छोटा घर या बड़ा बंगला….कहां रहने वाले लोग ज्यादा खुश? साइकोलॉजिस्ट ने बताया कैसे तबाह हो रहा मानसिक सुकून – AajTak

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आजकल की भागदौड़ भरी लाइफ में ‘सक्सेस’ का पैमाना बड़ा घर, लग्जरी कार और वेल सेटल्ड लाइफस्टाइल बन गया है. हम दिन-रात मेहनत करते हैं ताकि शहर के सबसे पॉश इलाके में एक आलीशान विला या बड़ा अपार्टमेंट ले सकें लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बड़े-बड़े कमरों और ऊंची छतों वाले इन घरों में इतना सन्नाटा क्यों होता जा रहा है या फिर इन पॉश बंगलों में रहने वाले लोग अक्सर अकेले और उदास क्यों नजर आते हैं. गेटेड सोसाइटियों ने प्राइवेसी भी दे दीं, हर सुख-सुविधा है, पड़ोसियों से भी बातचीत कम हो गईं, स्पेस भी ज्यादा है…लेकिन फिर भी लोग अधिक दुखी क्यों हैं? 
साइकोलॉजी के मुताबिक, हैरानी की बात यह है कि गेटेड सोसायटियों के बंद दरवाजों के पीछे अकेलापन और डिप्रेशन जैसी समस्याएं तेजी से पैर पसार रही हैं और ऐसे कई लोग अपने ट्रीटमेंट के लिए अलग-अलग एक्सपर्ट्स और साइकोलॉजिस्ट के पास पहुंच रहे हैं.आइए एक्सपर्ट्स के नजरिए से समझते हैं कि कैसे बड़े बंगले और छोटा आशियाना आपकी क्वालिटी ऑफ लाइफ को पूरी तरह बदल सकता है.
छोटे घर अधिक खुशी प्रदान करते हैं वहीं अधिक स्पेस और सुनसान एरिया में घर होना केवल अव्यवस्था और अकेलेपन को जन्म देते हैं. बड़े और नए घर दिखने में तो अच्छे लग सकते हैं लेकिन उनमें मिलने वाली खुशी कुछ ही समय के लिए होती है. वहीं छोटे घरों में रहने वाले लोगों को ये समस्याएं नहीं होतीं. 
साइंस डायरेक्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे घर बड़े होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उनमें रहने वाले लोग खुश नजर नहीं आ रहे हैं और शायद उनकी स्थिति और भी खराब हो रही है. अमेरिका की बात करें तो वहां पर घर में प्रति व्यक्ति औसतन 940 वर्ग फुट से अधिक जगह होती है लेकिन आज से करीब 5 दशक पहले यानी 1973 में यही आंकड़ा लगभग 550 वर्ग फुट के करीब था. रिसर्च बताती हैं कि रहने की जगह के लगातार बढ़ने से भी जीवन संतुष्टि में स्थायी लाभ नहीं मिला है.
जो लोग नया घर खरीदना चाहते हैं तो उसके काफी समय बाद उन्हें अहसास होता है कि घर खरीदने के लिए उन्हें कौन-कौन सी चीजों के साथ सेक्रिफाइज करना पड़ रहा है. पर्याप्त सेफ्टी और कंफर्ट होने के बाद भी घर का हर एक्स्ट्रा रूम या फ्लोर ओवरऑल लाइफ सेटिस्फेक्शन को कम करता है और स्ट्रेस बढ़ाता है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि दूसरों से आगे निकलने की होड़ भी एक गंभीर समस्या है. जब इंसान दूसरों के मुकाबले अपने पास मौजूद चीजों (जैसे, बड़ा घर, कारें और अन्य महंगी चीजें) की अधिक परवाह करने लगता है तो अक्सर वो दुख की ओर बढ़ने लगता है. लेकिन छोटे घरों में रहने वाले लोग इन सबसे दूर हमेशा खुश रहते हैं.
