Published By: Tanuja Joshi | Updated: Jul 21, 2026, 8:07 AM
भारत ने संकेत दिया है कि 1960 में बनी सिंधु जल संधि अब मौजूदा स्वरूप में आगे नहीं चल सकती. सरकार का मानना है कि पिछले कई वर्षों में हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. सीमा पार आतंकवाद, सुरक्षा चुनौतियां और लगातार बढ़ते विवादों ने इस समझौते की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. भारत का कहना है कि अगर भविष्य में किसी नई व्यवस्था पर बातचीत होती भी है तो वह पुराने नियमों के आधार पर नहीं होगी. नई परिस्थितियों के अनुसार संधि में बदलाव जरूरी होगा ताकि भारत के राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा चिंताओं का बेहतर तरीके से ध्यान रखा जा सके.
भारत ने पहली बार इतनी स्पष्टता से कहा है कि पानी और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते. सरकार का मानना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवादी गतिविधियों को पूरी तरह रोकने के लिए ठोस और स्थायी कदम नहीं उठाता, तब तक किसी भी जल समझौते को दोबारा लागू करने का सवाल ही नहीं उठता. भारत का कहना है कि केवल बयान देना काफी नहीं होगा, बल्कि जमीन पर बदलाव भी दिखाई देना चाहिए. यही वजह है कि भविष्य की किसी भी बातचीत को पाकिस्तान की कार्रवाई से जोड़कर देखा जा रहा है.
सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में हुई थी. इसका मकसद दोनों देशों के बीच बहने वाली प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल के नियम तय करना था. इस समझौते के तहत पूर्वी नदियों का अधिक अधिकार भारत को और पश्चिमी नदियों का इस्तेमाल पाकिस्तान को मिला. कई दशकों तक ये संधि दोनों देशों के बीच सबसे स्थिर समझौतों में गिनी जाती रही. हालांकि, समय के साथ कई परियोजनाओं और तकनीकी मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद लगातार बढ़ते गए.
भारत का आरोप रहा है कि पाकिस्तान ने कई बार संधि के प्रावधानों का इस्तेमाल सहयोग की बजाय विकास परियोजनाओं में देरी कराने के लिए किया. भारत की कई जलविद्युत परियोजनाओं पर लगातार आपत्तियां उठाई गईं, जिससे निर्माण कार्य प्रभावित हुआ. भारत का कहना है कि तकनीकी विवादों को जरूरत से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मंचों तक ले जाया गया और विवाद समाधान की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया गया. इससे दोनों देशों के बीच भरोसा भी कमजोर हुआ.
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और खेती काफी हद तक सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है. इसलिए वहां यह आशंका जताई जाती रही है कि अगर जल प्रवाह प्रभावित हुआ तो कृषि, पेयजल और बिजली उत्पादन पर असर पड़ सकता है. हालांकि, भारत का कहना है कि पाकिस्तान की कई जल समस्याओं की वजह उसकी अपनी जल भंडारण क्षमता की कमी, पाइपलाइन लीकेज और आंतरिक जल प्रबंधन की चुनौतियां भी हैं. भारत का मानना है कि हर समस्या के लिए संधि को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है.
भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ कई कूटनीतिक और आर्थिक कदम उठाए. इन्हीं फैसलों के बीच सिंधु जल संधि को भी स्थगित रखने का फैसला लिया गया. सरकार का मानना है कि जब तक आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान का रवैया नहीं बदलता, तब तक सामान्य संबंध बहाल करना मुश्किल होगा. इस फैसले को भारत की व्यापक सुरक्षा नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ सख्त संदेश देना प्रमुख मकसद है.
फिलहाल भारत ने यह संकेत नहीं दिया है कि वह तुरंत संधि से पूरी तरह बाहर निकलने जा रहा है, लेकिन सरकार ने यह जरूर कहा है कि एक संप्रभु देश होने के नाते उसे अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेने का अधिकार है. भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार भारत अलग रणनीति अपना सकता है. फिलहाल जोर इस बात पर है कि यदि कोई नई व्यवस्था बने तो वह वर्तमान सुरक्षा और भू-राजनीतिक हालात के अनुरूप हो.
आने वाले समय में सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी. अगर पाकिस्तान आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई करता है तो भविष्य में बातचीत की संभावना बन सकती है, लेकिन अगर मौजूदा हालात बने रहते हैं तो दोनों देशों के बीच जल विवाद और कूटनीतिक तनाव आगे भी जारी रह सकता है. ये मामला केवल पानी का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, विश्वास और दोनों देशों के भविष्य के संबंधों से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है.
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