अभिषेक बनर्जी यानी तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद दूसरे माने जाने वाले नेता थे। 4 मई को नतीजे आने के बाद जनता से लेकर अपनी ही पार्टियों के साथियों की नाराजगी का सबसे ज्यादा सामना उन्हें ही करना पड़ रहा है। नौबत यहां तक आ गई है कि बगावत करने वाले 58 विधायकों ने उन्हें अपने गुट में किसी तरह शामिल करने से भी इनकार कर दिया है। अब इसके पीछे की वजह समझते हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद एक टीएमसी विधायक ने जमकर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। डेक्कन क्रॉनिकल के अनुसार, उन्होंने कहा था कि ‘ताकत का अंहकार’ और ‘जमकर भाई भतीजावाद’ ने पार्टी को ‘तबाह’ कर दिया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाए थे कि आई पैक के साथ मिलकर अभिषेक ने पार्टी कार्यकर्ताओं को हाशिए पर पहुंचा दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, टीएमसी के कई नेताओं का मानना है कि ममता बनर्जी का आंख मूंदकर भतीजे से लगाव ने पार्टी में आंतरिक दरार को बढ़ाया है। वेबसाइट से बातचीत में टीएमसी नेता मुकुल रॉय के पार्टी छोड़ने का जिक्र करते हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में अभिषेक बनर्जी का तेजी से बढ़ना और मुकुल रॉय का साइडलाइन होना एक साथ हुआ। इसके चलते पार्टी के पुराने नेताओं के बीच नाराजगी ने जगह ले ली थी।
अब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाते थे। टीएमसी एक नेता ने कहा कि अधिकारी तब तृणमूल यूथ कांग्रेस के प्रमुख थे और उनका प्रभाव मालदा, मुर्शिदाबाद समेत कई क्षेत्रों में था। उन्होंने दावा किया कि तनाव तब बढ़ गया जब अभिषेक ने पार्टी के अंदर ही एक यूथ ब्रिगेड खड़ी कर दी। इसका अधिकारी पर गहरा असर हुआ था। जब ममता बनर्जी के सामने मुद्दा पहुंचा, तो उन्होंने अधिकारी को हटाकर अभिषेक को यूथ विंग का प्रमुख बना दिया।
टीएमसी का गढ़ मानी जाने वाली फलता सीट पार्टी को शर्मनाक हार के साथ गंवानी पड़ी। यह क्षेत्र अभिषेक बनर्जी के संसदीय क्षेत्र में आता है। साथ ही यहां से टीएमसी के बाहुबली नेता कहे जाने वाले जहांगीर खान को अभिषेक का करीबी माना जाता है। दरअसल, जब चुनाव हुए तो मतदान से महज एक दिन पहले ही जहांगीर ने नाम वापस ले लिया। नतीजा यह हुआ कि सीट भाजपा के खाते में गई।
टीएमसी ने इसे जहांगीर का निजी फैसला करार दिया था। नाराजगी इस बात पर भी है कि चुनावी मैदान से नाम वापस लेने के बाद भी जहांगीर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
पीटीआई भाषा के अनुसार, बागी खेमे से जुड़े एक नेता ने कहा, ‘हम ममता बनर्जी को अपना नेता स्वीकार करते हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को स्वीकार नहीं करते।’ गौर करने वाली बात यह है कि बागियों ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी की सर्वोच्चता को चुनौती नहीं दी। विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गए अपने पत्र में उन्होंने ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में मान्यता देना जारी रखा, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे विधायक दल के कामकाज में उनके भतीजे अभिषेक के अधिकार को अब और स्वीकार नहीं करेंगे।
कृपया अपने अनुभव को रेट करें
निसर्ग दीक्षित न्यूजरूम में करीब एक दशक का अनुभव लिए निसर्ग दीक्षित शोर से ज़्यादा सार पर भरोसा करते हैं। पिछले 4 साल से वह लाइव हिनुस्तान में डिप्टी चीफ प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं, जहां खबरों की योजना, लेखन, सत्यापन और प्रस्तुति की जिम्मेदारी संभालते हैं। इससे पहले दैनिक भास्कर और न्यूज़18 जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं, जहाँ उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क तक की भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की, जिसने उनके काम करने के तरीके को व्यावहारिक और तथ्य आधारित बनाया। निसर्ग की खास रुचि खोजी रिपोर्टिंग, ब्रेकिंग स्टोरीज़ और विज़ुअल न्यूज़ स्टोरीज़ में है। वे जटिल मुद्दों को सरल भाषा और स्पष्ट तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते हैं। राजनीति और जांच पड़ताल से जुड़े विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ है। निसर्ग लोकसभा चुनावों, कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अहम घटनाओं को कवर कर चुके हैं। साथ ही संसदीय कार्यवाही और सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण सुनवाइयों को नियमित रूप से कवर करते हैं। गूगल जर्नलिस्ट्स स्टूडियो में भी निसर्ग योगदान देते हैं।
आरएसएसविज्ञापन र॓टहमार॓ साथ काम करेंहमारे बारे मेंसंपर्क करेंगोपनीयतासाइट जानकारी
Advertise with usAbout usCareers Privacy Contact usSitemapCode Of Ethics
Partner sites: Hindustan TimesMintHT TechShineHT TeluguHT BanglaHT TamilHT MarathiHT AutoHealthshotsHT SmartcastFAB Play