हम दो हमारे दो.. बच्चे दो ही अच्छे.. छोटा परिवार सुखी परिवार.. बचपन से ही न जाने ऐसे कितने ही नारे हम पढ़ते और गढ़ते रहे हैं.. इसका सीधा मकसद सिर्फ यही रहा है कि परिवार जितना छोटा होगा, आबादी उतनी कम होगी और देश उतना ही खुशहाल बनेगा..। लेकिन अब ऐसे नारों पर फिर से बहस की जरूरत है.. दो बच्चों के सिद्धांत पर फिर से गौर करने की जरूरत है..। ये हम नहीं कह रहे.. बल्कि संघ प्रमुुख मोहन भागवत जी की ऐसी नसीहत है..। आज दिन भर जिस बयान को लेकर सियासत होती रही.. उसका मतलब क्या है और उसकी जरूरत क्यों है.. देखिए इस रिपोर्ट में..