KNEWS DESK- मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को उत्पन्ना एकादशी के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है और इसे एकादशी देवी की उत्पत्ति का दिन भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के पालन से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
सनातन परंपरा के अनुसार, व्रत और त्योहार उदया तिथि के आधार पर मनाए जाते हैं। इसलिए इस वर्ष उत्पन्ना एकादशी का व्रत 15 नवंबर, शनिवार को रखा जाएगा।
1. व्रत का संकल्प:
एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु के समक्ष दीप जलाकर व्रत का संकल्प लें कि आप पूरे दिन उपवास रखेंगे और प्रभु का ध्यान करेंगे।
2. पूजन विधि:
भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को साफ स्थान पर स्थापित करें। चंदन, रोली, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें।
3. भोग अर्पण:
भगवान को तुलसी दल के साथ फल या मिठाई का भोग लगाएं। इस दिन चावल, अनाज और लहसुन-प्याज युक्त भोजन का सेवन वर्जित माना गया है।
4. पाठ और मंत्र जाप:
विष्णु सहस्रनाम, एकादशी व्रत कथा या श्रीमद्भगवद् गीता का पाठ करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
5. रात्रि जागरण:
संभव हो तो रात्रि में भजन-कीर्तन करें और भगवान विष्णु की महिमा का गुणगान करें।
6. पारण (व्रत खोलना):
द्वादशी तिथि (16 नवंबर) के दिन सूर्योदय के बाद शुभ मुहूर्त में व्रत खोलें। पारण से पहले किसी गरीब या ब्राह्मण को भोजन करवाना और दान देना अत्यंत शुभ माना गया है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, दैत्य मुर के संहार के लिए भगवान विष्णु की आज्ञा से देवी उत्पन्ना का जन्म इसी दिन हुआ था। इसलिए इस व्रत को “उत्पन्ना एकादशी” कहा गया। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन व्रत और उपासना करने से— मनुष्य के सभी पाप नष्ट होते हैं, जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
यह एकादशी कार्तिक मास की सबसे पुण्यदायी एकादशियों में से एक मानी जाती है। जो भक्त सच्चे मन से इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें भगवान विष्णु का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनका जीवन धर्म, भक्ति और सद्गुणों से परिपूर्ण हो जाता है।
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