भास्कर न्यूज | फलोदी
प्रदेश सरकार कम नामांकन वाले महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम सरकारी विद्यालयों में एक बार फिर हिंदी माध्यम शुरू करने की तैयारी कर रही है। शिक्षा विभाग ने प्रदेशभर के करीब 300 ऐसे विद्यालय चिन्हित किए हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है। इनमें फलोदी जिले के चार महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम विद्यालय भी शामिल हैं। विभाग ने जिला शिक्षा अधिकारियों से सात दिन के भीतर विस्तृत रिपोर्ट और प्रस्ताव मांगे हैं।
फलोदी जिले के बाप, देचू और लोहावट ब्लॉक के चार विद्यालयों में पिछले दो वर्षों से नामांकन लगातार कम हो रहा है। वर्तमान शैक्षणिक सत्र में इन चारों विद्यालयों में कुल 165 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जबकि यहां 20 कार्मिक कार्यरत हैं। सरकार का मानना है कि इन विद्यालयों में हिंदी माध्यम दोबारा शुरू होने से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों को स्थानीय स्तर पर प्रवेश मिल सकेगा तथा विद्यालयों में कुल नामांकन बढ़ेगा। ^शिक्षा विभाग ने जिले के चार विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम के साथ हिंदी माध्यम शुरू करने के संबंध में रिपोर्ट मांगी है। निर्धारित समय में रिपोर्ट भेजी जा रही है। इसके बाद सरकार और उच्च अधिकारियों के निर्देशानुसार नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। सोहनराम बिश्नोई, जिला शिक्षा अधिकारी, फलोदी शिक्षा विभाग ने जिला शिक्षा अधिकारियों से 7 दिन में रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए हैं।
रिपोर्ट में प्रत्येक विद्यार्थी से विकल्प लेने की जानकारी भी शामिल होगी कि वह अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई जारी रखना चाहता है या हिंदी माध्यम में प्रवेश लेना चाहता है। इसके अलावा विभाग ने यह भी पूछा है कि अंग्रेजी माध्यम शुरू होने से पहले विद्यालय में हिंदी माध्यम के कितने विद्यार्थी थे, निकटतम हिंदी माध्यम विद्यालय कौन-सा है और उसकी दूरी कितनी है। साथ ही निकटतम अंग्रेजी माध्यम विद्यालय का नाम और दूरी भी रिपोर्ट में शामिल करनी होगी।
हिंदी माध्यम शुरू करने की योजना के साथ सरकारी स्कूलों में भवन और कक्षा-कक्षों की कमी बड़ी चुनौती बन गई है। जिले के कई स्कूल पहले से ही जर्जर भवनों और कमरों के अभाव से जूझ रहे हैं। देचू ब्लॉक के पाबू ओरणियां विद्यालय में केवल तीन भवन हैं, जिनमें दो में एक साथ कई कक्षाएं चलती हैं, जबकि तीसरे में कार्यालय संचालित है। वहीं बाप ब्लॉक के कलरबा बेरा परिसर में पहले से दो विद्यालय संचालित हो रहे हैं। अतिरिक्त भवन और कक्षा-कक्ष के बिना अंग्रेजी व हिंदी माध्यम की अलग-अलग कक्षाएं चलाना शिक्षकों और स्कूल प्रशासन के लिए चुनौती होगा।
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