वाराणसी, प्रमुख संवाददाता। बीएचयू के संस्कृत विभाग और आनंद मार्ग प्रचारक संघ की बौद्धिक शाखा ‘रिनैसां यूनिवर्सल’ की तरफ से गुरुवार को राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। इसका विषय ‘आनंद सूत्रम् के तुलनात्मक अध्ययन के आलोक में भारतीय ज्ञान परंपरा में आनंदमूर्ति का योगदान’ था। रिनैसां यूनिवर्सल के केंद्रीय सचिव आचार्य दिव्यचेतनानंद अवधूत ने कहा कि आनंद मार्ग का दर्शन अद्वैतवाद, द्वैतवाद और पुनः अद्वैतवाद का एकीकृत दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। उन्होंने अन्य भारतीय दर्शन प्रणालियों की तुलना में ‘आनंद सूत्रम्’ की दार्शनिक अवधारणाओं को रेखांकित किया। आनंद सूत्रम् के प्रथम सूत्र ‘शिवशक्त्यात्मकं ब्रह्म’ की व्याख्या अग्नि, दूध और कागज के टुकड़ों के उदाहरणों से की। इसके बाद मन की अवधारणा को स्पष्ट किया।
मुख्य वक्ता जेएनयू नई दिल्ली के संस्कृत एवं प्राच्य विद्या अध्ययन संस्थान के प्रो. रामनाथ झा ने कहा कि यद्यपि आनंदमूर्ति कई भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे, फिर भी अपने दर्शन को प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने संस्कृत को चुना, जो एक भाषा के रूप में संस्कृत के महत्व को दर्शाता है।
इलाहाबाद विवि के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल प्रताप गिरि कहा कि मानव जीवन के अंतिम लक्ष्य के रूप में ‘आनंद’ की प्राप्ति के साथ, आनंद सूत्रम् आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतन का एक गहन ढांचा प्रस्तुत करता है। सामाजिक-आर्थिक विश्लेषक राजेश सिंह ने पीआर सरकार के ‘प्रगतिशील उपयोग तत्व’ पर प्रकाश डाला। इलाहाबाद विवि के दर्शनशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. ऋषिकांत पांडेय ने आनंदमूर्ति के बहुआयामी योगदान पर चर्चा की। उद्घाटन सत्र का संचालन प्रो. शर्दिंदु कुमार तिवारी ने किया। उन्होंने आनंदमूर्ति के मानव कल्याण में योगदान को रेखांकित किया। संस्कृत विभागध्यक्ष प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय स्थापना की।
संगोष्ठी के तीन सत्रों की अध्यक्षता कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल, प्रो. कमलेश झा और डॉ. हरिसिंह गौर विवि में दर्शनशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा ने की। प्रमुख वक्ताओं में प्रो. आनंद मिश्रा, डॉ. सिद्धिदात्री भारद्वाज, डॉ. अभिमन्यु, डॉ. सूर्यकांत त्रिपाठी, डॉ. प्रवीण कुमार द्विवेदी, डॉ. राजेश सरकार, डॉ. ठाकुर शिवलोचन शांडिल्य, डॉ. फिरोज, डॉ. नीरज पांडे आदि थे।
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