एक के बाद एक बनेंगे नौसेना के जहाज, HSL का मेगा प्लान, पूर्वी एशिया के शिपयार्ड को मिलेगी टक्कर? – Bharat24live

Shashikesh Ranjan
Date: 28-10-26 21:18
मुंबई में आयोजित INMARCO 2026 में हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक, रियर एडमिरल सी. रघुराम, VSM (सेवानिवृत्त) ने कहा कि भारतीय शिपयार्ड पूर्वी एशिया के प्रतिस्पर्धियों के साथ लागत के अंतर को कम करने के लिए एक-एक जहाज बनाने के बजाय एक ही डिजाइन के जहाजों का लगातार निर्माण करने की रणनीति अपनाएं.
रघुराम ने इंस्टीट्यूट ऑफ मरीन इंजीनियर्स (इंडिया) की ओर से आयोजित ‘शिपयार्ड्स एंड न्यूबिल्ड्स: मैरीटाइम लैंडस्केप 2030’ पैनल चर्चा में कहा, “पहला जहाज एक प्रोटोटाइप होता है. पांचवां जहाज एक उत्पाद होता है.”
शिपयार्ड्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अनुमान के मुताबिक, भारतीय और पूर्वी एशियाई शिपयार्ड के बीच लागत का अंतर करीब 24 प्रतिशत है. रघुराम ने कहा, “प्रोत्साहन इस अंतर को कम कर सकते हैं, लेकिन इसे खत्म केवल श्रृंखलाबद्ध निर्माण ही कर सकता है.” उन्होंने इस बदलाव को अलग-अलग जहाज बनाने की प्रक्रिया से आगे बढ़कर एक व्यवस्थित उत्पादन प्रणाली विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया.
पांच जहाज, एक डिजाइन
HSL इस रणनीति को विशाखापत्तनम स्थित अपने शिपयार्ड में लागू कर रहा है, जहां भारतीय नौसेना के लिए पांच फ्लीट सपोर्ट जहाज बनाए जा रहे हैं. न्यूज ऑन AIR और नेवल न्यूज के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने अगस्त 2023 में करीब 19,000 करोड़ रुपये की लागत से इन जहाजों के निर्माण का ऑर्डर दिया था. HSL के मुताबिक, प्रत्येक जहाज का वजन 43,500 टन, लंबाई 222.8 मीटर और चौड़ाई 31.5 मीटर है. इन जहाजों का मुख्य काम समुद्र में तैनात युद्धपोतों तक ईंधन, पानी, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सामान पहुंचाना है.
6 अक्टूबर को HSL ने इस श्रेणी के पहले जहाज ‘सूर्या’ को लॉन्च किया. इसी दिन पांचवें जहाज की कील भी रखी गई, जिसके साथ उसके निर्माण की औपचारिक शुरुआत हुई. यानी श्रृंखला का पहला जहाज समुद्र में उतारा गया, जबकि उसी दिन पांचवें जहाज का निर्माण शुरू कर दिया गया. इस समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए. HSL इस परियोजना में निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ भी काम कर रहा है. HSL के साथ हुए अनुबंध के तहत L&T की शिपबिल्डिंग इकाई पांच में से दो जहाजों के लिए विभिन्न घटकों का निर्माण कर रही है.
क्रेन और स्लिपवे से बढ़ेगी निर्माण क्षमता
6 अक्टूबर को आयोजित समारोह में HSL के विस्तारित स्लिपवे-4 का भी उद्घाटन किया गया. इस स्लिपवे पर 300 टन क्षमता वाली विशाल गैन्ट्री क्रेन लगाई गई है, जिसे L&T जियोस्ट्रक्चर ने डिजाइन और निर्मित किया है. नेवल न्यूज के मुताबिक, इस नई सुविधा से शिपयार्ड की बड़ी जहाजों के निर्माण की क्षमता को मजबूती मिलेगी.
