टेलीकॉम में बजेगा भारत का डंका! चीन को टक्कर, $50 बिलियन एक्सपोर्ट टारगेट से ग्लोबल हब बनने की तैयारी| Explai – India.com

भारत दुनिया के सबसे बड़े टेलीकॉम मार्केट में शामिल है, लेकिन अब सरकार की नजर केवल घरेलू मांग पूरी करने पर नहीं, बल्कि भारत को वैश्विक टेलीकॉम इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट हब बनाने पर है. नीति आयोग (NITI Aayog) ने टेलीकॉम एंड नेटवर्क इक्विपमेंट सेक्टर के लिए 2035 तक करीब $50 अरब के एक्सपोर्ट की पहचान की है. हालांकि मौजूदा स्थिति बताती है कि इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए भारत को लंबा रास्ता तय करना होगा.

नीति आयोग (NITI Aayog) के आकलन के मुताबिक भारत फिलहाल हर साल लगभग $0.6-$1 अरब का टेलीकॉम और नेटवर्क इक्विपमेंट एक्सपोर्ट करता है. इसके मुकाबले टेलीकॉम हार्डवेयर का इंपोर्ट करीब $4-$5 अरब है. यानी भारत अभी इस क्षेत्र में एक बड़े इंपोटर की भूमिका में है.

देश का घरेलू TANE मार्केट करीब $25 अरब का है, लेकिन स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग में वेल्यू एडिशन अभी सीमित है. कई मामलों में भारतीय कंपनियां कंपोनेंट्स और टेक्नोलॉजी बाहर से मंगाकर उसे जोड़ने पर ज्यादा निर्भर रही है. इसी वजह से $50 अरब के एक्सपोर्ट को पूरा करना केवल प्रोडक्शन बढ़ाने का सवाल नहीं है, बल्कि पूरी सप्लाई चेन को देश में विकसित करने की चुनौती है.


टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग में सबसे बड़ी चिंताओं में से एक क्रिटिकल कंपोनेंट को लेकर विदेशी निर्भरता है. नीति आयोग के अनुसार, भारत के 4G और 5G इक्यूपमेंट में इस्तेमाल होने वाले कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट के लिए चीन पर काफी निर्भरता बनी हुई है.

एंटीना, सिग्नल प्रोसेसर और दूसरे जरूरी हार्डवेयर कंपोनेंट में आयात पर निर्भरता स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग की क्षमता को सीमित करती है. इसके अलावा टेलीकॉम इकोसिस्टम में सेमीकंडक्टर, ऑप्टिकल कंपोनेंट्स और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी जैसी टेक्नोलोजीस के लिए भी भारत को वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर रहना पड़ता है.
इस निर्भरता को कम करने के लिए कंपोनेंट-लेवल मैन्युफैक्चरिंग, डोमेस्टिक R&D और स्ट्रेटेजी स्ट्रक्चर को बढ़ाना जरूरी होगा. यही कदम भारत को केवल असेंबली बेस से टेक्नोलॉजी पर आधारित मैन्युफैक्चरिंग हब में बदल सकते हैं.
सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम ने टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, टेलीकॉम और नेटवर्किंग प्रोडक्ट्स के लिए PLI स्कीम के तहत कंपनियों ने हजारों करोड़ रुपये की बिक्री और एक्सपोर्ट हासिल किए हैं.
इस योजना से निर्माण क्षमता बढ़ी, नए निवेश आए और कुशल रोजगार के अवसर भी बने. भारतीय टेलीकॉम इक्यूपमेंट को अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे मार्केट तक पहुंच मिली है. लेकिन PLI की सफलता के बावजूद कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग और डोमेस्टिक वैल्यू एडिशन अभी बड़ी चुनौती हैं. यानी PLI ने भारत को मैन्युफैक्चरिंग की शुरुआती सीढ़ी चढ़ने में मदद की है, लेकिन अगला चरण उच्च-मूल्य वाले घटक, सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम, बौद्धिक संपदा और एडवांस R&D तैयार करना होगा.
क्या तेजस नेटवर्क्स और HFCL ग्लोबल मुकाबला कर सकते हैं?
तेजस नेटवर्क्स , HFCL और डिक्सन टेक्नोलॉजीज जैसी भारतीय कंपनियां इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. घरेलू कंपनियां 4G, 5G और Open RAN जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमताओं को बढ़ा रही हैं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं. भारत के पास कम लागत वाली मैन्युफैक्चरिंग और बड़ा इंजीनियरिंग टैलेंट पूल एक एडवांटेज है. लेकिन ग्लोबल टेलीकॉम मार्केट में एरिक्सन, नोकिया और हुआवेई जैसी स्थापित कंपनियों से मुकाबला आसान नहीं होगा.
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हल्द्वानी से दिल्ली के बड़े न्यूजरूम तक… तनुजा जोशी, उत्तराखंड के शांत और खूबसूरत शहर हल्द्वानी से ताल्लुक रखती हैं. देहरादून के ग्राफिक एरा यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी … और पढ़ें
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