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Datta Purnima 2025 Date: दत्त पूर्णिमा मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को बड़े श्रद्धा-भाव से मनाई जाती है. इसे दत्त जयंती भी कहा जाता है. इस पावन दिन को भगवान दत्तात्रेय के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त अवतार माना गया है. इस अवसर पर भक्तजन भगवान दत्तात्रेय की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. माना जाता है कि इस दिन की गई उपासना से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और धन-वैभव का आगमन होता है. आइए जानते हैं, दत्त पूर्णिमा 2025 कब है और भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?
दत्त पूर्णिमा को अत्यंत मंगलकारी दिन माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से की गई पूजा घर में सकारात्मक ऊर्जा लाती है और वातावरण को शांति व सौभाग्य से भर देती है. यह पर्व हर वर्ष मार्गशीर्ष या अगहन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है.
इस वर्ष दत्त पूर्णिमा का पावन उत्सव गुरुवार, 4 दिसंबर 2025 को मनाया जाएगा. इस दिन भगवान दत्तात्रेय की पूजा के साथ-साथ देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु और शिवजी की आराधना करना भी विशेष रूप से शुभ माना जाता है.
दत्त पूर्णिमा या दत्त जयंती भगवान दत्तात्रेय को समर्पित है. लोककथाओं के अनुसार, ऋषि अत्रि की पत्नी देवी अनुसूइया अपनी अद्भुत पतिव्रता शक्ति के लिए प्रसिद्ध थीं. उनकी इसी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए देवियां, लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती ने योजना बनाई. उन्होंने अपने-अपने पतियों, अर्थात् भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्माजी को देवी अनुसूइया के आश्रम में भेजा.
तीनों देवता वहां पहुंचकर देवी अनुसूइया से यह विचित्र वर माँगने लगे कि वे उन्हें निर्वस्त्र होकर भिक्षा दें. यह सुनकर भी देवी अनुसूइया विचलित नहीं हुईं. अपने सतीत्व के प्रभाव से उन्होंने तीनों देवताओं को छह माह के बालक का रूप दे दिया और माता के प्रेम से उनका पालन-पोषण किया.
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जब यह बात त्रिदेवियों, लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ज्ञात हुई, तो वे तुरंत अनुसूइया के पास पहुंचीं और विनम्रतापूर्वक अपने पतियों को मूल स्वरूप में लौटाने की प्रार्थना की. देवियों की विनती पर अनुसूइया ने तीनों देवताओं को उनके वास्तविक रूप में वापस कर दिया.
उनकी पवित्रता और शक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे अपने-अपने अंश से उनके गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे. उसी वरदान के अनुसार ब्रह्मा के अंश से चंद्रदेव, शिव के अंश से ऋषि दुर्वासा और विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय अवतरित हुए. भगवान दत्त के तीन मुख हैं. इनके साथ हमेशा एक कुत्ता रहता है.
महाराज दत्तात्रेय जीवनभर ब्रह्मचारी रहे और उन्हें अवधूत तथा दिगंबर स्वरूप माना जाता है. वे सर्वत्र उपस्थित माने जाते हैं और कहा जाता है कि संकट के समय वे अपने भक्तों की तुरंत सहायता करते हैं. यदि कोई व्यक्ति मन, वाणी या कर्म से श्रद्धापूर्वक दत्तात्रेय भगवान की उपासना करे, तो उसकी कठिनाइयां जल्दी दूर होने लगती हैं और उसे मार्गदर्शन तथा शक्ति प्राप्त होती है.
महिष्मति राज्य के राजा कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्होंने रावण को भी पराजित किया था, भगवान दत्तात्रेय के परम भक्त माने जाते हैं. कहा जाता है कि दत्तात्रेय जी के आशीर्वाद से ही कार्तवीर्य अर्जुन ने असाधारण शक्ति प्राप्त की थी, जिसके बल पर वे अनेक शक्तिशाली योद्धाओं को परास्त कर सके.
एक बार राजा यदु ने भगवान दत्तात्रेय से पूछा कि उनके गुरु कौन हैं. इस पर भगवान दत्तात्रेय ने उत्तर दिया, ‘मेरे लिए तो आत्मा ही सर्वोच्च गुरु है, लेकिन फिर भी मैंने 24 अलग-अलग स्रोतों को गुरु मानकर उनसे ज्ञान प्राप्त किया है.’ कहते उनके गुरुओं में अजगर, कबूतर, पतंगा, मछली, हिरण, हाथी, मधुमक्खी समेत पिंगला वेश्या भी थी, जिससे उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था.
