खेतों की बिगड़ती सेहत और बढ़ती खेती लागत के बीच किसान अब प्राकृतिक खेती की ओर लौट रहे हैं। इसी बदलाव के लिए जयपुर में देशभर से आए प्रतिभागियों ने प्राकृतिक खेती के गुर सीखे। करीब 50 मास्टर ट्रेनर तैयार हुए। ये प्रशिक्षक अब अपने-अपने क्षेत्रों में किस
जयपुर जिले के अजमेर रोड पर भैराना-बिचून स्थित रुद्र शिवम डेयरी और नेचुरल रिसर्च सेंटर में तीन दिवसीय प्राकृतिक खेती और डेयरी फार्मिंग मास्टर ट्रेनर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और गुजरात सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
मिट्टी की उर्वरता बढ़ती, पानी बचाया जा सकता
प्रशिक्षण का मुख्य संदेश रहा कि जल, जंगल, जमीन, जन और जानवर बचेंगे, तभी गांव बचेगा। विशेषज्ञों ने कहा- प्राकृतिक खेती केवल रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूरी बनाने की पद्धति नहीं है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, पानी बचाने, पशुधन को खेती से जोड़ने और किसान की आय को टिकाऊ बनाने की समग्र व्यवस्था है।
प्रशिक्षण के दौरान प्राकृतिक खेती, मिट्टी के स्वास्थ्य, डेयरी प्रबंधन, पशुपालन और ग्रामीण आजीविका से जुड़े विषयों पर व्यावहारिक जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग, जल संरक्षण, मिट्टी को जीवंत बनाए रखने और देसी पशुधन को खेती का हिस्सा बनाने पर विशेष जोर दिया।
प्राकृतिक खेती की तकनीक की दी जानकारी
इंजीनियर रत्नेश शर्मा, तानाजी निकम, मनवीर रेढू, कान सिंह निर्वाण, सुरेंद्र अवाना और डॉ. विनोद चौधरी ने विभिन्न विषयों पर प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। प्रशिक्षण के बाद तैयार हुए 50 मास्टर ट्रेनर अब अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों से सीधे जुड़कर प्राकृतिक खेती की तकनीक और इसके व्यावहारिक लाभों की जानकारी देंगे।
आयोजकों के अनुसार- प्राकृतिक खेती का उद्देश्य केवल खेती की पद्धति में बदलाव करना नहीं, बल्कि किसान, पशुधन, मिट्टी और गांव की अर्थव्यवस्था को प्रकृति के साथ फिर से जोड़ना है। जयपुर में तैयार किए गए ये मास्टर ट्रेनर इस अभियान को खेत-खेत तक ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। कार्यक्रम के आयोजन एवं समन्वय में सुरेंद्र अवाना, भिकम चंद चौहान, सुनील दत्त खरगल और दीपक एस. राघव की प्रमुख भूमिका रही।
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