तीन साल से पति के लौटने के इंतजार में उसकी आंखें पथरा गई हैं, लेकिन उसने उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है। उका पति सीआरपीएफ कांस्टेबल बादल मुर्मू 2023 से लापता हैं। माना जाता है कि प्रतिबंधित संगठन के पोलित ब्यूरो के अंतिम सक्रिय सदस्य मिसिर बेसरा के नेतृत्व वाले माओवादियों ने उन्हें बंदी बना लिया है।
गुरुवार को 27 माओवादियों के सरेंडर के बाद भी जब बादल का कुछ पता नहीं चला तो उनकी पत्नी झानो मुर्मू ने कहा कि उम्मीद की किरणें धुंधली होती जा रही हैं। झानो कहती हैं कि लगभग तीन सालों से हर बार सरेंडर के बाद उन्हें उम्मीद होती थी कि अधिकारी उनके पति के बारे में कोई अच्छी खबर लेकर आएंगे। उन्होंने पति के लौटने की उम्मीद अभी छोड़ी नहीं है। उन्होंने राष्ट्रपति को कई चिट्ठियां लिखी हैं और 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री से खुद मिलकर बात भी की है। लेकिन, उनके पति का पता लगाने की कोशिशों में कोई प्रगति नहीं हुई है।
झारखंड पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि अगर बादल मुर्मू अभी भी जिंदा हैं तो उनका पता लगाने की कोशिशें जारी रहेंगी। 197वीं बटालियन के सीआरपीएफ कांस्टेबल बादल मुर्मू मूलरूप से सरायकेला-खरसावां जिले के रहने वाले हैं। वह किरीबुरु बेस कैंप में तैनात थे। एक सरकारी काम के दौरान वह चाईबासा के सारंडा जंगल से लापता हो गए। लापता होने के समय उनकी उम्र 34 साल थी। वह मकर संक्रांति के मौके पर एक महीने की छुट्टी पर जाने की तैयारी कर रहे थे।
5 जनवरी 2023 की शाम को उन्होंने अपनी पत्नी से बात की और उन्हें बताया कि एक छोटा-सा सरकारी काम पूरा करने के बाद वे लौट आएंगे। वह कहती हैं कि उन्होंने सुबह मुझे बताया था कि उन्हें सरंडा जंगल के तुम्बाहाका इलाके में जाना है। वहां कोई कैंप या टावर बनाने से पहले जरूरी जांच-पड़ताल करनी थी। अगले दिन सुबह करीब 10 बजे जब झानो ने उन्हें फोन किया तो उनका फोन बंद था। पूरे दिन बार-बार उनसे संपर्क करने की कोशिश करने के बाद वह परेशान हो गईं। वह बताती हैं कि 7 जनवरी को दो जवान आए और उन्होंने हमसे बादल के बारे में पूछा। इससे यह पक्का हो गया कि वह लापता हैं। बाद में तुम्बाहाका के स्थानीय लोगों ने परिवार को बताया कि उन्होंने बादल को मिसिर बेसरा के साथियों द्वारा बंधक बनाकर ले जाते हुए देखा था।
संताल समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बादल एक अच्छे एथलीट थे, जिनका सपना भारतीय सेना में शामिल होना था। बादल के बड़े भाई और बीएसएफ कांस्टेबल 40 साल के मंगोविंद मुर्मू कहते हैं कि अपनी देशभक्ति की भावना के चलते उन्हें हमेशा से ही सेना में शामिल होने का शौक था। मंगोविंद ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि उनके पिता एक किसान थे। 2024 में अपने बेटे के लौटने का इंतजार करते हुए अपनी बिगड़ती सेहत के कारण गुजर गए। वह बताते हैं कि उन्होंने और उनके भाई, दोनों ने ही खूब मेहनत से पढ़ाई की और सेना में शामिल हुए।
कई बार ट्रांसफर होने के बाद 2018 में चाईबासा लौटने पर बादल ने झानो से शादी कर ली। 2010 में सीआरपीएफ में शामिल होने के बाद उनकी पोस्टिंग पहले श्रीनगर में हुई, फिर मणिपुर में और बाद में छत्तीसगढ़ के बस्तर डिवीजन में। वहां 2017 में माओवादियों के खिलाफ चलाए गए एक ऑपरेशन के दौरान आईईडी धमाके में उनके एक पैर में चोट लग गई थी। 2021 में छत्तीसगढ़ में बीजापुर-सुकमा सीमा के पास पिडिया और गोट्टापल्ली के जंगली इलाकों में माओवादियों के खिलाफ चलाए गए एक ऑपरेशन में हिस्सा लेने के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा ‘वीरता पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। बादल के भाई का कहना है कि पिछले तीन सालों से उनका परिवार बादल का पता लगाने की कोशिश में दर-दर भटक रहा है।
