चीन ने अपने रियूजेबल रॉकेट लॉन्ग मार्च 10B का सफल परीक्षण किया है और अब वह 'इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम' पर काम कर रहा है। यह तकनीक रॉकेट को शुरुआ …और पढ़ें
क्या चीन का इलेक्ट्रिक रॉकेट लॉन्चर एलन मस्क के केमिकल रॉकेट को बेकार कर सकता है?
चीन ने रियूजेबल लॉन्ग मार्च 10B रॉकेट का सफल परीक्षण किया।
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम से रॉकेट को शुरुआती बिजली की गति मिलेगी।
यह तकनीक भविष्य में अंतरिक्ष यात्रा की तस्वीर बदल सकती है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अंतरिक्ष की दुनिया में एक बहुत बड़ी हलचल मची हुई है। हाल ही में चीन ने अपने लॉन्ग मार्च 10B रॉकेट का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है। इसके पहले चरण का बूस्टर समुद्र में बने एक प्लेटफॉर्म पर जाल में सुरक्षित उतर गया। यह चीन का पहला सफल रियूजेबल यानी दोबारा इस्तेमाल होने वाला रॉकेट मिशन था। ऐसा कारनामा करने वाला अमेरिका के बाद चीन दुनिया का दूसरा देश बन गया है।
हालांकि चीन सिर्फ यहीं नहीं रुका। दावा किया जा रहा है कि वह एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहा है जो अंतरिक्ष यात्रा की पूरी तस्वीर बदल सकती है। इसका नाम है ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम’। ऐसे में अब सवाल है कि आखिर यह तकनीक क्या है, यह कैसे काम करती है और क्या यह एलन मस्क की स्पेसएक्स की केमिकल रॉकेट तकनीक को चुनौती दे सकती है या नहीं? आइए हम आपको बताते हैं।
इस बात को ऐसे समझिए कि गुरुत्वाकर्षण की वजह से अंतरिक्ष में पहुंचना बेहद मुश्किल काम है। पृथ्वी की कक्षा में किसी अंतरिक्ष यान को लगभग 7.8 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चलना पड़ता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से पूरी तरह बाहर निकलने के लिए यह रफ्तार करीब 11.2 किलोमीटर प्रति सेकंड होनी चाहिए।
अब तक पारंपरिक केमिकल रॉकेट ही इस काम के लिए इस्तेमाल होते आए हैं। ये रॉकेट ईंधन और ऑक्सीडाइजर को जलाकर भारी मात्रा में गर्म गैसें छोड़ते हैं, जिससे जबरदस्त ताकत पैदा होती है।
रॉकेट को उड़ने के लिए अपने साथ बहुत सारा ईंधन ढोना पड़ता है। समस्या यह है कि जितना ज्यादा ईंधन रॉकेट ले जाता है, वह उतना ही भारी हो जाता है और उस भारी वजन को उठाने के लिए और अधिक ईंधन की जरूरत पड़ती है।
यही वजह है कि रॉकेट को कई चरणों में बांटा जाता है, ताकि इस्तेमाल हो चुका खाली टैंक वजन कम करने के लिए रास्ते में ही छूट जाए। इसके बावजूद, पारंपरिक लॉन्च बहुत महंगे और जटिल होते हैं।
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने अपने फाल्कन 9 रॉकेट के जरिए यह साबित कर दिया कि रॉकेट को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। फाल्कन 9 का पहला हिस्सा (बूस्टर) अंतरिक्ष में पेलोड छोड़ने के बाद वापस धरती पर लौट आता है और सुरक्षित लैंड करता है।
