एक सोशल मीडिया पोस्ट और मौत की सजा… कौन हैं 23 साल की ईरानी छात्रा नजमेह अमिनी? जानें पूरा मामला – Bharat24live

Shreeom Singh
Date: 16-10-26 14:50
ईरान में 23 साल की छात्रा नजमेह अमिनी को सोशल मीडिया पर कथित ईशनिंदा के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई है. मशहद शहर की रहने वाली अमिनी का मामला अब चर्चा में है. इस मामले ने ईरान में बोलने की आजादी, धार्मिक कानून और मौत की सजा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं.
रिपोर्टों के मुताबिक, अमिनी को जनवरी 2026 में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद उन पर कई मामले दर्ज किए गए. इनमें सोशल मीडिया पर धार्मिक अपमान करने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े आरोप भी शामिल हैं.
अमिनी पर क्या आरोप लगे हैं?
नजमेह अमिनी पर आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट की थी, जिसे पैगंबर मुहम्मद का अपमान माना गया. ईरान में इस तरह के अपराध को ‘सब्ब अल-नबी’ कहा जाता है. देश के इस्लामिक दंड कानून के तहत इस अपराध के लिए मौत की सजा का प्रावधान है.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों ने अमिनी की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखी थी. इसके बाद उन्हें हिरासत में लिया गया और मशहद की अदालत में उनके मामले की सुनवाई हुई.
हालांकि, उनकी पोस्ट में क्या लिखा था, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. ऐसे में मामले से जुड़ी कई जानकारियां मानवाधिकार संगठनों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं.
क्या कहता है ईरान का कानून?
ईरान के इस्लामिक दंड संहिता की धारा 262 के तहत पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने पर मौत की सजा दी जा सकती है. वहीं, धारा 263 में कुछ ऐसी परिस्थितियों का जिक्र है, जिनमें आरोपी को इस अपराध के लिए मौत की सजा से छूट मिल सकती है.
इनमें ऐसी स्थिति भी शामिल हो सकती है, जब कथित बयान जानबूझकर न दिया गया हो. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी को किसी दूसरी सजा से भी छूट मिल जाएगी.
रिपोर्टों के अनुसार, अमिनी के बचाव पक्ष ने भी दलील दी थी कि उनकी कथित टिप्पणी जानबूझकर नहीं की गई थी. लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.
अमिनी ने जेल से क्या अपील की?
रिपोर्टों के मुताबिक, जेल से रिकॉर्ड किए गए एक कथित ऑडियो संदेश में अमिनी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील की. उन्होंने अपने परिवार और भविष्य को लेकर अपनी चिंताएं भी जाहिर कीं.
उनका कहना था कि उन्हें डर है कि शायद उन्हें अपनी बात रखने का दोबारा मौका न मिले. हालांकि, उनकी मौत की सजा के खिलाफ ईरान के सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है.
जनवरी 2026 में हुई थी गिरफ्तारी
नजमेह अमिनी को जनवरी 2026 में ईरान में हुए सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गिरफ्तार किया गया था. इन प्रदर्शनों के बाद सुरक्षा बलों ने कई लोगों को हिरासत में लिया था.
‘ईरान ह्यूमन राइट्स’ और ‘ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी’ (HRANA) की रिपोर्टों के अनुसार, अमिनी के खिलाफ अलग-अलग मामले चलाए गए. इनमें एक मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था, जबकि दूसरे में उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया.
अमिनी को मशहद की वकीलाबाद जेल में रखा गया है. उन पर ‘मोहारेबेह’, यानी ईश्वर के खिलाफ दुश्मनी, किसी दुश्मन देश के साथ सहयोग करने, ईरान के सर्वोच्च नेता का अपमान करने और सुरक्षाकर्मियों से भिड़ने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं.
नशीले मशरूम खाने की दलील क्यों दी गई?
अमिनी के बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि कथित आपत्तिजनक बातें जानबूझकर नहीं कही गई थीं. दलील दी गई कि उन्होंने दोस्तों के साथ साइकेडेलिक मशरूम खाए थे, जिसके बाद उन्हें मतिभ्रम होने लगा था और वह सामान्य स्थिति में नहीं थीं.
मीडिया रिपोर्टों में ईरानी अखबार ‘खुरासान’ के हवाले से बताया गया कि जज ने इस दलील को खारिज कर दिया. रिपोर्ट के अनुसार, जज ने सवाल उठाया कि अगर अमिनी उस समय ऐसी मानसिक स्थिति में थीं, तो उन्होंने दूसरी जगहों या राजनीतिक विरोधियों के बारे में भी वैसी बातें क्यों नहीं कहीं.
मौत की सजा के अलावा कितनी जेल की सजा मिली?
अमिनी को एक अन्य मामले में भी सजा सुनाई गई है. रिपोर्टों के मुताबिक, मशहद की रिवोल्यूशनरी कोर्ट ने उन्हें 12 साल, 6 महीने और 1 दिन जेल में रहने की सजा दी.
इस मामले में उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ काम करने और ईरानी सरकार के खिलाफ दुष्प्रचार करने जैसे आरोप लगाए गए. इस तरह, उनके खिलाफ ईशनिंदा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले अलग-अलग चलाए गए.
‘ईरान ह्यूमन राइट्स मॉनिटर’ ने अमिनी के मामले में कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. संगठन का आरोप है कि उन्हें अपनी पसंद का वकील चुनने की अनुमति नहीं दी गई. रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई गई कि उनसे कबूलनामा लेने के लिए शारीरिक और मानसिक दबाव डाला गया हो सकता है.
मानवाधिकार संगठनों ने क्या कहा?
मानवाधिकार समर्थकों का कहना है कि सोशल मीडिया पर की गई कथित टिप्पणी के लिए मौत की सजा देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जुड़े सवाल खड़े करता है.
संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार समिति के अनुसार, जिन अपराधों में जानबूझकर किसी की हत्या नहीं की गई हो, उन्हें आम तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मौत की सजा के लिए सबसे गंभीर अपराधों की श्रेणी में नहीं रखा जाता.
नजमेह अमिनी का मामला इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है. हालांकि, उनकी पोस्ट की वास्तविक सामग्री और मामले से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक नहीं होने के कारण कई पहलुओं की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना मुश्किल है.
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