बैंकिंग प्रणाली में भरोसे को झटका देने वाले मिसरोद शाखा भ्रष्टाचार मामले में सीबीआई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन शाखा प्रबंधक पियूष चतुर्वेदी और सहअभियुक्त मोहनसिंह सोलंकी को दोषी ठहराया है। सीबीआई प्रकरणों की सुनवाई कर रही अतिरिक्त जिला एवं
2014 में फर्जीवाड़ा, 2016 में हुई शिकायत
मामला जुलाई 2014 का है, जब बैंक ऑफ इंडिया की मिसरोद शाखा में पदस्थ शाखा प्रबंधक ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर कई व्यक्तियों और फर्मों के नाम पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर टर्म लोन और कैश क्रेडिट लिमिट स्वीकृत की। इन खातों से संबंधित वास्तविक खाताधारकों को इसकी जानकारी तक नहीं दी गई और रकम आहरित कर ली गई। इस अनियमितता की शिकायत वर्ष 2016 में सीबीआई एसीबी भोपाल को दी गई, जिसके बाद विस्तृत जांच शुरू हुई।
‘विजन कम्प्यूटर’ के नाम पर 12.5 लाख का खेल
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने ‘मेसर्स विजन कम्प्यूटर’ के नाम पर 12.50 लाख रुपए का ऋण स्वीकृत किया। इसके लिए कूटरचित दस्तावेजों का उपयोग किया गया और बाद में यह राशि खाताधारक की जानकारी के बिना मोहनसिंह सोलंकी द्वारा संचालित अन्य फर्म के खाते में ट्रांसफर कर दी गई।
कोर्ट ने बढ़ाईं धाराएं, साक्ष्यों के आधार पर सजा
सीबीआई ने शुरू में आरोप पत्र भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में पेश किया था। लेकिन सुनवाई के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने धारा 467, 468 और 471 को भी शामिल किया और इन्हीं धाराओं में दोष सिद्ध पाया।
अलग-अलग धाराओं में सजा और जुर्माना
वहीं, पियूष चतुर्वेदी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(2) सहपठित 13(1)(d) के तहत 5 वर्ष का कठोर कारावास और 20 हजार रुपए जुर्माना, तथा जुर्माना अदा नहीं करने पर 6 माह का अतिरिक्त कारावास सुनाया गया।
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