अमेरिका ने सोमवार को भारत समेत कुछ देशों पर आरोप लगाया है कि वे अमेरिकी उत्पादों पर बहुत ज्यादा टैरिफ लगा रहे हैं. व्हाइट हाउस ने कहा ऐसा करना गलत है और इन देशों ने अमेरिकी निर्यातकों को काफी नुकसान पहुंचाया है.
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव करोलिन लेविट ने बताया कि भारत, जापान और यूरोपीय संघ जैसे देशों ने अमेरिकी सामानों पर काफी ज्यादा टैरिफ लगा रखा है.
भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का आरोप
करोलिन लेविट ने कहती हैं कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाता है, जिससे अमेरिकी उत्पादों का भारत जैसे बड़े बाजारों में पहुंच पाना मुश्किल हो जाता है. उन्होंने आगे कहा, ‘यह शुल्क इतना ज्यादा है कि अमेरिकी सामानों को भारतीय बाजार में लाना लगभग असंभव हो गया है.’
इसके अलावा, लेविट ने यूरोपीय संघ से अमेरिकी डेयरी उत्पादों पर 50 प्रतिशत, जापान से अमेरिकी चावल पर 700 प्रतिशत और कनाडा से अमेरिकी मक्खन और पनीर पर 300 प्रतिशत शुल्क का भी जिक्र किया. उनके अनुसार, इन सभी देशों द्वारा लगाए गए हाई टैरिफ अमेरिकी व्यापारियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन रहे हैं.
2 अप्रैल से लागू होंगे नए
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले ही इस बात का ऐलान कर चुके हैं कि वह 2 अप्रैल से नया टैरिफ प्लान लागू करने वाले हैं. जो व्यापार नीति में बड़ा बदलाव ला सकता है. ट्रम्प का कहना है कि अब कोई भी देश अगर अमेरिका पर शुल्क लगाएगा, तो अमेरिका भी वही शुल्क उस देश पर लगाएगा. उनका कहना था, ‘अब यह सब समान रूप से होगा. हम जिस देश से व्यापार करते हैं, वहां क्या शुल्क लगाए जा रहे हैं, यह सभी को पता चल जाएगा.’
नए शुल्क का मोटिव है अमेरिकी व्यापार को न्याय दिलाना
व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया है कि 2 अप्रैल से शुरू होने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ अमेरिकी व्यापारियों को न्याय दिलाने के लिए लागू किए जा रहे हैं. लेविट ने कहा कि यह कदम अमेरिकी उत्पादकों के हित में उठाया जा रहा है, ताकि वे पूरी दुनिया में समान अवसर पा सकें. उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प बुधवार को इस नई नीति की घोषणा करेंगे और इसे एक ऐतिहासिक कदम माना जाएगा.
अमेरिका ने भारत और अन्य देशों द्वारा लगाए गए उच्च शुल्कों पर कड़ी आपत्ति जताई है और 2 अप्रैल से नए प्रतिवादी शुल्क लागू करने का ऐलान किया है. इस कदम का उद्देश्य अमेरिकी व्यापारियों को उनके उत्पादों के लिए समान अवसर देना है, ताकि उन्हें विदेशी बाजारों में ज्यादा चुनौती का सामना न करना पड़े. अब देखना यह है कि इस कदम से वैश्विक व्यापार पर क्या असर पड़ेगा.
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