एक जंग और दो युद्धविराम : क्या ईरान ने 'बढ़त' हासिल कर ली है – BBC

इमेज स्रोत, Reuters
मध्य पूर्व में एक नहीं, बल्कि दो युद्धविराम चल रहे हैं. तो क्या अब ये मान लेना चाहिए कि एक साथ दो ऐतिहासिक सफ़लताओं के लिए मंच तैयार है.
ईरान और लेबनान में लागू दोनों युद्धविराम 'नाज़ुक' बताए जा रहे हैं, जैसा आम तौर पर होता है.
लेकिन जंग का शोर कम होने के बीच अवसर के साथ जोख़िम भी दिखने लगा है.
पहली नज़र में, गुरुवार रात इसराइल और ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के बीच दस दिनों के संघर्ष विराम की घोषणा ईरान के लिए जीत मानी जा रही है.
ईरान की हुकूमत ने लेबनान में युद्धविराम की मांग की थी. उसका कहना था कि इसके बिना अमेरिका के साथ बातचीत आगे नहीं बढ़ सकती.
पिछले सप्ताहंत इस्लामाबाद में हुई लंबी बातचीत से यह साफ़ हुआ कि लेबनान में लड़ाई जारी रहने के बावजूद भी बातचीत आगे नहीं बढ़ पाएगी.
इस दौरान इसराइल ने बेरूत पर और हमलों से परहेज़ किया.
लेकिन ईरान और पाकिस्तान दोनों ने ज़ोर दिया कि लेबनान को इसमें शामिल किया जाना चाहिए.
समाप्त
अब ऐसा हो गया है, जिससे उत्तरी सीमा के पास रहने वाले कई इसराइली लोग नाराज़ हैं.
उनका मानना है कि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अमेरिकी दबाव के आगे झुक गए. जबकि उन्हें ये सुनिश्चित करना चाहिए था कि हिज़्बुल्लाह दोबारा रॉकेट न दागे.
इसराइल में कुछ लोगों की नज़र में यह युद्धविराम सीधे तौर पर ईरान के फ़ायदे में जाता है, जिससे उसके सबसे बड़े दुश्मन को घटनाओं की दिशा तय करने का मौक़ा मिलता है.
दक्षिणपंथी अख़बार इसराइल हयोम की शिरित अवितान कोहेन ने लिखा, "यह युद्धविराम दरअसल उस स्थिति पर इसराइल की मुहर लगाता है, जिससे देश बचना चाहता था यानी ईरान और लेबनान के सैन्य क्षेत्र के बीच संबंध को वैधता देना."
"कल, हिज़्बुल्लाह को भी पता चल गया उसके और लेबनान के सरपरस्त के हाथ में अभी भी हालात नियंत्रण में हैं और क्षेत्र में क्या होगा, वही तय कर रहा है."
असल में, इन आपस में जुड़े संघर्षों में शामिल सभी पक्षों को इस नए समझौते से कुछ न कुछ मिला है.
समाप्त
इमेज स्रोत, Shawn Thew/EPA/Bloomberg via Getty Images
मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.
एपिसोड
समाप्त
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान की नेतृत्व टीम के लिए यह युद्धविराम कराने का श्रेय लेने का मौक़ा है.
नेतन्याहू यह कह सकते हैं कि इसराइली सैनिक अब भी दक्षिणी लेबनान में मौजूद हैं, जबकि लेबनान की सरकार को कई महीनों की कोशिश के बाद अब इसराइल के साथ सीधी बातचीत का मौक़ा मिला है.
हिज़्बुल्लाह का कहना है कि वह युद्धविराम का पालन करेगा, हालांकि वह यह भी कहता है कि उसकी "उंगली ट्रिगर पर" बनी हुई है. वह न तो हारा है और न ही वह अपने हथियार छोड़ने को तैयार है.
हिज़्बुल्लाह के वरिष्ठ नेता वफ़ीक़ सफ़ा ने गुरुवार को बीबीसी से कहा, "तब तक सही मायने में युद्धविराम नहीं होता, जब तक इसराइली सेना पीछे नहीं हटती. यानी कैदियों की वापसी से पहले, विस्थापित लोगों की वापसी से पहले और पुनर्निर्माण से पहले. और तब तक हिज़्बुल्लाह के हथियारों पर बात करना संभव नहीं है."
लंदन स्थित थिंक टैंक चैटहम हाउस की लीना ख़ातिब कहती हैं कि यह युद्धविराम इसराइल और लेबनान के बीच आमने-सामने की बातचीत का रास्ता खोलता है, लेकिन शांति समझौते के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं.
वह कहती हैं, "मामला बहुत जटिल है, यह सीमा निर्धारण, हिज़्बुल्लाह के निरस्त्रीकरण और लेबनानी क्षेत्र से इसराइल की वापसी से जुड़ा है."
इसराइल और लेबनान तकनीकी रूप से 1948 से ही युद्ध की स्थिति में हैं और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध नहीं हैं.
लेकिन ख़ातिब का कहना है कि क्षेत्र में ईरान की पकड़ मज़बूत होने के बजाय, वॉशिंगटन में इस हफ्ते इसराइली और लेबनानी राजदूतों के बीच हुई सीधी बातचीत ने ईरान के प्रभाव से लेबनान के बाहर निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
उनके अनुसार, "क्षेत्रीय शक्ति संतुलन ईरान से दूर जा रहा है, अब वह लेबनान को सौदेबाज़ी के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर पाएगा."
लेकिन बहुत कुछ अब भी अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया पर निर्भर करता है.
