केंद्र सरकार के कौशल विकास प्रयासों के बावजूद, नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि उत्तरी राज्यों से विदेश जाने वाले कम कुशल श्रमिक प्रेषण में कम योगदान …और पढ़ें
सांकेतिक तस्वीर।
जितेंद्र शर्मा, नई दिल्ली: केंद्र सरकार बीते लगभग 12 वर्षों से कौशल विकास के लिए जतन कर रही है, लेकिन आशातीत परिणाम न मिलने के कारण ही बार-बार कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय को योजनाओं में बदलाव करना पड़ रहा है। राज्य अपने प्रयासों से कैसे सुधार कर सकते हैं, इसकी तस्वीर रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा विदेश से भेजी जाने वाली रकम) को लेकर नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट दिखाती है।
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे उत्तर भारत के राज्यों से काम के लिए विदेश जाने वाले युवाओं की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन भारत आने वाले रेमिटेंस में उनकी हिस्सेदारी बहुत कम है। कारण यही कि कौशल की कमी के कारण वह छोटे स्तर के रोजगार से जुड़ रहे हैं, जबकि दक्षिण के युवा पेशेवर के रूप में नौकरियां कर अपने-अपने राज्यों की रेमिटेंस में हिस्सेदारी को मजबूत बनाए हुए हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट में बताया गया है कि हमेशा से केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे दक्षिणी राज्यों को सबसे ज्यादा रेमिटेंस मिलता रहा है। 2018 में कुल आने वाली रकम का 46 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं राज्यों को मिला था।
अब बदलाव सिर्फ इतना आया है कि 20.5 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ महाराष्ट्र सबसे आगे निकल गया है तो उसके बाद केरल (19.7 प्रतिशत), तमिलनाडु (10.4 प्रतिशत), तेलंगाना (8.1 प्रतिशत) और कर्नाटक (7.7 प्रतिशत) खड़े हैं। वहीं, उत्तरी राज्यों की संयुक्त भागीदारी की बात करें तो यह 11.5 से 12 प्रतिशत के बीच सिमटी हुई है।
दरअसल, रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बीते कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश और बिहार सहित उत्तरी और पूर्वी राज्यों से विदेश में नौकरी के लिए जाने वालों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है, लेकिन आवश्यक कौशल की कमी के कारण वह मुख्य रूप से खाड़ी देशों में जाकर कम वेतन वाली नौकरियां कर रहे हैं। इसके कारण रेमिटेंस में उनका योगदान कम ही रहा है।
प्रयास की इंटरनेशनल माइग्रेशन और मोबिलिटी मैपिंग रिपोर्ट-2026 भारतीय राज्यों में अलग-अलग तरह के माइग्रेशन पैटर्न को दिखाती है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे उत्तरी राज्य अभी भी गल्फ देशों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिणी राज्यों के युवाओं का झुकाव यूरोप और उत्तरी अमेरिका की ओर बढ़ रहा है, खासकर नर्सों और टेक्निकल प्रोफेशनल्स के बीच।
पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों में माइग्रेशन के दो ट्रेंड देखे हुए हैं। यहां के प्रवासी व्यापार से जुड़े कामों के लिए खाड़ी देशों की ओर तो शिक्षा या स्किल्ड जाब के लिए उत्तरी अमेरिका की ओर जा रहे हैं। वहीं, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों का झुकाव दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर है।
इंटरनेशनल माइग्रेशन एंड मोबिलिटी मैपिंग रिपोर्ट बताती है कि विदेशों में नौकरी के लिए जो औपचारिक कौशल प्रशिक्षण चाहिए, उस मामले में राज्यों की स्थिति एक जैसी नहीं है। बताया गया है कि कम-कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों के लिए विदेश में रहने वाले रिश्तेदार और दोस्त जैसे अनौपचारिक सामाजिक नेटवर्क अक्सर जानकारी का पहला माध्यम होते हैं।
वहीं, नौकरी पाने, वीजा की प्रक्रिया और विदेश जाने से पहले की जानकारी (ओरिएंटेशन) के लिए 33 प्रतिशत कामगार निजी भर्ती एजेंसियों पर निर्भर रहते हैं। वहीं, कौशल विकास की बात करें तो कौशल विकास मंत्रालय ने अब प्रयासों में फिर कुछ सुधार की मंशा दिखाई है।
कौशल प्रशिक्षण केंद्रों को सेंटर आफ एक्सीलेंस के रूप में सूचीबद्ध करने के लिए गाइडलाइन्स बनाई जा रह हैं। यह प्रविधान भी प्रस्तावित है कि यह संस्थान मेंटरशिप की भूमिका में आकर अभ्यर्थी की काउंसिलिंग, प्रशिक्षण, इंटर्नशिप से लेकर प्लेसमेंट कराएंगे और उसे लगातार ट्रैक भी करेंगे।