एक से ज्यादा शादी पर 7 साल जेल, लिव इन के लिए रजिस्ट्रेशन जरूरी, असम में UCC बिल पेश – AajTak

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असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने सोमवार को यूनिफॉर्म सिविल कोड पर बिल विधानसभा में पेश कर दिया है. इस बिल का उद्देश्य बहुविवाह पर रोक लगाना और लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करना है. 
हालांकि बिल में यह भी कहा गया है कि यह असम में रहने वाली किसी भी अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होग. इसमें कई दंडात्मक उपायों का प्रस्ताव किया गया है, जिसमें दो विवाह या बहुविवाह के लिए सात साल की कैद और लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन न कराने पर तीन महीने की जेल शामिल है. 
असम के संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की ओर से तीसरी बार बनी BJP की सरकार के पहले विधानसभा सत्र में ‘एक समान नागरिक संहिता, असम, 2026 विधेयक’ पेश किया. 
UCC BJP के चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा था. इस पर बुधवार को चर्चा होने की संभावना है. 
सरकार ने कहा कि शादी के लिए बिल में पुरुषों और महिलाओं के लिए न्यूनतम उम्र 21 साल और 18 साल तय की गई है, और बहुविवाह पर रोक लगाई गई है. 
सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “खास बात यह है कि यह बिल मौजूदा धार्मिक और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार शादियां करने की अनुमति देकर असम की सांस्कृतिक विविधता की रक्षा करता है.”
कानूनी अधिकारों की सुरक्षा के लिए बिल में शादी और तलाक का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करने का प्रस्ताव है, जो पति-पत्नी के लिए भरण-पोषण, विरासत और अन्य कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बहुत जरूरी होगा. 
मुख्यमंत्री ने कहा, “पहली बार यह बिल लिव-इन रिलेशनशिप के लिए एक कानूनी ढांचा प्रदान करता है. रजिस्ट्रेशन अनिवार्य करके, यह कानून सुनिश्चित करता है कि पार्टनर्स और ऐसे संबंधों से पैदा होने वाले किसी भी बच्चे के अधिकारों को औपचारिक रूप से मान्यता मिले और उनकी सुरक्षा हो.”
उन्होंने कहा कि UCC का मकसद उत्तराधिकार कानूनों को आधुनिक बनाना है, ताकि संपत्ति का बंटवारा निष्पक्ष और समान रूप से हो सके. 
सरमा ने कहा, “यह विरासत के लिए एक जैसे नियम लागू करता है, जिससे यह पक्का होता है कि राज्य के सभी निवासियों के लिए संपत्ति का हस्तांतरण न्यायसंगत तरीके से हो.”
उत्तराधिकार के मामले में बिल में क्लास-1 वारिसों के बीच बिना वसीयत के होने वाले उत्तराधिकार के लिए एक समान, लैंगिक रूप से बराबर वरीयता क्रम बनाने का प्रस्ताव है.  इसमें मृतक के जीवनसाथी, बच्चों और माता-पिता को समान रूप से शामिल किया गया है.
वसीयत के आधार पर होने वाले उत्तराधिकार के लिए कोई भी वयस्क और मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति लिखित और गवाहों के सामने वसीयत बनाने का कानूनी अधिकार रखेगा. 
सीएम ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत, राज्य को अपने नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) बनाने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया गया है.
मुख्यमंत्री ने कहा, “यह बिल असम में इस सिद्धांत को लागू करने का प्रयास करता है, ताकि सभी निवासियों के लिए, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, एक समान कानूनी ढांचा सुनिश्चित किया जा सके.”
विवाह को लेकर कड़े प्रावधान
प्रस्तावित कानून राज्य की कानूनी व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए ‘असम मुस्लिम विवाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण अधिनियम, 2024’ को रद्द कर देगा.
इसमें कहा गया है, “हालांकि, एक ज़रूरी सुरक्षा प्रावधान शामिल किया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस UCC के लागू होने से पहले हुए किसी भी बहुविवाह को नियमित किया जाएगा और उसे कानूनी सुरक्षा मिलेगी.”
बिल में निजी रिश्तों में शोषण, धोखाधड़ी और गैर-कानूनी तरीकों से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन के लिए कई दंडात्मक प्रावधानों का प्रस्ताव किया गया है.
प्रस्तावित कानून के तहत, द्विविवाह और बहुविवाह पर ‘भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023’ की धारा 82 के तहत सात साल तक की कैद हो सकती है. बाल विवाह और बिना वैध सहमति के विवाह पर ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006’ के अनुसार दो साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
बल, जबरदस्ती या तथ्यों को छिपाकर किए गए धोखाधड़ी वाले या कपटपूर्ण विवाह पर सात साल तक की कैद और जुर्माने की सज़ा होगी. 
तलाक की कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन और विवाह को गैर-कानूनी तरीके से खत्म करने पर तीन साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है, जबकि तलाकशुदा व्यक्ति को दोबारा शादी से पहले गैर-कानूनी शर्तें पूरी करने के लिए मजबूर करने पर तीन साल की कैद और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगेगा. 
इसके अलावा 60 दिनों के भीतर जानबूझकर विवाह या तलाक का पंजीकरण न कराने पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगेगा. पंजीकरण के दौरान जाली या मनगढ़ंत दस्तावेज़ जमा करने पर तीन महीने तक की कैद या 25,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
इसी तरह एक महीने के भीतर लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक की कैद या 10,000 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है, जबकि ऐसे घोषणापत्रों में ज़रूरी तथ्यों को छिपाने या गलत जानकारी देने पर तीन महीने तक की कैद और 25,000 रुपये तक का जुर्माना लगेगा. 
 
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