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एक समय था जब नौकरी में प्रमोशन मिलना बड़ी उपलब्धि माना जाता था फिर चाहे लोगों को दिन भर काम ही क्यों न करना पड़े और लोग इसे खुशी से सेलिब्रेट करते थे. लेकिन आज के दौर में केवल काम ऑफिस तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि उसने अपनी पहुंच घरों तक बना ली है. इसकी वजह से न केवल वह चिड़चिड़े हो रहे हैं बल्कि उनकी मानसिक शांति पर भी असर दिखाई दे रहा है. अब कई कर्मचारी इसे अलग नजर से देखने लगे हैं. आज अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोग लीडरशिप रोल लेने से बच रहे हैं, अपनी महत्वाकांक्षाओं पर दोबारा सोच रहे हैं और यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या ऊंचा पद सच में इतनी मानसिक और निजी कीमत के लायक है?
स्टाफ की कमी, लगातार डिजिटल दबाव और सफलता को लेकर बदलती सोच के बीच अब करियर में ऊपर बढ़ने का पुराना आकर्षण धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है.
क्या कहते हैं रिपोर्ट?
गैलप की ‘स्टेट ऑफ द ग्लोबल वर्कप्लेस 2026 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में कर्मचारियों के बीच काम से असंतोष और थकान बढ़ता दिखा रहा है. 2025 में कर्मचारियों की सहभागिता घटकर सिर्फ 20% रह गई, जो 2020 के बाद सबसे कम स्तर है. रिपोर्ट के मुताबिक इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है. रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि अब प्रोफेशनल सफलता और व्यक्तिगत संतुष्टि के बीच दूरी बढ़ती जा रही है.
एक समय था जब प्रमोशन को तरक्की और सम्मान की निशानी माना जाता था, लेकिन अब कई कर्मचारी इसे ज्यादा काम, हर समय ऑनलाइन रहने के प्रेशर और बढ़ते तनाव से जोड़कर देखने लगे हैं. कई लोगों को अब करियर में आगे बढ़ना खुश नहीं करता है बल्कि थकाने वाला महसूस होता है.
हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि परेशानी सिर्फ प्रमोशन तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि बड़े लेवल पर पहुंच गई है. 2025 में हुए एक स्टडी में Employee Productivity on Promotion में पाया गया कि अगर प्रमोशन निष्पक्ष तरीके से और योग्यता के आधार पर दिए जाएं तो इससे कर्मचारियों की प्रेरणा, प्रोडक्टिविटी और नौकरी से संतुष्टि बढ़ सकती है.
लेकिन अध्ययन ने यह भी कहा कि पक्षपात, गलत रोल में प्रमोशन और बढ़ते दबाव जैसी चीजें कर्मचारियों का मनोबल तोड़ सकती हैं और पूरे कार्यस्थल की प्रोडक्टिविटी को प्रभावित कर सकती हैं.
कम हो रहा है प्रमोशन का क्रेज
कई दशकों तक प्रमोशन को करियर में सफलता, सम्मान और बेहतर कमाई की निशानी माना जाता था. लेकिन कोविड महामारी के बाद काम और निजी जिंदगी को लेकर लोगों की सोच काफी बदल गई. अब कर्मचारी सिर्फ ऊंचे पद नहीं बल्कि काम में फ्लेसिबिलिटी, स्वतंत्रता और मानसिक शांति को ज्यादा महत्व दे रहे हैं. कई लोगों को लगता है कि पद तो बेहतर हो जाता है, लेकिन जिंदगी का बैलेंस बिगड़ जाता है. इंस्टाहायर के सह-संस्थापक सरबोजित मल्लिक का कहना है कि आज करियर में सफलता का मतलब बदल चुका है. उनके मुताबिक, पहले जहां पद और सैलरी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी, वहीं अब कर्मचारी ऐसे काम की तलाश में हैं जिसमें संतुलन, आजादी और काम का अर्थ महसूस हो.
मल्लिक कहते हैं कि प्रमोशन मिलने की खुशी अक्सर कुछ समय की होती है, लेकिन उसके साथ आने वाला दबाव लंबे समय तक बना रहता है. उनका मानना है कि जो चीज कभी सफलता की पहचान लगती थी, अब कई लोगों को वह एक समझौते जैसी महसूस होने लगी है. इसी वजह से प्रमोशन का आकर्षण पहले जैसा नहीं रहा.
डिजिटल दौर बन रहा है कारण?
आज के समय में वर्कप्लेस पर अवेलेबल रहने का ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. खासकर अच्छे पोस्ट पर काम करने वाले लोगों से लगातार ऑनलाइन रहने, देर रात तक कॉल लेने, अनगिनत ईमेल संभालने और काम और पर्सनल जीवन के बीच कोई साफ सीमा न रखने की उम्मीद की जाती है. पहले प्रमोशन का मतलब ज्यादा आजादी और बेहतर स्थिति माना जाता था, लेकिन अब कई कर्मचारियों को लगता है कि इसके बदले सिर्फ जिम्मेदारियां बढ़ती हैं, जबकि जरूरी सपोर्ट उतना नहीं मिलता.
बिज़ स्टाफिंग कॉमरेड प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग पार्टनर पुनीत अरोड़ा का कहना है कि डिजिटल दौर में लीडरशिप की परिभाषा बदल गई है. उनके मुताबिक, पहले प्रमोशन का मतलब होता था बेहतर सैलरी, ज्यादा अधिकार और उपलब्धि का एहसास. लेकिन अब कई लोगों के लिए इसका मतलब सिर्फ बढ़ता काम, देर रात की कॉल और कम कंट्रोल रह गया है. वे बताते हैं कि आज स्थिति यह है कि पद तो बढ़ता है, लेकिन उसके साथ तनाव और बर्नआउट उससे कहीं तेजी से बढ़ जाते हैं. कई बार लोगों को नई जिम्मेदारी मिलती है, लेकिन उसके अनुरूप आजादी या सहयोग नहीं मिलता. इस बदलाव की वजह से करियर के फैसले भी तेजी से बदल रहे हैं. रिक्रूटर्स और HR प्रोफेशनल्स अब देख रहे हैं कि कई उम्मीदवार जानबूझकर प्रमोशन या लीडरशिप रोल लेने से इनकार कर रहे हैं, ताकि वे अपना समय और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित रख सकें.
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