अगर इस्लामाबाद में अगले दौर की बातचीत होती है तो मध्यपूर्व में ईरान के उस व्यवहार को कम करना अमेरिका के एजेंडे में होगा. अमेरिका और इसराइल दोनों ही इस व्यवहार को ख़तरनाक मानते हैं.
ख़ासतौर पर इसराइल के लिए यह ज़रूरी है कि हिज़्बुल्लाह, हमास और यमन के हूतियों को ईरान का समर्थन कम हो, जिससे दशकों से चल रहा उसका तथाकथित "एक्सिस ऑफ़ रेजिस्टेंस" समाप्त हो सके, जिसने यहूदी राष्ट्र को लगातार चुनौती दी है.
समाप्त
इमेज स्रोत, AFP via Getty Images
ईरान अपने क्षेत्रीय प्रभाव के इस अहम साधन को आसानी से नहीं छोड़ेगा. लेकिन यह आने वाली कई बड़ी चुनौतियों में से सिर्फ़ एक है.
दूसरी बड़ी चुनौतियां हैं ईरान का परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज़ स्ट्रेट का भविष्य, जिन पर लंबी बातचीत की ज़रूरत होगी.
ट्रंप हमेशा की तरह स्थिति को अपने नियंत्रण में बताते हुए कहते हैं कि ईरान के साथ समझौता "बहुत क़रीब" है. जंग "बेहद आसान" तरीके से चल रही है.
उन्होंने पत्रकारों से कहा कि ईरान पहले ही लगभग 440 किलोग्राम हाई एनरिच्ड यूरेनियम सौंपने पर सहमत हो गया है, जिसे वह "न्यूक्लियर डस्ट" कहते हैं. कहा जा रहा है कि पिछले साल इस्फ़हान में बमबारी के बाद मलबे के नीचे दबा दिया गया था.
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने इस दावे को ख़ारिज किया और सरकारी टीवी से कहा, "अमेरिका को यूरेनियम सौंपने का कोई विकल्प पेश नहीं किया गया है."
"ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम हमारे लिए हमारी ज़मीन जितना पवित्र है और इसे किसी भी हालत में कहीं और नहीं भेजा जाएगा."
परमाणु समझौते के लिए ईरान से यह वादा भी ज़रूरी होगा कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा.
साथ ही यह भी तय करना होगा कि वह कितने समय तक एनरिचमेंट रोकने के लिए तैयार है.
इसके अलावा ईरान का एक और हथियार है, जो हमेशा उसके पास रहा है. इसका हाल में भी इस्तेमाल किया गया. वो हथियार है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करना.
ईरान कहता है कि वह इस जलमार्ग में समुद्री आवाजाही के लिए नए नियम चाहता है, जो मौजूदा नियंत्रण की जगह एक कानूनी ढांचा देंगे.
इसमें ओमान के साथ मिलकर खाड़ी में आने-जाने वाले जहाज़ों पर उसके अधिकार को मान्यता दी जाए.
इस बीच, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने लेबनान में युद्धविराम का स्वागत करते हुए कहा कि होर्मुज़ स्ट्रेट "युद्धविराम की बाकी अवधि के लिए पूरी तरह खुला" रहेगा, यानी अगले एक हफ्ते तक.
हालांकि एक शर्त है. जहाज़ों को उस "को-ऑर्डिनेटेड रूट" को मानना होगा, जिसकी घोषणा ईरान के पोर्ट्स एंड मैरिटाइम ऑर्गनाइज़ेशन ने पहले ही कर दी है.
यह संभवतः नए मार्गों की ओर इशारा करता है, जो युद्ध से पहले इस्तेमाल होने वाले मार्गों के उत्तर में, ईरान की मुख्य भूमि के ज़्यादा क़रीब से गुजरते हैं.
समाप्त
इमेज स्रोत, Reuters
इससे खाड़ी में फंसे जहाज़ों की भीड़ कितनी जल्दी कम होगी, यह देखना बाकी है.
ट्रंप अपने अंदाज़ में कहते हैं कि यह स्ट्रेट "पूरी तरह खुला है और पूरी आवाजाही के लिए तैयार है,". बाज़ारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है. लेकिन जहाज़ों के कप्तान सतर्क रह सकते हैं.
ट्रंप ने कहा है कि ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी रोक अभी जारी रहेगी.
इन सकारात्मक घटनाक्रमों के बावजूद, यह साफ़ है कि बातचीत करने वालों के सामने अभी लंबा रास्ता है.
ईरान के साथ 2015 का बड़ा समझौता, जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन (जेसीपीओए), करीब 20 महीने में तैयार हुआ था और उसमें सिर्फ परमाणु मुद्दा शामिल था.
ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को इससे बाहर कर लिया, जिससे यह समझौता टूट गया.
ट्रंप खुद को तेज़ी से सौदे करने वाला नेता दिखाना पसंद करते हैं, लेकिन अक्सर यह नहीं देखते कि उन समझौतों से हासिल क्या हुआ.
उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ 2018-19 में हुई उनकी बैठकों के बावजूद कोई ख़ास नतीज़ा नहीं निकला. वो अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखे हुए है.
लेकिन पिछले छह हफ़्तों की उथल-पुथल के बाद अब कूटनीतिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और लेबनान में युद्धविराम के बाद इसे और बढ़ावा मिला है.
क्या यह भविष्य में जंग को रोकने के लिए काफ़ी होगा? इसका जवाब ट्रंप को भी नहीं पता.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
© 2026 BBC. बाहरी साइटों की सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है. बाहरी साइटों का लिंक देने की हमारी नीति के बारे में पढ़ें.

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News