मंगोविंद बताते हैं कि कुछ गांव वालों ने परिवार को बताया है कि उन्होंने कभी-कभी बादल को बेसरा के दस्ते के साथ देखा है। पांच दिन पहले उसे बेसरा के दस्ते के साथ एक सादी टी-शर्ट और चप्पल पहने देखा गया था। हमें बताया गया कि वह जिंदा है। भाई का मानना है कि माओवादी उसे अपने जैसा बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन शायद उन्हें उस पर इतना भरोसा नहीं है कि उसे हथियार दे सकें। हमने सुना है कि वे उसे वामपंथी आंदोलनों से जुड़ा साहित्य पढ़वाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें इस बात की चिंता है कि अगर वह दोबारा फोर्स में शामिल हो गया तो वह पुलिस को बेसरा को पकड़ने में मदद कर सकता है।
बादल की पत्नी अपने छह साल के बेटे के साथ सरायकेला-खरसावां जिले के उपरशिला गांव में बेहद तंगी में गुजारा कर रही है। उसने न सिर्फ़ सरकार से अपने पति को बचाने की गुहार लगाई है, बल्कि मिसिर बेसरा से भी अपील की है कि वह सरेंडर कर दे और उसके पति को रिहा कर दे।
वह कहती है कि मैं बेसरा से गुजारिश करती हूं कि वह सरेंडर कर दे और अपने परिवार के साथ शांति से जिंदगी बिताए। मैं नहीं चाहती कि मेरा पति गोलीबारी में मारा जाए। अगर बेसरा इस शर्त पर उसे रिहा करता है कि वह सुरक्षाबल छोड़ दे तो मैं अपने पति से कहूंगी कि वह फ़ोर्स छोड़ दे। मैं बस उनके साथ रहना चाहती हूं और खेती-बाड़ी करके गुजारा करना चाहती हूं।
वह कहती हैं कि हम पूरी तरह थक चुके हैं और हमें ऐसा महसूस हो रहा है कि हमें अकेला छोड़ दिया गया है। हमें अपना मानने से इनकार कर दिया गया है, क्योंकि हम आदिवासी हैं। अगर किसी अफसर या नेता का कोई परिजन माओवादियों के चंगुल में फंस गया होता तो क्या होता?
सुबोध कुमार मिश्रा पिछले 19 साल से हिंदी पत्रकारिता में योगदान दे रहे हैं। वर्तमान में वह ‘लाइव हिन्दुस्तान’ में स्टेट डेस्क पर बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। दूरदर्शन के ‘डीडी न्यूज’ से इंटर्नशिप करने वाले सुबोध ने पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत 2007 में दैनिक जागरण अखबार से की। दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में बतौर ट्रेनी प्रवेश किया और सब एडिटर तक का पांच साल का सफर पूरा किया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर को बहुत ही करीब से देखने और समझने का मौका मिला। दैनिक जागरण से आगे के सफर में कई अखबारों में काम किया। इनमें दिल्ली-एनसीआर से प्रकाशित होने वाली नेशनल दुनिया, नवोदय टाइम्स (पंजाब केसरी ग्रुप), अमर उजाला और हिन्दुस्तान जैसे हिंदी अखबार शामिल हैं। अखबारों के इस लंबे सफर में खबरों को पेश करने के तरीकों से पड़ने वाले प्रभावों को काफी बारीकी से समझने का मौका मिला।
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शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो सुबोध ने बीएससी (ऑनर्स) तक की अकादमिक शिक्षा हासिल की है। साइंस स्ट्रीम से पढ़ने के कारण उनके पास चीजों को मिथ्यों से परे वैज्ञानिक तरीके से देखने की समझ है। समाज से जुड़ी खबरों को वैज्ञानिक कसौटियों पर जांचने-परखने की क्षमता है। उन्होंने मास कम्यूनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। इससे उन्हें खबरों के महत्व, खबरों के एथिक्स, खबरों की विश्वसनीयता और पठनीयता आदि को और करीब से सीखने और लिखने की कला में निखार आया। सुबोध का मानना है कि खबरें हमेशा प्रमाणिकता की कसौटी पर कसा होना चाहिए। सुनी सुनाई और कल्पना पर आधारित खबरें काफी घातक साबित हो सकती हैं, इसलिए खबरें तथ्यात्मक रूप से सही होनी चाहिए। खबरों के चयन में क्रॉस चेकिंग को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानने वाले सुबोध का काम न सिर्फ पाठकों को केवल सूचना देने भर का है बल्कि उन्हें सही, सुरक्षित और ठोस जानकारी उपलब्ध कराना भी है।
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