आधुनिक शिपयार्ड में जहाजों का निर्माण बड़े-बड़े, पहले से तैयार किए गए हिस्सों से किया जाता है. इन हिस्सों को ‘ब्लॉक’ कहा जाता है. बाद में इन्हें स्लिपवे पर एक साथ जोड़कर पूरा जहाज तैयार किया जाता है. नई क्रेन की मदद से भारी ब्लॉकों को उठाना और उन्हें सही जगह पर स्थापित करना आसान होगा.
नेवल न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, यह व्यवस्था HSL को बड़े जहाजों के निर्माण में मदद करेगी. HSL का कहना है कि उसका विस्तारित स्लिपवे 45,000 टन तक डेडवेट वाले जहाजों को संभाल सकता है. डेडवेट टन भार जहाज की कुल वहन क्षमता को दर्शाता है, जिसमें कार्गो, ईंधन, पानी और अन्य जरूरी सामान शामिल होते हैं.
रघुराम ने कहा कि इस स्तर की सुविधाओं वाला शिपयार्ड अपनी क्षमता पहले ही साबित कर चुका है. उन्होंने कहा, “जो शिपयार्ड किसी 43,000 टन के जहाज को स्टील से पानी तक पहुंचने में 18 महीने का समय लेता है, वह अब केवल यह साबित नहीं कर रहा कि वह जहाज बना सकता है. अब उससे यह पूछा जा रहा है कि क्या वह बार-बार, समय पर और प्रतिस्पर्धी लागत पर जहाज बना सकता है.”
उद्योग के लिए लगातार ऑर्डर मिलना जरूरी
रघुराम ने जोर दिया कि श्रृंखलाबद्ध निर्माण तभी सफल हो सकता है, जब शिपयार्ड को लगातार और नियमित रूप से ऑर्डर मिलते रहें. उन्होंने घरेलू जहाज निर्माण क्षेत्र को मजबूत करने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए हालिया कदमों का स्वागत किया.
इन पहलों में अगले 10 वर्षों में करीब 437 जहाजों की अनुमानित मांग, 69,725 करोड़ रुपये का पैकेज और 25,000 करोड़ रुपये का मैरीटाइम डेवलपमेंट फंड शामिल हैं. सरकार ने भारतीय निर्मित जहाजों को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा भी दिया है. इसके अलावा, देश में जहाज निर्माण की सालाना क्षमता को बढ़ाकर 45 लाख ग्रॉस टन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. रघुराम के अनुसार, ऑर्डर की स्थिर और नियमित उपलब्धता से शिपयार्ड को उत्पादन की बेहतर योजना बनाने, बुनियादी ढांचे में निवेश करने और कामकाज की दक्षता बढ़ाने में मदद मिलेगी.
उन्होंने शिपयार्ड के साथ जहाजों की डिलीवरी के स्पष्ट कार्यक्रम साझा करने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि कंपनियां पहले से संसाधनों और उत्पादन गतिविधियों की योजना बना सकें. उन्होंने उपकरण निर्माताओं और वित्तीय संस्थानों से लंबी अवधि के वित्तपोषण और स्थानीय स्तर पर बेहतर सेवा सहायता उपलब्ध कराने की भी अपील की. उनका मानना है कि ऐसे कदम भारतीय शिपयार्ड को अधिक व्यवस्थित उत्पादन मॉडल अपनाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में मदद कर सकते हैं.
भारतीय शिपयार्ड के लिए तीन अहम कसौटियां
रघुराम ने बताया कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 6 अक्टूबर को HSL के दौरे के दौरान भारतीय शिपयार्ड के लिए तीन प्रमुख कसौटियां रखी थीं. रघुराम ने इन्हें राष्ट्र के प्रति भारतीय शिपयार्ड की जिम्मेदारियां बताया. इनमें अपनी डिजाइन क्षमता विकसित करना, जहाजों की समय पर डिलीवरी सुनिश्चित करना और उत्पादकता को मापने योग्य बनाना शामिल है. ये प्राथमिकताएं घरेलू डिजाइन क्षमताओं को मजबूत करने, परियोजनाओं को बेहतर ढंग से पूरा करने और जहाज निर्माण उद्योग में प्रदर्शन के स्पष्ट मानक स्थापित करने की जरूरत को दर्शाती हैं.
