Delimitation: आबादी कम लेकिन GDP में ज्यादा योगदान; जानिए परिसीमन को लेकर क्या हैं दक्षिण भारत की चिताएं – Jansatta

Delimitation: देश 2026 में होने वाले परिसीमन की तैयारी कर रहा है, वहीं दक्षिणी राज्य जनसंख्या परिवर्तन के कारण संभावित सीट नुकसान के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। नेताओं का तर्क है कि इस प्रक्रिया से उत्तरी राज्यों को अनुचित लाभ हो सकता है, जबकि दक्षिणी राज्यों ने अपनी जनसंख्या को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है।
पांच मार्च को, दक्षिण भारत के अधिकांश राजनीतिक दल 2026 में होने वाले संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन का विरोध करने के लिए बुलाई गई सर्वदलीय बैठक के लिए एक साथ आए। इन दलों ने छह सूत्री प्रस्ताव में, केंद्र से 1971 की जनगणना आधारित परिसीमन ढांचे को 2026 से आगे 30 वर्षों के लिए बढ़ाने के लिए कहा, ताकि दक्षिणी राज्यों के लिए उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके, जिन्होंने अपनी जनसंख्या को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया है।
क्षेत्रीय असमानता – जनसंख्या एक निर्णायक कारक होने के कारण लोकसभा में भारत के उत्तरी और दक्षिणी भाग के बीच प्रतिनिधित्व में असमानता। केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन, जनसंख्या नियंत्रण में दक्षिणी राज्यों द्वारा की गई प्रगति की उपेक्षा करता है तथा संघीय ढांचे में असमानता पैदा कर सकता है। देश की केवल 18% आबादी होने के बावजूद , दक्षिणी राज्य देश के सकल घरेलू उत्पाद में 35% का योगदान देते हैं। उत्तरी राज्यों, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण को प्राथमिकता नहीं दी थी, को उनकी उच्च जनसंख्या वृद्धि के कारण परिसीमन प्रक्रिया में लाभ मिलने की उम्मीद है।
अपर्याप्त वित्तीय सहायता – 15वें वित्त आयोग द्वारा 2011 की जनगणना को अपनी सिफारिश के आधार के रूप में उपयोग करने के बाद , दक्षिणी राज्यों को मिलने वाली धनराशि तथा संसद में प्रतिनिधित्व खोने की चिंता व्यक्त की गई। इससे पहले, राज्यों को वित्त पोषण और कर हस्तांतरण संबंधी सिफारिशों के लिए 1971 की जनगणना को आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।
अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण को प्रभावित करना – निर्धारित परिसीमन और सीटों के पुर्नआबंटन के परिणामस्वरूप न केवल दक्षिणी राज्यों की सीटों में कमी आ सकती है , बल्कि उत्तर में समर्थन आधार वाले राजनीतिक दलों की शक्ति में भी वृद्धि हो सकती है। इससे संभवत: सत्ता का स्थानांतरण उत्तर की ओर तथा दक्षिण से दूर हो सकता है। यह प्रक्रिया प्रत्येक राज्य में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों के विभाजन को भी प्रभावित करेगी (अनुच्छेद 330 और 332 के तहत)।
परिसीमन योजना के जरिए राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास है। किसी भी राज्य को इसकी इजाजत नहीं देनी चाहिए। इस खतरे को समझते हुए तमिलनाडु अभूतपूर्व एकता के साथ काम कर रहा है।”
यह संघीय सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और कुछ राज्यों को गलत तरीके से निशाना बनाता है। राष्ट्रीय नीतियों को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्यों को पुरस्कृत किया जाना चाहिए, दंडित नहीं। प्रस्तावित परिसीमन राज्यों पर लटकी तलवार है।
यह दक्षिणी राज्यों पर जनसांख्यिकी दंड लगाने जैसा है। कायदे से पिछले पांच दशकों से राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान के लिए राज्यों को मान्यता दी जानी चाहिए। दक्षिणी राज्यों के लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में कमी करने से वे भारत के राजनीतिक रंगमंच में एक निष्क्रिय दर्शक बन जाएंगे।
दक्षिणी राज्यों के साथ अन्याय होगा। इससे वे राज्य प्रभावित होंगे, जिन्होंने परिवार नियोजन के उपायों को लागू किया है।

Delimitation: क्या है परिसीमन? जानिए इससे जुड़ी प्रक्रिया और क्या कहता है संविधान
यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो दक्षिणी राज्यों को संसदीय सीटों का नुकसान होगा।
यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो केरल को संसदीय सीटों का नुकसान होगा।

यदि परिसीमन जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो झारखंड को संसदीय सीटों का नुकसान होगा।
अमेरिका – प्रतिनिधि सभा (जो हमारी लोकसभा के समतुल्य है) में सीटों की संख्या 1913 से 435 तक सीमित है। देश की जनसंख्या 1911 में 9.4 करोड़ से लगभग चार गुना बढ़कर 2023 में अनुमानित 33.4 करोड़ हो गई है। प्रत्येक जनगणना के बाद राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा समान अनुपात की पद्धति के माध्यम से किया जाता है। इससे किसी भी राज्य को कोई खास लाभ या हानि नहीं होती है। उदाहरण के लिए, 2020 की जनगणना के आधार पर पुर्नआबंटन के परिणामस्वरूप 37 राज्यों की सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है।
यूरोपीय संघ (ईयू) – 720 सदस्यों वाले यूरोपीय संघ की संसद में सीटों की संख्या अवक्रमित आनुपातिकता के सिद्धांत के आधार पर 27 सदस्य देशों के बीच विभाजित की जाती है। इस सिद्धांत के तहत, जनसंख्या बढ़ने के साथ सीटों की संख्या का अनुपात भी बढ़ जाएगा। उदाहरण के लिए, लगभग 60 लाख की आबादी वाले डेनमार्क के पास 15 सीटें हैं (प्रति सदस्य औसत जनसंख्या चार लाख), जबकि 8.3 करोड़ की आबादी वाले जर्मनी के पास 96 सीटें हैं (प्रति सदस्य औसत जनसंख्या 8.6 लाख)।
परिसीमन: क्या यूपी जैसे बड़े राज्यों के विभाजन से निपट सकता है विवाद?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के अनुसार, परिसीमन दक्षिण भारत के लिए एक खतरा है। दक्षिण भारत के राज्य, जो स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक मामलों में बेहतर हैं, कम जनसंख्या वृद्धि के कारण संसदीय सीटें खो सकते हैं। इससे उन्हें कम बच्चे पैदा करने और अधिक राजस्व जुटाने की सजा मिलेगी।

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