इसके अलावा इससे लॉन्च की लागत में भारी कमी आई है। शुरुआती दौर में अंतरिक्ष में प्रति किलोग्राम भेजने का खर्च जो औसतन लगभग 17 लाख हुआ करता था, वह घटकर करीब ढाई लाख रुपया प्रति किलोग्राम पर आ गया। हालांकि, स्पेसएक्स का नया स्टारशिप हो या फाल्कन 9, वे अभी भी केमिकल ईंधन पर ही निर्भर हैं। उन्हें गुरुत्वाकर्षण को मात देने के लिए भारी मात्रा में ईंधन जलाना ही पड़ता है।
बता दें कि चीन अंतरिक्ष में ईंधन की इस भारी खपत को कम करने के लिए एक क्रांतिकारी तकनीक पर काम कर रहा है।
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट- चीन के इस प्रस्तावित प्रोजेक्ट के तहत, रॉकेट को जमीन पर बने एक लंबे ट्रैक पर शक्तिशाली इलेक्ट्रिक मोटर्स की मदद से तेज गति से आगे बढ़ाया जाएगा।
शुरुआती धक्का बिजली से- यानी, रॉकेट अपने पैड से उड़ने के तुरंत बाद केमिकल इंजन जलाने के बजाय, पहले बिजली की ताकत से एक बहुत तेज रफ्तार हासिल करेगा। जब यह एक तय स्पीड पर पहुंच जाएगा, तब इसके अपने केमिकल इंजन चालू होंगे।
मिली जानकारी के अनुसार मार्च के आखिर में तिब्बत के पठार के पास जियायांग शहर में चीन ने इसके लिए एक हाई-टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग नेविगेशन सिस्टम का सफल परीक्षण भी किया है।
इस तकनीक का फायदा यह होगा कि रॉकेट को उड़ान के शुरुआती सबसे मुश्किल हिस्से में खुद का बहुत सारा ईंधन नहीं जलाना पड़ेगा। वह कम ईंधन के साथ अंतरिक्ष की यात्रा शुरू कर सकेगा।
भले ही यह आइडिया बहुत रोमांचक लगे, लेकिन इसके रास्ते में कई बड़ी तकनीकी बाधाएं हैं।
केमिकल इंजन पूरी तरह खत्म नहीं होंगे- इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ट्रैक सिर्फ रॉकेट को एक शुरुआती रफ्तार दे सकता है। इसके बाद भी अंतरिक्ष की कक्षा 7.8 किमी प्रति सेकंड तक पहुंचने के लिए रॉकेट को अपने केमिकल इंजनों की जरूरत पड़ेगी ही।
विशाल बुनियादी ढांचा- इसके लिए बहुत लंबा ट्रैक, विशाल ऊर्जा भंडारण केंद्र और अत्यधिक सटीक नियंत्रण प्रणाली चाहिए होगी।
भौगोलिक मुश्किलें- तिब्बत के पठार जैसे ऊंचे और पहाड़ी इलाके में इस तरह का ढांचा बनाना, वहां सामान पहुंचाना और रख-रखाव करना बेहद कठिन काम है।
अत्यधिक दबाव: इतनी तेज रफ्तार और छोटे ट्रैक पर भारी-भरकम रॉकेट को खींचने से उस पर और उसमें बैठे यात्रियों पर बहुत ज्यादा दबाव (Stress) पड़ेगा।
फिलहाल, कागजों से निकलकर पूरी तरह से काम करने वाला एक ऑर्बिटल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लॉन्च सिस्टम तैयार होने में लंबा वक्त है। निकट भविष्य में एलन मस्क की स्पेसएक्स के लिए असली चुनौती चीन के रियूजेबल रॉकेट, जैसे लॉन्ग मार्च 10B ही पेश कर रहे हैं, न कि यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक प्रोजेक्ट।
लेकिन लंबी अवधि के लिहाज से देखें, तो चीन का यह इलेक्ट्रिक लॉन्च प्रोजेक्ट एक बहुत बड़ा दांव है। यदि चीन इसे बड़े पैमाने पर कामयाब कर लेता है, तो भविष्य में रॉकेट कम ईंधन खर्च करके ज्यादा वजन अंतरिक्ष में ले जा सकेंगे, जो अंतरिक्ष यात्रा के इतिहास में एक नया मील का पत्थर साबित होगा।