रघुराम ने उद्योग के भविष्य के लिए दो अन्य बदलावों की भी बात की. पहला, भारत को जहाज निर्माण से जुड़े तकनीकी मानक तय करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. इसकी शुरुआत ग्रीन टगबोट यानी पर्यावरण के अनुकूल टगबोट के निर्माण से की जा सकती है. दूसरा, भारत में निर्मित प्रत्येक जहाज को शिपयार्ड से निकलते समय एक ‘डिजिटल बर्थ सर्टिफिकेट’ मिलना चाहिए. यह जहाज के 30 साल के परिचालन जीवन का एकीकृत डिजिटल रिकॉर्ड होगा.
इस डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए जहाज के पूरे जीवनकाल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी सुरक्षित रखी जा सकेगी. इससे दस्तावेजों के बेहतर प्रबंधन और जहाज के रखरखाव व परिचालन की निगरानी में मदद मिल सकती है.
जहाज निर्माण क्षेत्र से पैदा हो सकती हैं करीब 30 लाख नौकरियां
रघुराम ने जहाज निर्माण उद्योग की रोजगार पैदा करने की क्षमता पर भी जोर दिया. उनके अनुसार, इस क्षेत्र में पैदा होने वाली हर एक प्रत्यक्ष नौकरी से संबंधित उद्योगों और सेवाओं में लगभग छह अतिरिक्त नौकरियां पैदा होती हैं.
उन्होंने कहा कि सरकार के सहायता पैकेज से करीब 30 लाख नौकरियां पैदा हो सकती हैं. इससे औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन में जहाज निर्माण क्षेत्र की संभावित भूमिका का पता चलता है. एक मजबूत जहाज निर्माण व्यवस्था से मैन्युफैक्चरिंग, इंजीनियरिंग, उपकरण आपूर्ति, लॉजिस्टिक्स, रखरखाव और अन्य सहायक क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं.
रघुराम ने अपने विचार रखते हुए एक जहाज को लॉन्च करने और लगातार बड़ी संख्या में जहाजों का निर्माण करने के बीच का अंतर स्पष्ट किया. उन्होंने कहा, “एक जहाज लॉन्च करना समारोह है. पांचवें जहाज की समय पर डिलीवरी करना एक उद्योग है. और साल-दर-साल सौवां जहाज देना किसी राष्ट्र की जहाज निर्माण क्षमता है.”
2027 के मध्य में नौसेना में शामिल हो सकता है ‘सूर्या’
इस श्रृंखला का पहला फ्लीट सपोर्ट जहाज ‘सूर्या’ 2027 के मध्य तक भारतीय नौसेना में शामिल होने के लिए निर्धारित है. इसके बाद बाकी चार जहाजों को भी विशाखापत्तनम स्थित HSL शिपयार्ड से नौसेना को सौंपे जाने की उम्मीद है. यह परियोजना भारत की उस क्षमता की महत्वपूर्ण परीक्षा है, जिसके तहत देश को अलग-अलग जहाज निर्माण की उपलब्धियों से आगे बढ़कर लगातार और व्यवस्थित तरीके से जहाज बनाने की व्यवस्था विकसित करनी है.
HSL के सामने चुनौती यह होगी कि वह सभी पांच जहाजों की डिलीवरी निर्धारित समय पर करे, साथ ही गुणवत्ता बनाए रखे, लागत नियंत्रित करे और उत्पादकता बढ़ाए. इस परियोजना से मिले अनुभव दूसरे भारतीय शिपयार्ड के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं, जो पूर्वी एशिया के स्थापित जहाज निर्माण केंद्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करना चाहते हैं.
व्यापक स्तर पर भारत का उद्देश्य जहाज निर्माण को एक टिकाऊ औद्योगिक क्षमता में बदलना है, जहां नियमित ऑर्डर, आधुनिक बुनियादी ढांचे और मजबूत घरेलू विनिर्माण व्यवस्था की मदद से हर अगला जहाज पहले से अधिक कुशलता और कम लागत में तैयार किया जा सके.
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