उद्देश्य से एक मलबा-मुक्त अंतरिक्ष मिशन शुरू करने जा रहा है. केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा है कि भारत अंतरिक्ष मलबे को हटाने और अंतरिक्ष को सुरक्षित और टिकाऊ बनाए रखने में वैश्विक नेतृत्व करने की तैयारी कर रहा है. यह प्रयास तब किया गया है जब निष्क्रिय सैटेलाइट, छोड़े गए रॉकेट के टुकड़े और दूसरे अंतरिक्ष कबाड़ पृथ्वी की कक्षा में जमा होते जा रहे हैं.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इस समस्या के समाधान के लिए प्रौद्योगिकियों पर निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप के साथ काम कर रहा है. योजना में नए मलबे को रोकने के साथ-साथ पहले से ही पृथ्वी की परिक्रमा कर रही चीजों को हटाना शामिल है.
डैब्रिस फ्री स्पेस मिशन के जरिए नए मलबे को रोकना
मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन नीति के तहत भविष्य के भारतीय सैटेलाइट मिशन चाहे सरकारी नेतृत्व वाले हो या फिर निजी, के द्वारा अपने पीछे नया अंतरिक्ष मलबा छोड़ने की उम्मीद नहीं है. जब भी कोई मिशन अपने निष्कर्ष पर पहुंचेगा तो उसकी संपत्ति कंट्रोल तरीके से नष्ट कर दी जाएगी. इसका उद्देश्य मलबे की रोकथाम को मिशन योजना का हिस्सा बनाना है ना कि फेंके गए उपकरणों को कक्षा में दिखाई देने के बाद ही समस्या मानना.

मौजूदा कबाड़ को पकड़ने के लिए रोबोटिक अंतरिक्ष यान
भारत मौजूदा कक्षीय कचरे को पकड़ने और हटाने के लिए रोबोटिक अंतरिक्ष यान और मलबा हटाने वाले वाहन भी विकसित कर रहा है. इस काम में निजी भारतीय स्टार्टअप योगदान दे रहे हैं. हैदराबाद स्थित कॉस्मोसर्व स्पेस मलबे को पकड़ने के लिए डिजाइन किए गए खास रोबोटिक उपग्रह विकसित करने वाली कंपनियों में से एक है. भारत के स्वदेशी मलबा हटाने वाले वाहन का उद्देश्य कक्षा से कचरा को सक्रिय रूप से हटाना है.
ये टेक्नोलॉजी उन चीजों से निपटने के लिए डिजाइन की गई हैं जो पहले से ही पृथ्वी का चक्कर लगा रही हैं. मलबे को पकड़ने से उन अनियंत्रित चीजों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी जो काम कर रहे उपग्रह या फिर अंतरिक्ष अभियानों से टकरा सकती हैं.
सैटेलाइट का जीवन बढ़ाने के लिए उनमें ईंधन भरना
इस रणनीति का दूसरा हिस्सा अंतरिक्ष में ईंधन भरना है. भारत अंतरिक्ष यान विकसित कर रहा है जो कक्षा में पहले से ही सक्रिय सैटेलाइट को ईंधन भर सकता है. उनके परिचालन जीवन को बढ़ाकर टेक्नोलॉजी सैटेलाइट को जरूरत से पहले निष्क्रिय होने से रोक सकती है. जो सैटेलाइट काम करना बंद कर देती है वह अतिरिक्त अंतरिक्ष कबाड़ बन सकती है.

मिशन के बाद निपटान और डी-ऑर्बिटिंग
भारत जापान की एयरोस्पेस कंपनियों के साथ पोस्ट-मिशन डिस्पोजल सिस्टम पर काम कर रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक जापानी कंपनी एस्ट्रोस्केल की पहचान करती है जिसे बुल कहा जाता है. यह भारतीय टेक्नोलॉजी के साथ-साथ एक निपटान प्रणाली विकसित कर रही है. जब भी कोई सैटेलाइट अपने परिचालक जीवन के अंत तक पहुंचती है तो सिस्टम का उद्देश्य उसे पृथ्वी के वायुमंडल की तरफ धकेलना होता है. वायुमंडलीय घर्षण की वजह से यह जलकर नष्ट हो जाएगा.
इसरो ने भविष्य के मिशनों के दौरान खर्च किए गए रॉकेट चरण और सैटेलाइट को डी ऑर्बिट करने की भी योजना बनाई है. अपना काम पूरा होने के बाद इन चीजों को अंतरिक्ष में छोड़ने के बजाय एजेंसी उन्हें पृथ्वी के निचले वायुमंडल में लाने का इरादा रखती है ताकि वे जल जाएं.
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अंतरिक्ष का मलबा खतरनाक क्यों है?
मलबे के लाखों टुकड़े, छोटे टुकड़ों से लेकर बड़ी चीजों तक पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे हैं. वे 28000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से यात्रा कर सकते हैं. ऐसी रफ्तार पर एक छोटे से टुकड़े से होने वाली टक्कर भी काम कर रही सेटेलाइट के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है.
टक्कर से भारत के नियोजित गगनयान मिशन या फिर अंतरिक्ष स्टेशन सहित चालक दल के मिशन को भी विनाशकारी नुकसान पहुंच सकता है. इस वजह से मलबे की बढ़ती मात्रा सैटेलाइट और मानव अंतरिक्ष उड़ानों के लिए काफी ज्यादा जोखिम पैदा करती है.
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स्पर्श गोयल एबीपी लाइव के साथ कंटेंट राइटर के तौर पर जुड़े हुए हैं. वह जनरल नॉलेज बीट की जिम्मेदारी संभालते हैं. कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में उन्हें चार साल का अनुभव है. एबीपी से पहले वह डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद में करीब दो साल तक काम कर चुके हैं. उन्होंने नमस्कार भारत से अपने करियर की शुरुआत की थी. .
वह अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करके पाठकों के लिए जानकारी को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में पेश करते हैं. उन्होंने न्यूज राइटिंग के साथ-साथ स्क्रीनराइटिंग में भी अपनी पकड़ मजबूत की.
उन्होंने मां शाकुम्भरी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. इसके साथ उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन से स्क्रीनप्ले का डिप्लोमा भी हासिल किया है.
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