भागलपुर, मुख्य संवाददाता। अब पशुओं का भी आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) विधि से गर्भाधान होगा। अब तक यह तकनीक महिलाओं में उपयोग होती रही है। सिर्फ मादा पशुओं के जन्म की गारंटी के साथ यह तकनीक सूबे में लागू किया जाएगा। बिहार में दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लिए राज्य सरकार नस्ल सुधार योजना चलाएगी। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में राज्य भर में इसे लागू करने की योजना बनाई गई है। योजना के मुताबिक पहले साल 1000 पशुओं में आईवीएफ से गर्भाधान कराने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 800 अंडाणु (ओवम) देश में उपलब्ध आईवीएफ प्रदाताओं से एवं अंडाणु 200 विदेशों से मंगाया जाएगा। राज्य सरकार ने 63.92 करोड़ रुपये सालभर में खर्च करने की योजना बनाई है। जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. अंजली कुमारी ने बताया कि 20वीं पशुगणना के आधार पर राज्य में 131.35 लाख प्रजनन योग्य गाय और भैंस जाति के पशु हैं। जिनमें 24.98 लाख प्रजनन योग्य संकर नस्ल के गायें शामिल हैं। जो राज्य के कुल प्रजनन योग्य पशुओं का कुल 19.10 प्रतिशत है। राज्य में 61.47 लाख प्रजनन योग्य देशी नस्ल के गायें हैं, जो कुल प्रजनन योग्य पशुओं का 46.79 प्रतिशत है। राज्य में 44.88 लाख प्रजनन योग्य भैंस जाति के पशु हैं, जो कुल प्रजनन योग्य पशुओं की संख्या का 34.16 प्रतिशत है。
13 लाख बच्चों में साढ़े छह लाख मादा पशु प्राप्त होने की संभावना
डॉ. अंजली ने बताया कि राज्य में पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन लि. पटना (कॉम्फेड) और बिहार पशुधन विकास अभिकरण पटना (बीएलडीए) के द्वारा पशुपालकों के द्वार तक उच्च गुणवत्ता पूर्ण सीमेन और कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान करने वाले प्रशिक्षित कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन की सहायता से नस्ल सुधार किया जा रहा है। इसके तहत विगत वर्ष 2024-25 में लगभग 45.59 लाख एवं वित्तीय वर्ष 2025-26 में 49 लाख कृत्रिम गर्भाधान गया है। इसमें लगभग 13 लाख वत्स (बच्चे) प्राप्त होंगे, जिसमें लगभग 6.50 लाख मादा पशु प्राप्त होने की सम्भावना है。
पीढ़ी अंतराल को कम करने और नस्ल सुधार की प्रभावी तकनीक है आईवीएफ
आईवीएफ के बारे में डॉ. अंजली ने बताया कि एक उन्नत पशु प्रजनन तकनीक है, जिसके माध्यम से उच्च अनुवांशिक गुणवत्ता वाले पशुओं का तीव्र विस्तार किया जा सकता है। बिहार जैसे कृषि एवं पशुपालन प्रधान राज्य में इस तकनीक की व्यापक संभावनायें हैं। इसमें उच्च गुणवत्ता वाले पशुओं से भ्रूण तैयार कर निम्न गुणवत्ता वाली मादा में प्रत्यारोपित कर वत्स प्राप्त किया जाता है, जिसके कारण उच्च गुणवत्ता वाले पशुओं की कई संतति कम समय में प्राप्त की जाती है। सामान्यतः कृत्रिम गर्भाधान के द्वारा लगभग सात पीढ़ी के बाद शुद्ध उच्च गुणवत्ता वाले पशु की प्राप्ति होती है, परन्तु आईवीएफ के माध्यम से पहली संतति से ही उच्च गुणवत्ता वाले पशु की प्राप्ति होती है। आईवीएफ पीढ़ी अन्तराल को कम करने एवं त्वरित नस्ल सुधार के लिए यह एक प्रभावी तकनीक है。
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