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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।
Datta Purnima 2025 Date: दत्त पूर्णिमा मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को बड़े श्रद्धा-भाव से मनाई जाती है. इसे दत्त जयंती भी कहा जाता है. इस पावन दिन को भगवान दत्तात्रेय के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त अवतार माना गया है. इस अवसर पर भक्तजन भगवान दत्तात्रेय की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. माना जाता है कि इस दिन की गई उपासना से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और धन-वैभव का आगमन होता है. आइए जानते हैं, दत्त पूर्णिमा 2025 कब है और भगवान दत्तात्रेय कौन हैं?
दत्त पूर्णिमा को अत्यंत मंगलकारी दिन माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से की गई पूजा घर में सकारात्मक ऊर्जा लाती है और वातावरण को शांति व सौभाग्य से भर देती है. यह पर्व हर वर्ष मार्गशीर्ष या अगहन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है.
इस वर्ष दत्त पूर्णिमा का पावन उत्सव गुरुवार, 4 दिसंबर 2025 को मनाया जाएगा. इस दिन भगवान दत्तात्रेय की पूजा के साथ-साथ देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु और शिवजी की आराधना करना भी विशेष रूप से शुभ माना जाता है.
दत्त पूर्णिमा या दत्त जयंती भगवान दत्तात्रेय को समर्पित है. लोककथाओं के अनुसार, ऋषि अत्रि की पत्नी देवी अनुसूइया अपनी अद्भुत पतिव्रता शक्ति के लिए प्रसिद्ध थीं. उनकी इसी शक्ति की परीक्षा लेने के लिए देवियां, लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती ने योजना बनाई. उन्होंने अपने-अपने पतियों, अर्थात् भगवान विष्णु, भगवान शिव और ब्रह्माजी को देवी अनुसूइया के आश्रम में भेजा.
तीनों देवता वहां पहुंचकर देवी अनुसूइया से यह विचित्र वर माँगने लगे कि वे उन्हें निर्वस्त्र होकर भिक्षा दें. यह सुनकर भी देवी अनुसूइया विचलित नहीं हुईं. अपने सतीत्व के प्रभाव से उन्होंने तीनों देवताओं को छह माह के बालक का रूप दे दिया और माता के प्रेम से उनका पालन-पोषण किया.
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जब यह बात त्रिदेवियों, लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ज्ञात हुई, तो वे तुरंत अनुसूइया के पास पहुंचीं और विनम्रतापूर्वक अपने पतियों को मूल स्वरूप में लौटाने की प्रार्थना की. देवियों की विनती पर अनुसूइया ने तीनों देवताओं को उनके वास्तविक रूप में वापस कर दिया.
उनकी पवित्रता और शक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि वे अपने-अपने अंश से उनके गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे. उसी वरदान के अनुसार ब्रह्मा के अंश से चंद्रदेव, शिव के अंश से ऋषि दुर्वासा और विष्णु के अंश से भगवान दत्तात्रेय अवतरित हुए. भगवान दत्त के तीन मुख हैं. इनके साथ हमेशा एक कुत्ता रहता है.
महाराज दत्तात्रेय जीवनभर ब्रह्मचारी रहे और उन्हें अवधूत तथा दिगंबर स्वरूप माना जाता है. वे सर्वत्र उपस्थित माने जाते हैं और कहा जाता है कि संकट के समय वे अपने भक्तों की तुरंत सहायता करते हैं. यदि कोई व्यक्ति मन, वाणी या कर्म से श्रद्धापूर्वक दत्तात्रेय भगवान की उपासना करे, तो उसकी कठिनाइयां जल्दी दूर होने लगती हैं और उसे मार्गदर्शन तथा शक्ति प्राप्त होती है.
महिष्मति राज्य के राजा कार्तवीर्य अर्जुन, जिन्होंने रावण को भी पराजित किया था, भगवान दत्तात्रेय के परम भक्त माने जाते हैं. कहा जाता है कि दत्तात्रेय जी के आशीर्वाद से ही कार्तवीर्य अर्जुन ने असाधारण शक्ति प्राप्त की थी, जिसके बल पर वे अनेक शक्तिशाली योद्धाओं को परास्त कर सके.
एक बार राजा यदु ने भगवान दत्तात्रेय से पूछा कि उनके गुरु कौन हैं. इस पर भगवान दत्तात्रेय ने उत्तर दिया, ‘मेरे लिए तो आत्मा ही सर्वोच्च गुरु है, लेकिन फिर भी मैंने 24 अलग-अलग स्रोतों को गुरु मानकर उनसे ज्ञान प्राप्त किया है.’ कहते उनके गुरुओं में अजगर, कबूतर, पतंगा, मछली, हिरण, हाथी, मधुमक्खी समेत पिंगला वेश्या भी थी, जिससे उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था.
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