मुंबई में कोकिलाबेन धीरुभाई अंबानी अस्पताल के साइकोलॉजिस्ट डॉ. पार्थ नागदा ने Aajtak.in को बताया, ‘मेरे पास ऐसे कई मरीज आते हैं जिन्होंने सोशलाइजिंग के हिसाब से जीवन के सारे ‘माइलस्टोन्स’ हासिल कर लिए हैं जैसे, बड़ा घर, स्टेबल जॉब और नई-नई कारें. लेकिन अब एक नया ट्रेंड दिख रहा है जहां उनका फिजिकल स्पेस लोगों के लिए ‘आइसोलेशन’ (अलगाव) का कारण बन रहा है.’
‘बड़ा घर और लग्जरी लाइफ आपको कंफर्ट तो दे सकती है लेकिन यह बाहरी दुनिया से आपकी फिजिकल दूरी भी बढ़ा देती है. छोटे घरों में आप न चाहते हुए भी पड़ोसियों या अन्य आसपास के लोगों से मिलते हैं, लोगों का शोर सुनाई देता है, बातचीत होती हैं. लेकिन बड़े घरों में इसकी जगह सिर्फ ‘सन्नाटा’ ले लेता है, जो इंसान के अंदर खालीपन पैदा कर देता है.’
डॉ. पार्थ ने बताया, ‘साइकोलॉजी की भाषा में इसे ‘सर्वाइवल स्ट्रेस’ से ‘एक्जिस्टेंशियल स्ट्रेस’ की ओर शिफ्ट होना कहते हैं. जब फिजिकल जरूरतें पूरी हो जाती हैं तो दिमाग का फोकस सेप्टी से हटकर रिश्तों पर जाता है और उसे लगता है कि पैसे कमाने की होड़ में आप उन सबको पीछे छोड़ आए हैं. दरअसल, हम इंसानी रूप से एक-दूसरे पर निर्भर रहने के लिए ही बने हैं लेकिन हमने खुद को इंडिपेंडेंट बनाने के चक्कर में अकेला कर लिया है. यही सन्नाटा अब खालीपन के रूप में सामने आ रहा है.’
डॉ. पार्थ ने समझाते हुए कहा, ‘आजकल लोग जरूरी और गैर-जरूरी, दोनों वजहों से लोन ले रहे हैं. आलीशान घरों के लिए लिए गए भारी कर्ज इंसान को ‘सर्वाइवल मोड’ में डाल देते हैं. होम लोन आज के समय में 20-30 साल के लिए होते हैं और जब तक ईएमआई (EMI) क्लियर नहीं होती, दिमाग कर्ज को एक खतरे के रूप में देखता है. इस स्ट्रेस के कारण लोग ऐसी हाई-प्रेशर जॉब्स करने को मजबूर हैं जिन्हें वे पसंद भी नहीं करते. नतीजा यह होता है कि जिस घर के लिए वे पैसे दे रहे हैं, वहां समय बिताने का सुख भी उन्हें नहीं मिल पाता.’
‘गेटेड सोसायटियों और बड़े घरों ने अनजाने में ही पड़ोसियों के महत्व को कम कर दिया है. बंद घर, शहर के बाहर की कॉलोनीज और कई किलोमीटर दूर या शहर के बाहर घर होने के कारण अब लोगों से मिलने के लिए भी ‘मेहनत’ करनी पड़ती है, जिससे कैजुअल मुलाकातें भी कम हो गई हैं. जहां छोटे घरों की बात की जाए तो लोग शाम को घरों के बाहर बैठते हैं, एक-दूसरे से बात करते हैं, कोई त्योहार हो तो उसे भी साथ में मनाते हैं. लेकिन आलीशान बंगलों में रहने वाले लोग इन सबसे दूर हो गए हैं.’
नोएडा के ओपोलो और मेट्रो हॉस्पिटल की साइकोलॉजिस्ट डॉ. मनीषा सिंघल ने Aajtak.in को बताया, ‘हमारे शरीर में ऑक्सीटोसिन, सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे ‘हैप्पी हार्मोंस’ होते हैं जो केवल सामाजिक मेलजोल से ही रिलीज होते हैं. ऑक्सीटोसिन को लव हार्मोन कहते हैं. जब हम अपनों से मिलते हैं या दोस्ताना व्यवहार करते हैं, तो यह रिलीज होता है. बड़े घरों में अकेले रहने वाले लोग इस हार्मोन की कमी का शिकार हो जाते हैं. वहीं सेरोटोनिन और डोपामाइन तब रिलीजल होते हैं, जब हम दोस्तों के साथ पुरानी यादें शेयर करते हैं या साथ में एक्टिव रहते हैं. तब ये हार्मोंस हमें मानसिक सुकून देते हैं. ऐसे में आइसोलेशन या अकेलेपन में इनकी कमी इंसान को डिप्रेशन की ओर धकेल सकती है.’
