एजुकेशन रिपोर्टर| आरा
भोजपुर जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन के तत्वावधान में शहर के “अपना सभागार” में संत कबीर की जयंती पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाई गई। इस गरिमामयी समारोह की अध्यक्षता सम्मेलन के अध्यक्ष और वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के सीनेटर प्रोफेसर बलिराज ठाकुर ने की। कार्यक्रम के दौरान शिक्षाविदों, साहित्यकारों और विचारकों ने संत कबीर के जीवन दर्शन, सामाजिक चेतना और साहित्यिक अवदानों पर गहराई से मंथन किया। प्रोफेसर बलिराज ठाकुर ने संत कबीर को 15वीं शताब्दी का एक महान धार्मिक संत और युगदृष्टा बताया। उन्होंने कहा कि कबीर ने मध्य युग के जीवन और साहित्य पर एक महान एवं अमिट प्रभाव डाला है। प्रो. ठाकुर ने कबीर के संदेशों का जिक्र करते हुए उनके धार्मिक सौहार्द्र, भ्रातृत्व प्रचार, सामाजिक सुधार और उनके गहन साहित्यिक योगदानों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मुख्य अतिथि जय प्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा के पूर्व कुलपति प्रोफेसर दुर्ग विजय सिंह ने अपने विचार रखते हुए कहा कि कबीर की दिव्य अनुभव की धारणा पूरी तरह कर्म प्रधान है। वहीं विशिष्ट अतिथि डॉ. महेश सिंह ने दार्शनिक पक्ष रखते हुए कहा कि कबीर “शब्द” को ही परम तत्व मानते हैं। उनके अनुसार शब्द ही ब्रह्म है और वह दिव्य शब्द हर व्यक्ति के अंदर मौजूद है। भोजपुरी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर दिवाकर पांडेय ने कहा कि कबीर प्रारंभिक हिंदी साहित्य के महानतम गीति कवि और अद्वितीय रहस्यवादी थे। वरिष्ठ कवि व समीक्षक जितेंद्र कुमार ने कबीर को एक ऐसा महान समाज सुधारक बताया जिन्होंने समाज की कुरीतियों पर सीधा प्रहार किया। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन करते हुए प्रोफेसर नंद जी दुबे ने कहा कि कबीर के विचार और उनकी बातें आज के दौर में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं।
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