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भारत-चीन सीमा यानी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) लगभग 3488 किलोमीटर लंबी है. 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देश अपनी तैयारियां लगातार बढ़ा रहे हैं. रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2025 में चीनी पीएलए की तैनाती में कमी आई, लेकिन अब भी 10 संयुक्त शस्त्र ब्रिगेड (प्रत्येक 4000-5000 सैनिक) एलएसी पर और 10 ट्रेनिंग क्षेत्रों में मौजूद हैं.
40,000 से 50,000 चीनी सैनिक सीमा के पास हैं. पूर्वी लद्दाख में कुछ रिपोर्टों में करीब 20,000 सैनिक बताए गए हैं. भारत की तरफ से सेना की तैनाती सभी सेक्टरों में मजबूत, संतुलित और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार बताई गई है. अरुणाचल प्रदेश में जुलाई 2026 से कई जगहों पर आमने-सामने की स्थिति जारी है. चीनी सैनिकों ने असफिला और तकसिंग के पास भारत की समझ वाली एलएसी से 6-7 किलोमीटर दूर तंबू लगाए हैं.
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आईटीबीपी की आधुनिक तैयारियां और शौर्य कमांडो
आईटीबीपी लगभग 95,000 जवानों वाला बल है जो पहाड़ी युद्ध में प्रशिक्षित है. महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने बताया कि चीन भारत का सबसे बड़ा विरोधी है. पारंपरिक तरीकों से मुकाबला अब पर्याप्त नहीं. हर सीमा सुरक्षा बटालियन में ड्रोन प्लाटून तैयार कर ली गई है.
सरकार से मिले 400 करोड़ रुपये में से 70 प्रतिशत ड्रोन क्षमताओं पर खर्च हो रहा है. गृह मंत्रालय ने 4000 करोड़ रुपये की आधुनिकीकरण योजना को सैद्धांतिक मंजूरी दी है, जिसमें 1000 करोड़ रुपये ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम के लिए रखे गए हैं. आईटीबीपी खुद ड्रोन बना रहा है. पायलटों की ट्रेनिंग चल रही है.
शौर्य कमांडो नई लड़ाकू टीम है जो गलवान जैसी स्थितियों के लिए विशेष प्रशिक्षित है. 2020 में गलवान में चीनी सैनिकों ने पत्थर, नाखून लगे डंडे और लोहे की छड़ों से हमला किया था जिसमें भारत के 20 जवान शहीद हुए. अब ये कमांडो हर बॉर्डर बटालियन में होंगे. ‘स्ट्राइक’ कोर्स तैयार किया गया है.
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अब तक 10,000 जवानों को ट्रेनिंग दी जा चुकी है. 330 मास्टर ट्रेनर तैयार हैं. पूरा बल 2027 के अंत तक इस ट्रेनिंग से गुजरेगा. भूमिगत बंकर बड़े पैमाने पर बनाए जा रहे हैं क्योंकि आधुनिक युद्ध में ऊपर की इमारतें आसान लक्ष्य बन जाती हैं. सब-जीरो तापमान वाले क्षेत्रों में 383 बैरकों में से 342 को इंसुलेट किया गया है. 141 जनरेटर और सोलर वॉटर हीटर लगाए गए हैं. नई ऑल-ट्रेन वाहन और कोल्ड स्टार्ट किट से बर्फीले मौसम में तेजी से पहुंच संभव हो रही है.
सेना के हथियार, मिसाइल और ड्रोन सिस्टम
भारतीय सेना ने स्वदेशी नागस्त्र-2 एंटी-टैंक लॉइटिरिंग म्यूनिशन प्राप्त किया है. नागपुर की सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस लिमिटेड ने अगस्त 2026 में महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में सफल परीक्षण के बाद इसे दिया. इसमें दिन-रात कैमरे, 4 किलोग्राम वारहेड (650 मिलीमीटर कवच भेदने वाला), 50 किलोमीटर रेंज (फायर-एंड-फॉरगेट मोड) और 60 मिनट की सहनशक्ति है. ईसीसीएम सूट जैमिंग का विरोध करता है. 80 प्रतिशत से अधिक सामग्री स्वदेशी है. पहले संस्करण पहले से सेना में हैं.
एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम लंबी दूरी तक सुरक्षा देता है. यह 400 किलोमीटर तक के लक्ष्य (विमान, ड्रोन, क्रूज और कुछ बैलिस्टिक मिसाइल) को रोक सकता है. भारत ने रूस से पांच स्क्वॉड्रन खरीदे हैं. कुछ सिक्किम-सिलीगुड़ी कॉरिडोर और उत्तरी क्षेत्रों (चीन सीमा) में, कुछ पश्चिमी सीमा (पाकिस्तान) पर तैनात हैं. चौथा स्क्वॉड्रन 2026 में पहुंचा और पांचवां वर्ष भी जल्द आने वाला है.
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आकाश मिसाइल सिस्टम 25-30 किलोमीटर रेंज वाला स्वदेशी सिस्टम है जो विमान, हेलीकॉप्टर और ड्रोन को रोकता है. एमआरएसएएम (बराक-8) 70-100 किलोमीटर तक काम करता है. ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की रेंज करीब 800 किलोमीटर है. यह मोबाइल लॉन्चर पर तैनात है. पिनाका रॉकेट सिस्टम 120 किलोमीटर तक गाइडेड फायर कर सकता है. ये सिस्टम लद्दाख, अरुणाचल, सिक्किम और सिलीगुड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात या तैनाती हैं.
चीन की तैनाती और भारत से तुलना
चीन की तरफ पीएलए ने 2020 में लद्दाख में लगभग 60,000 सैनिक तैनात किए थे. 2025 में कमी के बावजूद 10 संयुक्त शस्त्र ब्रिगेड (40-50 हजार) एलएसी पर हैं. पूर्वी लद्दाख में अतिरिक्त डिवीजन और टैंक-बीएमपी वाहन भी रिपोर्ट हुए हैं. चीन की तरफ सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हैं जिससे तेजी से सैनिक पहुंचाए जा सकते हैं.
भारत की तरफ सेना की सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं है लेकिन रिपोर्टों में कहा गया है कि तैनाती मजबूत और तैयार है. आईटीबीपी और सेना मिलकर गश्त, ड्रोन निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया पर जोर दे रहे हैं. भारत का फायदा ऊंचाई वाले इलाकों के अनुभव, स्वदेशी हथियारों और निरंतर आधुनिकीकरण में है.
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चीन की ताकत बड़ी संख्या, आधुनिक पीएलए और तेज लॉजिस्टिक्स में है. भारत ड्रोन, एंटी-ड्रोन, भूमिगत सुरक्षा और विशेष कमांडो से इस अंतर को पाटने की कोशिश कर रहा है. अरुणाचल में जारी फेस-ऑफ और आईटीबीपी-सेना की तैयारियां दिखाती हैं कि कूटनीतिक बातचीत के बावजूद जमीन पर सतर्कता जरूरी है.
भारत अब सिर्फ रक्षात्मक नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध (ड्रोन, मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध) के लिए तैयार हो रहा है. एस-400 जैसी लंबी दूरी की रक्षा, नागस्त्र जैसे सटीक हमलावर ड्रोन और शौर्य कमांडो जैसी विशेष यूनिटस सीमा सुरक्षा को मजबूत बना रही हैं.
जवानों की सुविधाएं, ट्रेनिंग और मनोबल पर ध्यान देने से ऑपरेशनल क्षमता बढ़ रही है. कुल मिलाकर एलएसी पर भारत की तैयारियां बहुआयामी हैं- सैनिक संख्या, हथियार, तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर तीनों स्तर पर. यह चीन जैसे शक्तिशाली पड़ोसी के खिलाफ विश्वसनीय प्रतिरोध बनाने का प्रयास है. निरंतर निगरानी और आधुनिकीकरण से उत्तरी सीमा अधिक सुरक्षित हो रही है.
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