डॉ. सिंघल बताती हैं कि बड़े घरों का एक बड़ा नुकसान ‘इमोशनल डिस्टेंस’ यानी भावनात्मक दूरी है. कोरोना काल में मेरे पास डोमेस्टिक वायलेंस और फैमिली स्ट्रेस के सबसे ज्यादा केस उन लोगों के आए जो बड़े घरों में रहते थे. उन्हें एक-दूसरे के साथ समय बिताने की आदत ही नहीं थी. बड़े घरों में हर सदस्य अपने अलग कमरे में रहने का आदी हो जाता है, जिससे आपसी लगाव खत्म होने लगता है.’
‘कई बार लोग आर्थिक संतुष्टि और स्टेटस के लिए बड़ा घर तो बना लेते हैं लेकिन उनका फोकस ‘मटीरियलिस्टिक’ चीजों पर ज्यादा और भावनाओं पर कम हो जाता है जो कि उनके कम खुश होने का कारण बनता है.’
जब डॉ. सिंघल से पूछा गया कि एक परिवार की खुशी के लिए कितना स्पेस पर्याप्त है तो उन्होंने कहा, ‘अगर परिवार में 4 लोग हैं, तो सबके लिए एक-एक कमरा, एक कॉमन हॉल और किचन पर्याप्त है. लेकिन अगर बिना किसी ठोस कारण (जैसे भविष्य की प्लानिंग या मेहमानों का आना) के आप 10-12 कमरों का बंगला बना लेते हैं, तो वह सिर्फ पैसे की बर्बादी और स्ट्रेस का कारण है.’
‘बड़े घरों में रहने वाली महिलाओं और बुजुर्गों को अक्सर सफाई का ‘ऑब्सेशन’ या तनाव हो जाता है. उन्हें हर वक्त घर गंदा नजर आता है, जिससे उनका मानसिक सुकून छिन जाता है.’
 
आर्किटेक्चरल एक्सपर्ट लिबर्टी कोहेन का मानना है कि छोटे घर हमें ‘मीनिंगफुल लिविंग’ की ओर ले जाते हैं और जब आपके पास जगह कम होती है तो आप केवल वही सामान रखते हैं जो वाकई जरूरी है. यह ‘डिक्ल्टरिंग’ आपके दिमाग को शांत रखती है और वहीं जब आपका घर बड़ा होता है तो आप बिना जरूरत वाली चीजों को भी घर में रखना चाहते हैं जिससे सामान इधर-उधर रखा देखकर आप स्ट्रेस में आते हैं.
मेंटल हेल्थ स्पेशलिस्ट डॉ. क्रिस्टिन ल्यूक के अनुसार, बड़े घरों की सफाई और रखरखाव की टेंशन घर की महिलाओं और बुजुर्गों में एंग्जायटी का बड़ा कारण बनता है. छोटा घर इस मानसिक बोझ को कम कर देता है जिससे ‘कोर्टिसोल’ (स्ट्रेस हार्मोन) का लेवल कम रहता है. इसके पीछे का कारण है, आपने देखा होगा घर के बुजुर्गों को अपने घर की चीजों से काफी मोह होता है, वह घर में रहते हैं तो हमेशा साफ-सफाई में लगे रहते हैं और अच्छी सफाई के बाद भी उन्हें घर गंदा ही लगता है.
स्मार्ट होम डिजाइनर जेम्स मार्सडेन का तर्क है कि छोटे घर आलस को खत्म करते हैं क्योंकि घर में जगह कम होने के कारण लोग अक्सर बाहर निकलकर टहलना या पार्कों का उपयोग करना पसंद करते हैं जिससे उनकी फिजिकल एक्टिविटी 30 प्रतिशत तक बढ़ जाती है.

बड़ा घर और लग्जरी लाइफ बुरा नहीं है, लेकिन अगर यह आपकी सोशल और इमोशनल जरूरतों को खत्म कर रहे हैं तो यह आपकी मानसिक सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है.
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